इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

गज़ल : महेन्‍द्र राठौर

बाजार में रुसवा को भी रुसवा न किया जाय
मर्यादा की अपनी कहीं सौदा न किया जाय
अब मिलने मिलाने का इरादा न किया जाय
आँखों से भी पीने की तमन्ना न किया जाय
जब आसमां पे झूट ने फैला दिया है जाल
इस हाल में ईमान का सौदा न किया जाय
नासमझों में बैठो तो क़दर जाती रहेगी
मेय्यार को अपने यूँ ही सस्ता न किया जाय
रस्ते में सियासत का जताना फज़ूल है
संसद में जा के हाथ को ऊँचा न किया जाय
पैग़ाम रक़ीबों  से है भेजा तबीब को
बीमार हमारा है तो अच्छा न किया जाय
फिर से मिला के हाथ मोहब्बत नहीं रहती
फिर आने जाने वास्ते रस्ता न किया जाय
अपनों ने मिटाया है तो मैं सोच रहा हूं
अपनों से दोबारा कभी रिश्ता न किया जाय
पता -  न्यू चंदनिया पारा
जांजगीर - 495668
मो. 09425541702

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