इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

न छत्‍तीसगढ़ी में कुछ सोचो, न ही कुछ लिखो बस छत्‍तीसगढ़ी राजभाषा का झुनझुना बजाने में मस्‍त रहो ?

'' चढ़ने '' का मतलब समझते  है राजभाषा आयोग के सचिव.......?

24 और 25 फरवरी को राजधानी के रवीन्द्र सांस्कृतिक सभागार, कालीबाड़ी स्कूल परिसर में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का द्वितीय ’प्रांतीय सम्मेलन 2014’ संपन्न हुआ। कहा जा रहा है कि इस दो दिवसीय आयोजन में छत्तीसगढ़ के लगभग 500 विद्वान-साहित्यकार, कलाकार एवं पत्रकार एकत्रित हुए। छत्तीसगढ़ में और भी बहुत से विद्वान हैं जिनका उल्लेख न तो आयोग द्वारा छपवाए गए आमंत्रण-पत्र में हुआ है और न ही जो पाँच सौ विद्वानों-कलाकारों की भीड़ थी उसमें नजर ही आये। पिछले आयोजन में भी ऐसा ही कुछ नजारा देखने में आया था। साहित्यिक अस्पृष्यता और वर्गभेद की आशंका को जन्म देने वाली ऐसी घटना क्या अनजाने में हो रही है, या किसी नीति के तहत हो रही हैं ? जैसा भी हो, पर है यह दुखद।
दो दिनी इस आयोजन में उपस्थित साहित्यकारों को अपनी बातें कहने के लिये और विभिन्न मुद्दों-विषयों पर गहन चर्चा-विमर्श करने के लिये कुल सात सत्रों (समापन सत्र को मिलाकर) का आयोजन किया गया था। उम्मीद थी कि इन सत्रों में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के उद्देश्यों और लक्ष्यों पर और इन उद्देश्यों और लक्ष्यों को प्राप्त करने के विभिन्न उपायों और प्रयासों पर चर्चाएँ होगी, और इस हेतु योजनाएँ भी बनाई जायेगी। परंतु खेद का विषय है कि इन सत्रों के लिये निर्धारित विषयों में से ’छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग’ गठन के पीछे का उद्देश्य और लक्ष्य पूरी तरह गायब थे, चर्चाएँ क्या खाक होती। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के वेब साइट पर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के पीछे निम्न उद्देश्यों और लक्ष्यों का उल्लेख किया गया है -
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग
(छत्तीसगढ़ शासन)
उद्देश्य/लक्ष्य
राज्य के विचारों की परम्परा और राज्य की समग्र भाषायी विविधता के परिरक्षण, प्रचलन और विकास करने तथा इसके लिये भाषायी अध्ययन, अनुसंधान तथा दस्तावेज संकलन, सृजन तथा अनुवाद, संरक्षण, प्रकाशन, सुझाव तथा अनुशंसाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ी पारम्परिक भाषा को बढ़ावा देने हेतु शासन में भाषा के उपयोग को उन्नत बनाने के लिए ‘‘छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग’’ का गठन किया गया है। आयोग के प्राथमिक लक्ष्य एवं उद्देश्य निम्नांकित हैं:-
1. राजभाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज कराना
2. राजकाज की भाषा में उपयोग
3. त्रिभाषायी भाषा के रूप में प्राथमिक एवं माध्यमिक कक्षाओं में पाठ्यक्रम में शामिल करना
ऐसे उद्देश्यहीन आयोजनों का क्या औचित्य जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रूपयों की आहूति दे दी जाती हो?
छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाये जाने के संबंध में हो अथवा प्राथमिक कक्षाओं के लिए शिक्षण का माध्यम बनाने के विषय में हो, चाहे आयोजन के किसी सत्र में इस पर कोई चर्चा न की गई हो, परंतु सत्र के बाहर और मंच के नीचे उपस्थित लगभग हर साहित्यकार परस्पर केवल इन्हीं विषयों पर चर्चा कर रहे होते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से ही ये ऐसे बहुचर्चित विषय रहे हैं जो चर्चा के रूप में पढ़े-लिखे लोगों के बीच हर जगह और हर मौके पर उपस्थित रहते आये हैं और जिसके लिए किसी विशेष चर्चा-गोष्ठी के आयोजनों की दरकार भी नहीं है। पर इस प्रकार की चर्चाएँ मूल्यहीन होती है। पान ठेलों में गपियाते हुए, बाजारों, सड़कों और सफर के दौरान टाईम पास करने के उद्देश्य से चर्चा करते हुए ऐसे बहसों का वह मूल्य तो कदापि नहीं हो सकता जो राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित इन आयोजनों के विभिन्न सत्रों में विद्वानों के बीच होने से होता। 
पर ठहरिये। जरा सोचें। कल्पना करें कि बच्चा बिगड़ा हुआ है, किसी चीज के लिए मचल रहा है। अभिभावक को काम करने में बाधा पड़ रही है। समझदार अभिभावक बच्चे को उसकी इच्छित वस्तु देकर चुप करा देता है। बच्चे का ध्यान अब अपने अभिभवक की ओर से हटकर झुनझुना बजाने की ओर चला जाता है। तब अभिभावक अपनी मनमानी करने के लिये स्वतंत्र हो जाता है।
छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाने अथवा त्रिभाषायी भाषा के रूप में प्राथमिक एवं माध्यमिक कक्षाओं में पाठ्यक्रम में शामिल करने की बातें, ऐसा ही एक झुनझुना है। छत्तीसगढ़ के लोगों, न तो छत्तीसगढ़ी में कुछ सोचो और न ही कुछ लिखो; बस, छत्तीसगढ़ी राजभाषा का झुनझुना बजाने में मस्त रहो।
छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों के बीच साहित्यिक अस्पृष्यता और वर्गभेद जैसी लकीर खीचने वाले और यहाँ के पढ़े-लिखे लोगों को छत्तीसगढ़ी राजभाषा का झुनझुना पकड़वाने वाले ऐसे आयोजनों को आप असफल कह सकते हैं?
तब भी छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी को मातृतुल्य प्रेम करने वाले ऐसे छत्तीसगढ़िया साहित्यकारों की कमी नहीं है जो पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले से ही ( और कई उसके बाद में भी ) छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों, गाँवों और कस्बों के स्तर में साहित्यिक संस्थाएँ बनाकर बिना किसी शासकीय अनुदान के ही ( क्योंकि मांगने पर भी इन्हें आश्वसनों के अलावा कुछ मिलता ही नहीं ) अपनी प्रिय मातृभाषा छत्तीसगढ़ी की सेवा और साहित्य सृजन में निरंतर रत हैं। इनमें से कई साहित्यिक संस्थाएँ पंजीकृत भी हैं। इन संस्थाओं को अपने दम पर चलाने वाले समर्पित और जुनूनी साहित्यकारों के द्वारा निरंतर साहित्यिक संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं, जिनका स्तर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा करोड़ों रूपयों के आयोजन के स्तर से कही लाख दर्जे की होती हैं। ये लोग अपनी खून-पसीने की कमाई खर्च करके अपनी पुस्तकों को छपवाते हैं और छपवाकर मुफ्त में बाँटते भी हैं।
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पास ऐसी कितनी साहित्यिक संस्थाओं की और उनसे जुड़े हुए कितने साहित्यकारों की जानकारी है ? आयोग अपने प्रान्तीय सम्मेलनों में इनमें से कितनी संस्थाओं को सहभागी बनाता है अथवा कम से कम उन्हें आमंत्रित ही करता है ? क्या आयोग ने ऐसी संस्‍थाओं को कभी वित्तीय सहायता भी प्रदान किया है ?
छत्तीसगढ़ी भाषा कहावतों और मुहावरों की भाषा है। छत्तीसगढ़ी में कहावतों और मुहावरों को हाना कहा जाता है। बात-बात में हानों का प्रयोग करना छत्तीसगढ़ी बोलने वालों का स्वभाव है। एक हाना है - ’’ किसी के ऊपर या किसी की माँ-बहन के ऊपर चढ़ना ’’ जिसका अर्थ होता है माँ-बहन की इज्जत से खेलना अथवा बलात्कार करना। गौरव की बात है कि देश ही नहीं विदेशों में भी समादृत हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के सुप्रसिद्ध  कवि पदश्री डॉ. सुरेन्‍द्र दुबे छत्‍तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के सचिव है। डॉ. दुबे जी वर्षों से छत्तीसगढ़ के हर कवि सम्मेलन में एक कविता सुनाते आ रहे हैं जिसकी कुछ पक्तियाँ इस प्रकार हैं - ’’बस्तर ले निकल, अमटहा भाटा ल चुचर, बमलई म चढ़, इही ल कहिथे छत्तीसगढ़।’’ माँ बमलई न केवल छत्तीसगढियों की़ अपितु संसार भर में निवासरत अनेक हिन्दुओं की आराध्या देवी हैं। डोगरगढ़ की पहाड़ियों में स्थित माँ बमलेश्वरी मंदिर की गिनती हिन्दुस्तान के प्रमुख शक्तिपीठों में होती है। मंचों पर काव्यपाठ करते हुए और बड़े गर्व के साथ ’बमलई म चढ़’ कहते हुए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के यशस्वी सचिव व हमारे प्रदेश के महान साहित्यकार डॉ. सुरेन्द्र दुबे को तनिक भी लाज नहीं आती होगी ? क्या छत्तीसगढ़ की प्रमुख आराध्या देवी के लिये इस हद दर्जे की कविता लिखने वाले और छत्तीसगढ़ के सवा दो करोड़ लोगों की भावनाओं को आहत करने वाले ऐसे तथाकथित महान कवि-साहित्यकार को छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सचिव पद पर बने रहने का अधिकार भी बनता है?
सोचिये।

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