इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

मो. कासिम खॉन तालिब की गज़ल़

सबने ही यौवन देखा है।
किसने पावन मन देखा है।
अब तो दोस्त बनाकर देखो
अब तक तो दुश्मन देखा है
मुझपे दोष बताने वाले
क्या तूने दरपन देखा है
चंदा को रोटी समझा था
हाँ, मैने बचपन देखा है।
सच्चाई के पथ पर मैंने
उलझन ही उलझन देखा है
जिनमें कोई बात नहीं है
उनका भी वन्दन देखा है
अच्छे - अच्छे लुट जाते हैं
फनकारों का फन देखा है
' तालिब ' रेगिस्तानों में भी
हमने तो उपवन देखा है
पता-
14, अमीर कम्पाउण्ड, बीएनपी रोड
देवास (म.प्र.)
मोबा. 9754038864

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें