इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

हिन्दी फिल्मों के आइनें में नक्सलवाद


  • डॉ. पूनम रानी
  • असिस्‍टेंट प्रोफेसर, महारानी लक्ष्‍मीबाई, महाविद्यालय

नक्सलवाद के  जन्मदाता के तौर पर चारु मजूमदार और कानू सान्याल का नाम लिया जाता है। 1967 के पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव में जन्मा ये आंदोलन आज देशव्यापी शक्ल ले चुका है। नक्सलबाड़ी से निकला यह आंदोलन आज देश के 14 राज्यों के 2500 से अधिक थाना क्षेत्रों में फैल चुका है। देश के 626 जिलों में से 231 जिलों में इसकी पहुंच है। 2 लाख सशस्त्र लड़ाको और समर्थक इस आंदोलन की व्यापकता का अंदाजा सहज ही करा देते हैं। साथ ही भारत के अनेक बुद्धिजीवियों के साथ दुनिया के बुद्धिजीवियों की सहानुभूति भी यह आंदोलन पाता है। हिन्दी के मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, धुमिल अपनी नई कविताओं में इस आंदोलन के साथ खड़े दिखाई दिए हैं। हिन्दीतर में गोरखपांडे, पाश और महाश्वेता देवी का नाम लिया जा सकता है।
हिन्दी फिल्मों के बारे में प्रसिद्ध है कि विषय चाहे जो हो ट्रीटमेंट उद्योग तय करता है। नक्सलवाद पर बहुत सी फिल्में बनी पर कुछेक को छोड़कर बाकी को चालू मसालों से तैयार किया गया था। ख्वाजा अहमद अब्बास जो कि ' शहर और सपना ' और ' धरती के लाल ' जैसी जनपक्षधर फिल्मों के लिए जाने जाते हैं, ने 1980 में ' नक्सलवादी ' फिल्म बनायी थी। फिल्म उद्योग में जनता से दुख दर्द से सचमुच संवेदना रखने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ने 1980 के आसपास नक्सलवादी नाम से फिल्म बनाई, जो फिल्म चलाने के मसालों से दूर थी। इस फिल्म में बंगाल, आन्ध्रप्रदेश और केरल के 1967 - 71 तक नक्सली आंदोलन को केन्द्र में रखा था। मिथुन चक्रवर्ती , स्मिता पाटिल जैसे कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया था। फिल्म सत्ता की दमन दिखाते हुए नक्सलवाद की वजहों और कमजोरियों को भी दिखाती है। हालांकि चालू फार्मूलों के अभाव के चलते अच्छी फिल्म होने के बावजूद फिल्म चल नहीं पायी। सन् 2000 में आयी '' लाल सलाम '' '' प्रेम की चाशनी '' में पगी नक्सलवाद की परते उधेडऩे की कोशिश करती फिल्म है जो कि जनजातियों की संस्‍कृति  और परम्पराओं पर भी थोड़ी बहुत रोशनी डालती है। फिल्म कहीं न कहीं यह स्थापित करने की कोशिश करती है कि सरकारी दमन के अलावा अशिक्षा भी नक्सलवाद के कारणों में है। परन्तु नक्सलवाद पर उल्लेखनीय फिल्म नहीं कही जा सकती है। इसी बीच महाश्वेता देवी के उपन्यास पर निर्देशक गोविन्द निहलानी ने हजार चौरासी की माँ नाम से एक उल्लेखनीय फिल्म बनायी। इसकी कहानी एक साधारण महिला जो कि बैंक  कर्मचारी है, के इर्द - गिर्द घूमती है। सुजाता जया भादुड़ी का बेटा नक्सलियों के संग रहने के कारण मारा जाता है। उसकी लाश का नम्बर 1084 है और सुजाता बन जाती है 1084 की माँ।
सुधीर मिश्रा जो ' इस रात की सुबह नहीं ' और ' चमेली ' से सुर्खियों में आए / उनकी फिल्म इस रात की सुबह नहीं सार्त्र के नाटक '' नो एक्जि़ट ''  की याद दिलाती है। फिल्म की कहानी आपातकाल के समय को पुनर्जीवित करती है। कहानी तीन दोस्तों के इर्द - गिर्द घूमती है। तीनों की अपनी - अपनी ख्वाहिशें है। सिद्धार्थ के .के . मेनन क्रांति करना चाहता है। विक्रम हालांकि गांधीवादी पिता का पुत्र है पर गांधीवाद में कतई विश्वास नहीं करता है। गीता भी कुछ बड़ा करना चाहती है। कॉलेज से ये तीनों तीन दिशा में जाते हैं। सिद्धार्थ को क्रांति  बुला रही थी वह बिहार में नक्सली आंदोलन में सक्रिय हो जाता है। गीता ब्रिटेन में शिक्षा हेतु प्रवास कर जाती है। विक्रम दिल्ली में अपना धंधा चमकाने हेतु आफिस खोल लेता है। ख्वाहिशें कैसे दम तोड़ती है, आक्रोश की हवा कैसे निकलती है और उसके त्रासद अंत की कथा हजारों ख्वाहिशें ऐसी में देखा जा सकता है। सुधीर मिश्रा की '' हजारों ख्वाहिशें ऐसी '' के साथ एक दूसरी हालिया बहुचर्चित फिल्म '' चक्रव्‍यूह '' को साथ रखकर देखा जा सकता है। जिसे प्रकाश झा ने निर्देशित किया है। इसमें से पहली बीसवी सदी के सातवें दशक की  कहानी है तो दूसरी इक्‍कीसवीं  सदी के प्रथम दशक की ।
प्रकाश झा की '' चक्रव्‍यूह '' के अंत में वे वायज ओवर से आवाज उभरती है , '' कबीर और जुही की शहादत '' ने गोंविद और राजन के संघर्ष को और भी हवा दी। तेजी से बढ़ता नक्सलवाद देश के 200 जिलों में अपनी जड़ें जमा चुका है। हजारों हथियारबंद माओवादी गुरिल्ले अपने ही देश की सेना के साथ एक भयानक खूनी संघर्ष में लगे हुए हैं। एक भी दिन नहीं गुजरता जब भारत की धरती अपने ही बच्चों के खून से लाल न होती हो। इस चक्रव्‍यूह  से निकलने का रास्ता क्यों नहीं मिल रहा। आजादी के पैंसठ सालों में हमने तेजी से तरक्‍की तो की लेकिन उतनी ही तेजी से देश की एक बढ़ी आबादी दूर पीछे छूटती चली गई। चमकते भारत की सच्चाई ये है कि 25 प्रतिशत आमदनी पर बस कुछ 100 परिवारों का कब्जा है जबकि हमारी 75 प्रतिशत आबादी रोजाना 20 रुपये पर बसर करने को मजबूर हैं। इस अंतर से जन्मा अविश्वास और आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है और शायद वक्त हमारे हाथ से फिसलता जा रहा है। मगर समझ में यह नहीं आता, प्रकाश जिन 200 जिलों का जिक्र कर रहे हैं आखिर उनमें रहने वाले लोग फिल्म में कहाँ हैं। एक सीन में आदिवासी नज़र भी आते हैं तो प्रकाश ने उन्हें हास्यास्पद रुप से पोट्रेट किया है। इस दृश्य में पुलिसिया नायक को देख आदिवासी बेतहाशा भागने लगते हैं। लेकिन प्रकाश का नायक नए जमाने की रोशनी लिए है। वह एक घायल आदिवासी को पकड़ उसके जख्म पर ऐसे मलहम लगा रहा है जैसे वर्षों से जारी दमन पर मरहम लग रहा हो। प्रकाश ने पूरी फिल्म एक घटिया उपदेश की तरह बनायी है। वे ये क्यों मान लेते हैं कि सभी आदिवासी मूर्ख हैं। उन्हें भी विकास का वही माडल चाहिए जो सरकारों के पास है। वे दिखाते है आदिवासी दिल्ली और बंबई वाला विकास चाहते हैं, वे शहर आने के लिए मरे जा रहे हैं।
'' चक्रव्‍यूह '' की  कहानी बहुत ही साधारण किस्म की है। कहा यह गया था कि प्रकाश ने बहुत रिसर्च कर के यह फिल्म बनाई है। परन्तु आभास ऐसा होता है कि मीडिया रिर्पोटें पढ़कर प्रकाश ने काम चला लिया है। तकनीकी रुप से भी '' चक्रव्‍यूह '' एक कमजोर फिल्म कही जाएगी। संगीत पक्ष तो और भी खराब है। संवेदनशील मुद्दे को लेकर बनाई गई फिल्म में कुंडा खोल जैसे आईटम सांग की क्या जरुरत पड़ गई थी। क्या प्रकाश फिल्म की सफलता को लेकर पहले से ही आशंकित थे जैसे प्रश्‍न  स्वत: ही जेहन में आ जाते हैं। इसके अतिरिक्त आदिवासियों को सिर्फ बीस तक गिनती जानना और उस पर कबीर को उनका मजाक उड़ाना इस बात की तरफ इशारा करता है कि नक्सली अपपढ़, अज्ञान हैं और बंदूक की नोक पर सत्ता को हथियाना चाहते हैं, बहुत ही सतही लगता है और अखरता है।
'' चक्रव्‍यूह '' का संघर्ष तो चलता जाता है लेकिन '' हजारों ख्वाहिशें '' को नायक संघर्ष की राह छोड़ विदेश में अपनी पढ़ाई पूरी करने चला जाता है। नायिका को लिखे अपने अंतिम पत्र में लिखता है शायद मैं वापस आ जाउँ, बहुत संभव है वापस आकर यह आंदोलन को बौद्धिक नेतृत्व दूं। गीता गाँव में रहकर आदिवासियों की सेवा का बीड़ा उठाती है लेकिन अपने पुत्र को विदेश पढऩे भेज देती है। हजारों ख्वाहिशें ऐसी में बाहर से आए लोग गाँव वालों के लिए लड़ रहे हैं। स्थानीय लोगों की भागीदारी को यह फिल्म रेखांकित नहीं करती है। बावजूद '' हजारों ख्वाहिशे ऐसी '' '' चक्रव्‍यूह '' से अधिक यथार्थ पूर्ण ढंग से विषय को रुपांरित करती है। नक्सलवाद पर अच्छी मुख्यधारा की फिल्म का आना अभी बाकी है। अभी तक जो फिल्में आई हैं उनमें कुछेक को छोड़कर ज्यादातर झण्डू ब्राण्ड ही कही जा सकती हैं।
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