इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 27 नवंबर 2013

आईना

- सुभाष चंदर  -
आज फिर वैसा ही हुआ । बच्चों के सो जाने के बाद उसने उसे बिस्तर पर बुलाया। पर वह पहले की तरह आज भी बहाना बना गयी नहीं उठी। मैं देख रहा हूँ। तुममें ठंडापन बढ़ता ही जा रहा है। इलाज कराने को कहता हूँ, तो बिदकती हो। जानती हो, आज हमें हम - बिस्तर हुए पूरे बीस दिन हो गये हैं।
उसे मुस्‍कराते  देखकर वह और भड़क गया । फिर टेलीफोन की ओर बढ़ते हुए बोला - तुम क्या समझती हो, मुझमें कोई कमी है। मैं अभी मिसेज वर्मा का नम्बर डायल करता हूँ  वह वैसे भी काफी दिनों से मेरे पीछे पड़ी है। कहकर उसने उसकी ओर देखा । किन्तु कटकर रह गया, क्योंकि वह दूसरी औरत के नाम पर तड़प उठने की जगह व्यंग्य से मुस्‍करा रही थी। उसका  मन और कड़वा हो गया । वह बिफर उठा। देखना, तुम्हारा यह ठंडापन तुम्हें और मुझे ले डूबेगा। कहकर वह फोन के नम्बर घुमाने लगा।
तभी वह फोन के पास गई। उसके हाथ से रिसीवर लेकर रख दिया । फिर रहस्यमयी मुस्‍कुराहट के साथ बोली - अच्छा है कि मुझमें यह ठंडापन है। वरना तुम्हारी जगह मैं होती और टेलीफोन पर मिसेज वर्मा की जगह, मेरे बॉस या कलीग का नम्बर । फिर गहरी सांस लेकर बोली- ठंडापन ही इस घर को बचा रहा है। क्योंकि तुम तो तृप्त होने के बाद आराम से मुँह फेरकर सो जाते हो और मैं रात भर अतृप्ति की आग में ....। अपने शरीर की माँग को मैं इस ठंडेपन के आवरण में ही छिपाती हूँ। अपने आप से पूछकर देखो कि इस घर को यह ठंड़ापन कितना बचा रहा है। कहकर वह बच्चों के कमरे में सोने के लिए चल दी।
वह हतप्रभ सा खड़ा, आइने में खुद को गौर से देखने लगा।

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