इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

लोकतंत्र का रास


  • अशोक '' अंजुम ''
लोकतंत्र से लोक का, मुश्किल हुआ निबाह
राजाजी की जीभ पर, बैठा तानाशाह
लोकतंत्र की खाद का ये था असर महीन
समरसता की अंतत: बंजर हुयी ज़मीन

लोकतंत्र की राह में, राजतंत्र की धूम
शीश झुका जय - जय करे, उमड़ा हुआ हुजूम

बाहुबली कुर्सी चढ़े, हुए श्रेष्ठतम सिद्ध
जनता गौरैया बनी, नेता जैसे गिद्ध

मनमोहन की बाँसुरी, लोकतंत्र का रास
आये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास

अंधकार का हो रहा, लोकतंत्र अभ्यस्त
करते - करते जागरण, हरकारे है त्रस्त

पोस्टमार्टम से हुआ, ये जनता को ज्ञान
नेताजी की अब तलक, थी कुर्सी में जान

समरसता के नाम पर, कर बापू को याद
राजघाट पर रोज ही, सिसके गाँधीवाद

मुँह बिचकार कह रही, ' अंजुम' जेल तिहाड़
कहाँ - कहाँ से भर दिया, लाकर यहाँ कबाड़

' अंजुमजी ' इस दौर में, यही कष्ट है मात्र
हो प्रविष्ट किस भाँति अब सही जगह पर पात्र 

पता
सम्पादक '  अभिनव प्रयास '
गली - 2,चन्द्रविहार कॉलोनी, 
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