इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 27 नवंबर 2013

आनन्द एवं प्रेरणा के स्त्रोत : बाल गीत

- समीक्षक -  डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन -
समीक्ष्य कृति  धूल भरे हीरे आनन्द बाल मनो विज्ञानी कवि डा. जयजयराम आनन्द कृत बालोपयोगी काव्‍यकृति है जिसे पढ़कर बालक बालिकायें अति आनन्द की अनुभूति करते है। जैसा कि आप सब जानते है कि आजकल बचपन छीना जा रहा है माता- पिता परिजन भी उनके शत्रु जैसे बने हुए है उन्हे अपने व्यक्तित्व सुख के आगे अपने बच्चों का हित भी नही दिखता। उनके पास संस्‍कार के नाम पर मात्र टी.वी.कार्टून है, डरावनी हारर फिल्में है या आयाघरों में प्रेम अपनत्व से दूर बासी भोजन, डांट- फटकार। ऐसे में जरूरी है बाल साहित्य। डा. जयजयराम आनन्द की यह कृति बच्चों को  उनका बचपन सौंपती है और सहज ही अपनत्व की मिठास, प्यार और संस्‍कार  देती है। वे अपनी पहली कविता- विनती में ही सच्चाई का पाठ पढ़ाते है-
माँ वरदान मुझे दे दो।
जो कुछ बोलूं सच सच बोलूं
सोच समझकर रूक रूक बोलूं
बचपन कविता में उनकी प्रेरणा है कि
पढ़े लिखे हम सब बचपन में,
खेले कूदे मगन रहें
संगी साथी सब अच्छे हों
जीवन पथ में सफल रहें।
कविताओं में आगत महापुरूषों के नामों यथा भामाशाह, ध्यानचंद्र, विन्द्रा, ·पिलदेव, सानिया मिर्जा, विवेकानन्द, सीता, सत्यवती आदि बाल पाठको के मन में जिज्ञासा जगाते है और वे उनके चरित्र को जानने का प्रयास करेंगे, ऐसा मेरे विश्वास है।
  डा. आनन्द आधार शिला कविता में लिखते है कि-
  बचपन कोरा कागज जैसा
  जो चाहो सो लिख दो।
  लेकर रंग- बिरंगी ची
  मनमाने रंग भर दो।।
यदि इसी सोच पर स्‍कूल  शिक्षा मिले तो बच्चों की आधारशिला मजबूत हो सकती है। कवि अब पुरातन पंथी नही है वह आधुनिक तकनीक  से भी बच्चों को जोडऩा चाहता है तभी तो दिशा कविता में वह चिठिया लिखने के स्थान पर दूरभाष करने की सलाह देता है जो क्यों न परिचित करवाया जाये। बच्चों माता- पिता के प्रति आदर भाव से जुड़े रहे उनकी अच्छाइयों को ग्रहण करें इसलिए अम्मा की पहचान कवि इस रूप में कराते है-
हार- खेत का हिसाब रखना
खाद- बीज की किताब रखना
लाभ हानि की चिन्ता करना
बापू के संग जीना मरना
कौन बीज किस खेत उगेगा
कौन कहाँ या नकद मिलेगा
अम्मा को है ज्ञान
आज टूटते परिवारों को बचाना समय एवं समाज की जरूरत है। आज के बच्चे बड़े  होकर कल का भविष्य बनते है और जब वे देखे कवि उनके माता- पिता की उपेक्षा कर रहे हैं तो कल वे भी उनका अनुसरण करेंगे। यह स्थिति न बने इसलिए पुश्तैनी घर कविता में आनन्द कहते है कि -
घर के मुखिया दादा- दादी
सबकी चिन्ता दादा- दादी
चूल्हा- चौंका सबका ए·
सबके पीछे दादा- दादी।
कभी किसी का कौर बंटा न किश्तों में।।
डा. जयजयराम आनन्द मात्र बच्चों की पसंद का ही विचार नही करते अपितु वह बच्चों को यह भी देना चाहते है जिससे वे अपना मानस बना सके कि उन्हे कैसा समाज चाहिए और उन्हे स्वयं कैसा बनना है। वे विज्ञापन में औरत के उथरे तन- मन पर यह कहकर प्रश्न उठाते है कि विज्ञापन में औरत नाचे उथरे तन मन लिखती देह निबन्ध पैसों से अनुबन्ध बंधुआ मजदूरी आओ हम सब दीप जलाएं आदि प्रसंग उठाकर वे अनेक प्रश्नों के समाधान प्रस्तुत करते है- अच्छी बात सिखाई होती जीवन में सुखदायी होती। इस तरह धूल भरे हीरे आनन्द कर सभी कविताएं सरस, सहज, भावना प्रधान, प्रेरणास्पद एवं उपयोगी है। कृति का  कवर पृष्ठ बच्चों के हंसते, मुस्‍कुराते, गंभीर, जिज्ञासा भरी आंखो युक्त चेहरों से बाल आनन्द की सृष्टि कर रहा है। मैं समझता हूँ कि ऐसा बचपन बना रहें तो कृतिकार डा. जयजयराम आनन्द का श्रम सफल होगा। मेरी हार्दिक बधाई।

पता 
सहायक प्राध्‍यापक 
प्रवर : हिन्‍दी विभाग 
सेवा सदन महाविद्यालय, बुरहानपुर ( म़ध्‍यप्रदेश )

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