इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 27 नवंबर 2013

धरती सुराज अभियान

- वीरेन्द्र सरल  -
एक दिन अचानक  भगवान ने मन मे विचार किया कि क्यों ना मै भी ग्राम सुराज या नगर सुराज के तर्ज पर धरती सुराज अभियान चलाऊँ। वैसे भी मेरे अधीन तैंतीस करोड़ देवता है। जो इस समय स्वर्ग के सभी सुखो का उपभोग करते हुये बिल्‍कुल  खाली बैठे आराम फरमा रहे है। उनमे से यदि एक को मै दल प्रभारी और दूसरे को सहायक नियुक्त कर दूँ तो साढ़े सोलह करोड़ दल का गठन हो सकता है।ये दल विश्व के सभी गाँवो एवं शहरो मे पैदल भ्रमण करेंगें। लोगो से मिलकर उनकी समस्याओ को सुनेंगें और उनसे आवेदन प्राप्त करेंगें। इससे मुझे ताे पता चलेगा कि लोग कितने सुखी है या दु:खी। स्वर्ग से संचालित योजनाओ का धरती पर सही ढंग से संचालन हो रहा है या नही । योजनाओ का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रहा है या नहीं ।इन सभी बातों की जानकारी के लिये मुझे यह अभियान चलाना बहुत जरूरी लग रहा हैं।
मन मे यह विचार आते ही भगवान ने देवताओं की  एक अर्जेन्ट मीटिग बुलवाईं सारे देवता निर्धारित जगह पर एकत्रित हो गये । सबको बड़ी हैरानी हो रही थी ,सभी सोच रहे थे कि अचानक मीटिंग रखने की ऐसी कौन सी आवश्‍यकता आ पड़ी। सभी देवता भगवान की ओर प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगे।
भगवान ने सबको संबोधित करते हुये सबसे पहले मींटिंग का उद्देश्‍य बतलाया । सबकी जिज्ञासा शांत हो गई। जो देवता अखबारो  मे सुराज दल को बंधक बना लिये जाने या सुराज अभियान का बहिष्‍कार करने का समाचार पढ़ चुके थे या न्यूज चैनलो मे सुन चुके थे,वे एकदम घबरा गये । लेकिन अपनी घबराहट छिपाकर चुपचाप बैठे रहे। उनकी चुप्पी भाँपकर भगवान ने उनसे ही पूछा-अब इस धरती सुराज अभियान का शुभारंभ हम धरती के किस कोने से करें इस संबध में मैं आप लोगो से ही राय चाहता हूँ। एक देवता ने तपाक से कहा-इस अभियान का शुभारंभ हम इंडिया से ही करेंगें भगवन। दुसरे देवता ने अपना हिन्दी प्रेम झाड़ते हुये कहा-सट अप। बकवास बंद करो और देवभूमि भारत कहो,समझे। झिड़की सुनकर इंडिया कहने वाला देवता सकपका गया। दूसरे देवता ने उसे समझाने वाले अंदाज मे कहा-डोन्ट मांइड प्लीज। मगर हमे अपनी भाषा का अपमान नही करना चाहिये । भले ही हम अपने बच्चों को कॉन्वेन्ट स्‍कूलों में पढ़ायें। घर पर अंग्रेजी भाषा में वार्तालाप करें मगर सार्वजनिक मंचो पर अपनी भाषा के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करें। यही अपनी भाषा के विकास का मूलमंत्र है। यह अपनी भाषा के प्रति हमारा प्रेम है,अंडरस्टेण्ड। निज भाषा उन्नति अहै, सभी उन्नति के मूल ,समझा। मैने अपनी सभी बातें शुद्ध हिन्दी मे कह दिया है । अब आप लोगो को अच्छा लगे या बुरा। थैक्यूं वैरी मच।''
उनकी बातें सुनकर भगवान ने ताली बजाते हुये कहा- सचमुच आप महान हैं। आपकी महानता और भाषा प्रेम को मेरा नमन । बलिहारी जाऊँ,आपकी इस अदा पर। अपनी आदत से मजबूर सारे देवता वहाँ फूल बरसाने एवं नगाड़ा पीटने लगे। भगवान ने कहा-अनावश्यक शोर गुल मत कीजिये। मेरी बातें ध्यान से सुनिये। मैं आपके विचारों का समर्थन करता हूँ। सचमुच धरती सुराज अभियान की शुरूआत वहीं से होना चाहिये जहाँ हमारे सबसे अधिक भक्त बसते है। हमारी पूजा जहाँ ज्यादा होती है। और जहाँ के लोग हम पर ज्यादा चढ़ोत्री चढ़ाते है। अब आप सब जी जान से जुटकर कमर कसकर इस अभियान को सफल बनाने मे जुट जायेें। ठीक पखवाड़े भर बाद यहीं पर इस अभियान की समीक्षा बैठक होगी । आप अपनी अपनी ड्यूटी ईमानदारी से करें। लापारवाही कतई बर्दाश्त नही की जायेगी। मै अपने पुष्पक विमान से कहीं भी और कभी भी पहुँच सकता हूँ।अनुशासन हीनता पर कठोर दंडात्मक  कार्यवाही के लिये आप स्वयं जिम्मेदार होंगें,समझ गये ?''
दूसरे ही दिन इस अभियान की निर्धारित रूपरेखा तैयार कर ली गई। आवाश्यक दस्तावेज तैयार करवा लिये गये। तिथि भी निर्धारित हो गई। दलो का गठन भी कर लिया गया फिर निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार देवताओं को आदेश भी थमा दिया गया। आदेश मिलते ही अनिच्छा से ही सही  मगर ड्यूटी पर जाने के लिये तैयार हो गये। कुछ भगवान को कोसते हुये,कुछ कुनमुनाते हुये और कुछ अपने जीवन की अंतिम यात्रा समझकर अपने अपने दल के साथ अपने गंतब्य की ओर निकल पडें। घर से निकलते समय वे घर वालो से इस तरह बिदा ले रहे ले रहे थे जैसे सैनिक रणभूमि मे जाते समय लेते है। चेहरे का भाव ऐसा था,मानो कह रहे हों ,जिन्दा रहें तो वापस आयेंगें नहीं तो अगले जन्म में ही मुलाकात होगी। खुश रहो अहले वतन अब हम तो सफर करते हैं के अंदाज में सब देवता अपने अपने दल के साथ ड्यूटी पर निकल पड़े। देवता अपनी अपनी टोली के साथ गाँव गाँव,शहर शहर भ्रमण करने लगे। सुबह भ्रमण दोपहर चौपाल और रात्रि मे वहीं विश्राम। पखवाड़े भर से यही उनकी दिनचर्या थीं। इस बीच उन्हे विचित्र विचित्र अनुभव हो रहे थे। देवताओ का एक दल ग्रामवासियो के साथ ग्राम भ्रमण के लिये निकला था। वह एक बड़ा गाँव था। वहाँ के लोग शिक्षित और सपन्न लग रहे थे।बड़े -  बड़े आलीशान मकान थे पर वहाँ गंदगी बहुत अधिक थीं । नालियाँ बजबजा रही थी। घरो के आसपास कचरे के ढेर बिखरे पड़े थे । सड़कों के बीचोबीच गहरे गड्ढे थे। इन सबको देखकर देवताओ को बड़ी हैरानी हो रही थी । वे सोच रहे थे कि क्या ये वही देवभूमि है,जहाँ लोग कहते है कि यहाँ जन्म लेने के लिये देवता भी तरसते है। और क्या ये वही मनुष्य योनि है जिसके बारे मे कहा जाता है कि यह देवताओ के लिये भी दुर्लभ है? अच्छा हुआ जो हमने यहाँ जन्म लेने का शौक नही पाला । पता नही हमारे पूर्वज यहाँ कैसे रह लेते रहे होंगें?
उन्हें एकदम चुप देखकर गाँव के मुखिया ने पूछा- आखिर आप लोग एकदम चुप क्यों हैं , कुछ बोलते क्यों नहीं । क्या सोच रहे हैं आप लोग। दल प्रभारी देवता ने कहा -यहाँ इतनी गंदगी है । आप लोग साफ  सफाई क्यों नहीं करते ? सड़कों गड्ढे क्यो नही पाटते ? कूड़ें कचरा गाँव से बाहर क्यो नही फेंकते ? उसका इतना कहना ही था कि गाँव वाले चिल्लाने लगे। अरे! वाह यदि ये सब हम करेगें तो फिर भगवान क्या करेगें। हमारा बस चले तो हम गाँव की साफ सफाई को तो छोड़ो हम अपने शरीर की सफाई की व्यवस्था के लिये भी भगवान से ही माँग करेंगें। क्या हम गंदगी साफ करने के लिये उनकी पूजा पाठ करते हैं देवता उनके उत्‍तर सुनकर दंग रह गये । दल प्रभारी ने मुस्‍कुराते हुये कहा -सचमुच आप लोग महान है। अपने आप को पूर्णत: भगवान को समर्पित किये हुये है। और अजगर करे ना चाकरी पंछी करे  न काम ,दास मलूका कह गये सब के दाता राम के सिद्धांत को अपनायें हुये हे। आप लोगो की महानता को मै प्रणाम करता हूँ। भगवान से आप अपने शरीर की सफाई हेतु व्यवस्था की माँग नही करते ये आप लोगो की महानता है।
लोगो की मानसिकता से हैरान देवताओं को कहने के लिये और कुछ नही सूझ रहा था इसलिये चुप रहने मे ही उन्हे अपनी भलाई दिखी। वे नाक पर रूमाल रखकर चुपचाप ग्राम भ्रमण करने लगे । फिर दोपहर होते ही गाँव की चौापाल पर आकर बैठ गये ।
अब उनके पास आवेदन आने का सिलसिला शुरू हुआ। ज्यादातर आवेदन व्यक्तिगत लाभ के लिये ही थे । किसी को मुफ्त मे मकान चाहिये था तो किसी को दुकान । किसी सपन्न को गरीबी रेखा मे नाम जुड़वाना था तो किसी युवा को वृद्धावस्था पेंशन योजना का लाभ लेना था सार्वजनिक हित और ग्राम विकास संबंधी आवेदनो की संख्या एकदम नगण्य थी। ये सब देखकर देवता भैचक्के रह गये। इस तरह पखवाड़े भर से ग्राम सुराज अभियान चला और सफलता पूर्वक संपन्न हुआ । तब देवताओ ने राहत की सांसे ली ।
निर्धारित समय पर इस अभियान की समीक्षा बैठक आयोजित हुई।अपने खट्टे मीठे अनुभव के साथ सारे देवता वहाँ एकत्रित हुये । फिर प्राप्त माँग पत्रो पर वहाँ विचार किया जाने लगा। कुछ माँगे इतनी छोटी छोटी थी जिसे लोग स्वयं कर सकते थे। कुछ उल्टी सीधी अजीबोगरीब माँगे थी जैसे गाँव मे मदिरालय खोलने की माँग तथा दारू मे पानी मिलाने की शिकायतें।
इन माँगो को सुनकर भगवान ने ढंडी आहें भरते हुये कहा-क्या करोगे भाई! भगवत् पर बने रहना है तो इन माँगो को पूर्ण करना हमारी मजबूरी है। वरना कौन करेगा हमारी भक्ति और पूजा ? आज के लोग बिना स्वार्थ के कुछ भी नही करते। इस अभियान से अंतिम रूप से यही निष्‍कर्श  निकला कि दुनिया मे कोई सुखी नही है,सब दु:खी है बेचारे तभी तो रात दिन गाते रहते हैं कि दाता एक राम जी भिखारी सारी दुनिया । सर्वे भवन्तु सुखिन: के आदर्श वाक्य का अक्षरश: पालन करते हुये एवमस्तु कहकर सबकी माँगे पूरी कर दो ।
भगवान के इस आदेश को सुनकर सारे देवता हक्के बक्के रह गये । सब एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। वे सोचने लगे इस तरह की सभी माँगे पूरी कर देने पर तो लोग निठ्ल्‍ले कामचोर हो जायेंगें। फिर काैन  कहेगा परिश्रम ही पूजा है और कैसे बनेंगें लोग स्वावलंबी ?
उन्हें असमंजस मे देखकर भगवान ने कहा-मै आप लोगो के मनोभावों को समझ रहा हूँ। मगर आप समझते क्यों नही ,ये हमारी मजबूरी है ,आखिर आप लोगो को अपनी पूजा करानी है या नही ? इस ब्रह्मास्त्र से सारे देवता ढेर हो गये। सबके मुँह बंद हो गये। सबके मुँह से सभी माँगो के लिये एक साथ निकल पड़े  एवम्वस्तु। सबकी माँगे पूरी हो गई थी मगर अभी भी कोने में बैठे दो देवता असमंजस मे पड़े दिखार्द दे रहे थे। भगवान ने पूछा क्या हुआ ? आप दोनो एकदम चुप कैसे है ? निराश होने की बात नही है यदि आपको किसी की माँग पूरी करने मे कोई दिक्कत आ रही हो या आप असमर्थ हों तो मुझे बताइये। मेरे पास हर समस्या का समाधान है।
एक देवता ने डरते सहमते हुये कहा-भगवन, हमारे पास जो माँग है ,उसे पुरी करना हमारे बस की बात नहीं हैं,हम क्या करें?
भगवान ने कहा -यही तो बात है न अपने भक्तो की माँग पूरी नही कर सकते तो फिर क्यों देवता बने फिरते हो । स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर घर बैठो और आराम करो । लोग मुझे यूं ही भगवान नही कहते बच्चू। मै सभी समस्याओ का चुटकी बजाते हुये समाधान कर सकता हूँ। हर समस्या का समाधान है मेरे पास। भक्तो की माँग पूरी करना बाँये हाथ का खेल है मेरे लिये । इसीलिये मेरी पूजा सबसे अधिक होती है ,समझे। मैं चाहूँ तो क्या नही कर सकता । कहो तो कुबेर का खजाना अपने भक्तों में बटंवा दूँ। महासागरो का पानी पल भर मे सुखा दूँ। आसमान के तारे तोड़कर जमीन पर बिछवा दूँ। ब्रह्मांड को घड़े की तरह उंगली पर  उठाकर पटक दूँ। आखिर मैं क्या नही कर सकता ?
उस देवदास ने कहा-भगवन!ये सब तो ठीक है  मगर मेरे पास जो आवेदन उसमे माँग की गई है कि यथाशीघ्र जन लोकपाल विधेयक पास करा दो और देश को काला धन वापस दिला दो।
जनलोकपाल बिल और काला धन का नाम सुनकर भगवान के माथे पर पसीना छलक आया। रूमाल से पसीना पोंछते हुये भगवान धम्म से अपने सिहांसन पर बैठ गये और बेबस निगाहो से इधर उधर देखने लगे। हालात की गंभीरता को देख देवतागण अपने वैद्य को बुलाने के लिये दौड पड़े।

पता 
बोड़ला ( मगरलोड ) 
जिला - धमतरी ( छ.ग.) 
मोबाईल : 7828243377

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