इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 27 नवंबर 2013

श्वान धर्म

  • कुमार शर्मा अनिल --

भेडिय़े का वंशज श्वान उन जंगली जानवरों में से है जिसे मनुष्य ने सबसे पालतू बनाया था। आदि - काल से मनुष्य और श्वान की मित्रता वैसी की वैसी है। बदलते जीवन मूल्य और सामाजिक परिवेश का प्रभाव आज जहाँ हर रिश्ते पर पड़ा है वहीं मनुष्य और श्वान के बीच का रिश्ता इससे अब भी अछूता है। कुत्ते की वफादारी की हजारों कहानियाँ इतिहास के पृष्ठों पर अब भी दर्ज है जहाँ इस स्वामी भक्त जानवर ने  अपने प्राणें पर खेलकर अपने मालिक और उनके पारिवारिक सदस्यों की प्राण रक्षा तक की।
मेरी बरसों पुरानी आदत है कि मैं सुबह की चाय अखबार पढ़ते हुए बालकनी में बैठकर पीता हूं। इस कालोनी में जब से आया हूं लगभग रोज ही देखता हूं कि कई लोग अपने कुत्तों के साथ सुबह - शाम सैर को निकलते हैं। रल्हन साहब भी उनमें से एक थे। रल्हन साहब के बारे में मैं बस इतना जानता था कि वे पिछले वर्ष ही शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हुए है। पत्नी की मृत्यु हो चुकी है और एक बेटी थी जो विवाह के पश्चात अपनी ससुराल में सुखी है। इस कालोनी में वे अकेले ही रहते थे। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए उन्होंने अल्शेशियन नस्ल का एक स्वस्थ व सुंदर कुत्ता पाल रखा था - टाइगर। ये जब भी घर से निकलते टाइगर उनके साथ होता। वास्तविकता तो यह थी कि मैंने  कभी उन्हें टाइगर के बिना नहीं देखा था। टाइगर से उन्हें बेइंतहा प्यार था और टाइगर भी उनके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। ऐसा अक्सर वे अपने परिचितों में टाइगर की कहानियाँ सुनाते हुए बताते थे। साठ वर्ष की उनकी उम्र हो चुकी थी परन्तु उन्हें देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वे इतनी उम्र के होंगे। इसका राज भी उनकी जीवन शैली में ही छुपा था। वे बड़े ही खुशमिज़ाज, मिलनसार और व्यवहारिक थे। शाम को अक्सर उनके घर पर यार दोस्तों की महफिल जमती, जहाँ जामों में घोलकर जीवन के तमाम गमों और अवसादों को पी लिया जाता परन्तु कभी भी, किसी ने भी उन्हें शराब पीकर बहकते नहीं देखा था।
मेरे फ्लैट के भूतल पर शर्मा जी का परिवार था। दोनों पति - पत्नी एक ही कार्यालय में कार्यरत थे।  परिवार में उनकी चौदह वर्षीय बेटी सलोनी को मिलाकर कुल तीन सदस्य थे। सलोनी सुबह आठ बजे स्‍कूल लिए निकलती और दो बजे तक घर लौट आती। मुझे वह अक्सर सुबह स्‍कूल  जाते हुए नजर आ जाती थी। गोरा , तीखे नाक - नक्श और धीर - गंभीर स्वभाव की वह सुंदर- सी किशोरी जब सफेद यूनिफार्म में स्‍कूल  जाने के निकलती तो मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता कि कोई सफेद कबूतरी हौले- हौले हवा में तैर रही है।
उस दिन भी सुबह ऐसा कुछ अजीब नही घटा था। सभी लोगो ने अपनी दिनचर्या रोज की तरह ही प्रारंभ की थी। मैने भी सुबह बालकनी में चाय पीते हुए अखबार की खबरें टटोली थी और सलोनी भी ठीक आठ बजे स्‍कूल  जाने के लिए निकली थी। इसमें भी कुछ अजीब नही था कि मैं अपनी पत्नी, जो मेरे ही कार्यालय में कार्यरत है, के साथ लंच टाइम में घर लौट आया था क्योंकि एक टी.वी. कार्यक्रम की स्क्रिप्‍ट तैयार कर मुझे प्रोडयूसर को देनी थी।
पिछले कुछ दिनों से कालोनी में चोरी की वारदातें बहुत बढ़ गई थी। चोर विशेषकर उन घरों को निशाना बनाते जहाँ पति - पत्नी दोनों कार्यरत होते और घरों में या तो ताले लगे होते या छोटे बच्चे अकेले होते।
तीन बजे का वक्त होगा। जब मुझे नीचे वाली मंजिल से कुछ घुटी - घुटी चीखों की आवाज सुनाई दी। चूँकि आसपास के दोनों मकानों में भी नौकरीपेशा दम्पति रहते थे अत: दोपहर का वक्त यह पूरा ब्लॉक सुनसान रहता था। पहले मैं समझा कि शायद सलोनी स्‍कूल से लौट आई होगी और उसने टेलीविजन पर कोई विदेशी म्यूजिक चैनल लगा रखा होगा जहाँ गायक गाते कम चीखते ज्यादा है। लेकिन जब दरवाजा पीटने की आवाजें भी उन घुटी - घुटी चीखों में शामिल हो गई तो मेरी पत्नी एकदम से घबरा गई। निश्चित था कि नीचे शर्माजी के घर में कुछ अप्रत्याशित घट रहा था। हम दोनों ही सलोनी के लिए एकदम चिंतित हो उठे। मैं लगभग दौड़ता हुआ मदद के लिए नीचे पहुंचा। साथ में पत्नी भी थी। हमारे नीचे पहुंचने और दरवाजा पीटने के साथ एक झटके में से दरवाजा खुला और बदहवास सी सलोनी मेरी पत्नी को देखते ही उसके सीने से लिपटकर जोर - जोर से रोने लगी। उसकी यूनिफार्म जगह - जगह से फटी हुई थी और उसके चेहरे और शरीर पर किसी वहशियाना दरिंदगी के निशान खरोचों की शक्ल में स्पष्ट नजर आ रहे थे ।
कमरे के अंदर का दृश्य देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। अंदर रल्हन साहब लहूलुहान पड़े थे और उनके वफादार कुत्ते टाइगर ने उनकी टांग को लगभग चबा डाला था जो अब भी उसके मजबूत जबड़ों की गिरफ्त में थी। सलोनी को सुरक्षित देखकर टाइगर ने रल्हन साहब को छोड़ा और रोती हुई सलोनी के पास आकर खड़ा हो गया। घिसटते हुए रल्हन साहब जब बाहर निकले तो मैंने देखा टाइगर की आँखों में गुस्से और नफरत का मिला - जुला भाव था।
पता 
1192 - बी, सेक्टर - 41 - बी, चण्डीगढ़
मोबाईल : 099148 - 82239

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