इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

अल्पेश पी. पाठक '' पागल '' : दो गज़लें

आज दिल की कली कँवल हो गई।
बंद आँखों में इक शकल हो गई।।
आज तो .. बाग - बाग था लड़का
और लड़की गझल - गझल हो गई।।
निंद  में .. परियां को बुलाने में ..
कितनी दुश्वारी आजकल हो गई।
मैंने खुद को जरा संवारा है ...
मुश्किलें कितनी मेरी हल हो गई
छोटा था मैं तब दिल बड़ा सा था
आज दिल से बड़ी अकल हो गई
वक्त के ... कारसाझ हाथ से ...
मेरी दीवानगी ... कतल हो गई
क्या कहूँ मेरे देश को ''  पागल ''
दिल्ली अब दिल पे भी अमल हो गई 
( 2 )
चीख वो अखबार में छप आयेगी
आज की ताजा खबर कहलायेगी
चार दिन अफवाह दौड़ेगी जनाब
फिर तो यह आवाज़ भी थक जायेगी
चार पंछी .. एक पत्थर से गिरे ...
तब पुरानी सोच भी शरमायेगी
रात है तन्हाईयों के हाथ में
वक्त पे परछाईयाँ मर जायेगी
रंग अक्सर बात करतें है यहाँ
शायरी क्या - क्या गज़ब दिखलायेगी
पता -
अमि प्रभा, 101- ए 
डिवाइनगर, मेन रोड, 
माधव रेसीडेन्सी नजदीक, रैया चोकडी, 
राजकोट - 360005 मो. 8306105527    

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