इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 27 नवंबर 2013

आईना

- सुभाष चंदर  -
आज फिर वैसा ही हुआ । बच्चों के सो जाने के बाद उसने उसे बिस्तर पर बुलाया। पर वह पहले की तरह आज भी बहाना बना गयी नहीं उठी। मैं देख रहा हूँ। तुममें ठंडापन बढ़ता ही जा रहा है। इलाज कराने को कहता हूँ, तो बिदकती हो। जानती हो, आज हमें हम - बिस्तर हुए पूरे बीस दिन हो गये हैं।
उसे मुस्‍कराते  देखकर वह और भड़क गया । फिर टेलीफोन की ओर बढ़ते हुए बोला - तुम क्या समझती हो, मुझमें कोई कमी है। मैं अभी मिसेज वर्मा का नम्बर डायल करता हूँ  वह वैसे भी काफी दिनों से मेरे पीछे पड़ी है। कहकर उसने उसकी ओर देखा । किन्तु कटकर रह गया, क्योंकि वह दूसरी औरत के नाम पर तड़प उठने की जगह व्यंग्य से मुस्‍करा रही थी। उसका  मन और कड़वा हो गया । वह बिफर उठा। देखना, तुम्हारा यह ठंडापन तुम्हें और मुझे ले डूबेगा। कहकर वह फोन के नम्बर घुमाने लगा।
तभी वह फोन के पास गई। उसके हाथ से रिसीवर लेकर रख दिया । फिर रहस्यमयी मुस्‍कुराहट के साथ बोली - अच्छा है कि मुझमें यह ठंडापन है। वरना तुम्हारी जगह मैं होती और टेलीफोन पर मिसेज वर्मा की जगह, मेरे बॉस या कलीग का नम्बर । फिर गहरी सांस लेकर बोली- ठंडापन ही इस घर को बचा रहा है। क्योंकि तुम तो तृप्त होने के बाद आराम से मुँह फेरकर सो जाते हो और मैं रात भर अतृप्ति की आग में ....। अपने शरीर की माँग को मैं इस ठंडेपन के आवरण में ही छिपाती हूँ। अपने आप से पूछकर देखो कि इस घर को यह ठंड़ापन कितना बचा रहा है। कहकर वह बच्चों के कमरे में सोने के लिए चल दी।
वह हतप्रभ सा खड़ा, आइने में खुद को गौर से देखने लगा।

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