इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

महापर्व - शिवरात्रि

  • सुरेन्द्र वर्मा (पूर्व प्राचार्य)

गोस्वामी तुलसीदास जी विनय पत्रिका में शिव स्तुति करते हुए कहते है-
बहुकल्प उपायन करि अनेक। बिनु शंभु कृपा नहिं भव विवेक।।
विग्यान भवन, गिरिसुता रमन। कह तुलसीदास गम त्रास समन।।
अर्थात् अनेक कल्पों तक कितने ही उपाय क्यों न किये जावें, शिवजी की कृपा बिना, संसार के असली स्वरूप का ज्ञान, कभी नहीं हो सकता। इसलिए, शिवजी के इस पर्व को महापर्व कहा गया है। ईशान संहिता के अनुसार शिव की प्रथम लिंग मूर्ति का अविर्भाव कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की महानिशा में हुआ था- अत: उसी महानिशा व्यापिनी चतुर्दशी को शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करना चाहिए। प्रत्येक व्रत के साथ कोई न कोई कथा या आख्यान जुड़ा रहता है। इसी प्रकार शिवरात्रि व्रत के सम्बन्ध में यह आख्यान है कि एक बार पार्वती जी ने भगवान शंकर से पूछा- कि किस व्रत से आप प्रसन्न होते है, तब भगवान शंकर ने कहा-
फाल्गुने कृष्ण पक्षस्य या तिथि: स्याच्चतुर्दशी।
तत्यां या तमसो रात्रि: सोच्यते शिवरात्रि का।।
तत्रोपवासं कुर्वाण: प्रसादयति मां रुव।
फाल्गुन के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि को शिवरात्रि कहते है उस दिन उपवास करने से मैं प्रसन्न होता हूं। इससे सिद्ध होता है कि इस व्रत का, उपवास, प्रधान अंग है। रात्रि के चार प्रहरों में चार बार पृथक -पृथक पूजा का विधान भी है।
दुग्धेन प्रथमें स्नानं दुग्धा चैव द्वितीय के। तृतीय तु तथोज्येन चतुर्थे मधुना तथा।।
प्रथम प्रहर में दूध से, द्वितीय प्रहर में दही से, तृतीय प्रहर में घी से तथा चतुर्थ प्रहर में मधु से मूर्ति को स्नान कराकर पूजन करना चाहिए।
सुबह विसर्जन के बाद अमावस्या को यह प्रार्थना करना चाहिए-
संसार क्लेशदग्धस्य व्रतेनानेन शंकर। प्रसीद सुमुखो नाथं! ज्ञान दृष्टि प्रदो भव।।
हे शंकर! मैं नित्य संसार की यातना से दग्ध हो रहा हूं- इस व्रत से तुम मुझ पर प्रसन्न होओ। हे प्रभु! संतुष्ट होकर मुझे ज्ञान दृष्टि प्रदान करो।
कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड के ग्रन्थों मेें शिव पूजन की विधियां दी गई है। योग, जप, तप, पूजा, अर्चना, यज्ञ, होम हवन आदि द्वारा साधनाएं की जाती है और साधको ने उनसे परमफल प्राप्त किया है। यह सत्य है। किंतु यह भी सत्य है कि इन सबके जाने बिना भी भावातिरेक से भावगम्य शिव की उपासना भी भक्त करते हैं, संत तुलसीदास जी रुद्राष्टक में लिखा है-
न जानामि योगं जपं नैव पूजा। भजेेहं भवानीपतिं भावगम्य।।
महापर्व महाशिवरात्रि के संदर्भ में रात्रि, जागरण, निद्रा, मृत्यु आदि शब्द आते है- ये सभी शब्द प्रतीत्मक है- अपनी-अपनी बुद्धि एवं श्रद्धा के अनुरूप उन प्रतीको के अर्थ भक्तगण लेते हैं एक भक्त कहते है -
तव तत्वं न जानामि, की दृशोसि महेश्वरा। या दृशोसि महादेव, तादृशाय नमो नम:।।
हे महेश्वर! आपके तत्व को मैं नहीं जानता कि आप कैसे दिखते है। आप जैसे भी दिखते है, मैं उसी दृश्य को नमस्‍कार करता हूं - यहां भक्ति अपनी चरम सीमा पर है। ईश्वर सर्वव्याप्त है-यह जानते हुए भी व्यक्ति तीर्थ यात्रा करते है। ईश्वर ध्यान से परे है यह जानते हुए भी नित्य नेत्र बंद कर ध्यान करते है। ईश्वर का वर्णन शब्द नहीं कर सकते फिर भी भक्त छंदबद्ध प्रार्थनाएं करते हैं।
इसी तरह सभी रात्रियां शिव की रात्रियां है। किसी भी रात्रि को शिव आराधना सच्चे मन से की जाए तो शिव प्राप्ति की जा सकती है- पर शिवरात्रि को विशेष महापर्व मानकर आराधना का सुअवसर माना जाता है। व्यक्ति की समष्टि के प्रति यह धारणा प्राकृतिक है।
शिव के साथ ‘‘रात्रि‘‘ का जोडऩा भी सांकेतिक अर्थ रखता है। भारतीय वांडमय ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय‘‘ कहता है ‘- ज्योति या प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है। कृष्ण कहते हैं-
श्रेयो हि ज्ञान अभ्यासा, ज्ञानात् ध्यानं विशिश्यते।
अर्थात् ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है। शिव के शब्दों में
उमा कहहुं मैं अनुभव अपना,सत हरि भजन जगत सब सपना।
मान लीजिए कि उस अनन्त परब्रम्ह परमेश्वर के दर्शन हो जाएं जो करोड़ों-करोड़ों सूर्यों की आभा रखता हो तो मानव नेत्र क्या उस ज्योति पुंज को सहन कर पाएगा- नहीं। आंखें झप जाएगी, घबरा जाएगा- हमारे सामने उदाहरण है अर्जुन का - कृष्ण के विराट रूप को अर्जुन अधिक देर तक देख नहीं पाया। उस प्रकाश की बात भी रहने दें, मानव निर्मित साधारण तीव्र विद्युत बल्व की रोशनी भी हम अधिक बर्दाश्त नहीं कर सकते अत: शिव ने मानव की इस मानवीय कमजोरी को समझा हो और प्रकाश के स्थान पर रात्रि को अधिक सटीक माना हो।
रात्रि, अंधकार कुछ नहीं दिखता, दृष्य नहीं मात्र दृष्टा- मानव मन को बहकने का अवसर नहीं तो स्पष्ट है कि चित्त की एकाग्रता ही तो है साधना। जहां मन के क्रियाकलाप शांत और नीरव हो जाते हूं अमनी स्थिति आ जाती है।
प्रकाश में दृष्य है, उन दृष्यों में मानव उलझ जाता है, खो जाता है बहक जाता है - किंतु अंधकार में ऐसे मौके नहीं- कितनी भी देर हम उसमें रह सकते है बिना विचलित हुए। महापर्व महाशिवरात्रि में, रात्रि उसी अविचलित हुए ध्यान की गहराईयों के अवसर का प्रतीक है।
शिव का अर्थ है शुभ। शिव का वास है श्मशान। शुभ और श्मशान दोनों शब्द विरोधाभासी प्रतीत होते है पर विरोधाभासी है नहीं। जीवन में अनंत शांति का आभास भले ही हो जाए, अनंत शांति प्राप्त नहीं हो पाती। मृत्यु अनंत शांति का द्वार है और शांति शुभत्व का लक्षण है। ढुलमुल मांसपेशियां, जर्जर काया, अशक्त परवश , लाचार रोगों से आक्रांत शरीर स्वयं ही स्वयं को जब बोझ लगने लगे तब व्यक्ति सच्चे दिल से मृत्यु की कामना करता है- अखंड शांति, चिर विश्राम का नाम है मृत्यु। संसार बंधनो का अंत, कायाकष्टों का अंत, मोहश्रम के अंत का  नाम मृत्यु है वहीं शिवत्व की प्राप्ति हैै।
‘‘ मृत्यु एक सरिता है जिसमें श्रम से कातर जीव नहाकर,
फिर नूतन धारण करता है काया रूपी वस्त्र बहाकर
निर्भय स्वागत करो मृत्यु का , मृत्यु एक  है विराम स्थल
जीव यहां से फिर चलता है पाकर नव जीवन संबल।।‘‘
शिव ‘संहार‘ के अधिष्ठाता देव है। नूतनता के लिए प्राचीनता का लोप होना अनिवार्य हैं। निर्माण ही निर्माण सृजन ही सृजन- जीवन में नीरसता भर देंगे- नवीनता व नूतनता का आभास समाप्त हो जाएगा अत: विध्वंस या संहार या अपघटन आवश्यक है। संहार एक नैसर्गिक प्रक्रिया है। शरीर में नई कोशिकाएं बनती रहती है, पुरानी कोशिकाएं मरती रहती है- नई कोंपलें आती है, पुरानी पत्तियां झड़ती रहती हैं। नया दिन निकलता है, पुराना दिन रात्रि में खो जाता है ताकि पुरानापन समाप्त कर एक नई उमंग उत्साह लेकर पुन: आए- अत: रात्रि आवश्यक है। यही नए उत्साह की भावना छिपी है महापर्व महाशिवरात्रि में। दिन को महत्व मिला है रात्रि के कारण, प्रकाश को महत्व मिला है अंधकार के कारण। जीवन को महत्व मिला है मृत्यु के कारण- शिव ही महामृत्युंजय है। जब प्राणी घोर कष्ट और दुख से आक्रांत होता है तो उसे महामृत्युंजय के जाप का परामर्श दिया जाता है। महामृत्युंजय शुभत्व प्रदान ·रते है अपने शरणागत को -
‘‘मृत्युंजय महारूद्रे त्राहि मां शरणागत। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि पीडि़तं कर्म बन्धनै:।।
निद्रा की प्रवृति, तामसिक मानी गई है किंतु यह तामसिकता जीवन का अनिवार्य अंग है, निद्रा के बिना प्राणी का जीवन संभव नहीं- तमस के अधिष्ठाता देव शिव- निद्रा और चिरनिद्रा- प्राणी को देकर जो शुभत्व प्रदान करते है, वह शिव की प्राणी पर दैवीय कृपा है। निद्रा के लिए अंधकार अपेक्षित है और अंधकार के लिए रात्रिमय वातावरण- अत: महापर्व महाशिवरात्रि में ऐसा शुभ अवसर साधक को सहज प्राप्त होता है।
भगवान राम के विवाह में अशुभ अमंगल को दूर कर दिया गया था जिससे सभी अशुभ अमंगल दुखी थे- भगवान शिव ने अपने स्वयं के विवाह में उन्हें आमंत्रित किया और बाराती बनकर वे सभी अशुभ अमंगल शामिल हुए। कृष्ण कहते है-
‘‘शुभा शुभ परित्यागी, भक्तिमान्य: स मे प्रिय:।
शुभ और अशुभ के प्रति समान भाव रखने वाला भक्त मुझे प्रिय है- भगवान शंकर ही, विष्णु अवतार कृष्ण की कसौटी पर खरे उतरे है।
देव शब्द का अर्थ है देने वाला, जो देता है वह देव। अखंड शांति, चिर विश्राम, निर्वाण शिव ही दे सकते हैं। इसलिए शिव को महादेव कहा गया है। पाप शमन करने वाले होने से वे शंकर हैं। व्यवहार में दुष्टता नहीं, छल नहीं, छलावा नहीं इसलिए वे भोले कहे गए है।
महाशिवरात्रि का महापर्व आता है फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को। ज्योतिष की दृष्टि से इस दिन चंद्रमा सूर्य के समीप होते है। चंद्रमा मन के प्रतीक है और सूर्य आत्मा का। आत्मा और मन का ए किरण ही मुक्ति है। इस महापर्व में जो रात्रि जागरण किया जाता है वह भी प्रतीकात्मक है। मुमुक्ष व्यक्ति सदैव जाग्रत रहता है। कृष्ण कहते हैं -
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पष्यतो मुने:।।
संसारी व्यक्तियों के लिए जो रात्रि है उसमें संयमी जागे रहते है- महापर्व जागरण और जागृति का संदेश लाता है। द्धईशान संहिता में आता है-
शिवरात्रि वृतं नाम सर्वपाप प्रणाशन। आचाण्डाल मनुष्याणां भुक्ति मुक्ति प्रदायक।।
महापर्व महाशिवरात्रि सभी पापों को हरने वाली है तथा मुक्ति प्रदान करने वाली है।
पता 
साबले बाड़ी, बरारीपुरा छिंदवाड़ा
मो- 919926347997

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें