इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

कला की अपेक्षा चिंतन के लिए झकझोरती कहानियाँ

यशवंत मेश्राम
पुस्तक का नाम : इन्द्रधनुष [ कहानी संग्रह]
लेखक :  डॉ. संजय दानी
प्रकाशक : वैभव प्रकाशन, रायपुर
मूल्य : 150/रू.[एक सौ पचास रूपये]

  • यशवंत मेश्राम

संग्रह में आधुनिक अर्थव्यवस्था से संचालित समाज-परिवार कुल सात ’इन्द्रधनुषी’ कहानियाँ, सात सतरंगी द्वीप समूहों का आकलन कराती हैं,और भावों-विचारों से अंतर्वस्तु का निर्माण करती हैं। कहानियाँ ’ कला’ की अपेक्षा ’ चिंतन’ के लिए पाठक को झकझोरती हैं।’अधिग्रहण’ नामक कहानी लालसलाम-कंपनियों का समझौता लगती है।आखिर उद्योगों के लिए कृषि - जमीन ही क्यों ? कहानी से यह प्लाट गायब है। जमीन से जुड़ा कुंजबिहारी कंपनी से जुड़ जाता है। दानी जी को चिंता इस बात की है कि कंपनी / प्लांट जिनमें मात्र 6 प्रतिशत ही भारतीयों का जीवन सुधर रहा है, पर 75 प्रतिशत कृषि और उसके भरोसे 90 प्रतिशत भारतीयों की तबाही की ओर लेखक का ध्यान न जाना अन्याय संगत है। अधिग्रहण का दूसरा पहलू यह है कि हम विनाश की ओर जा रहे हैं। कहानियों में इस तथ्य को अप्रत्यक्ष रूप से दर्शाया गया है। ’ श्राद्ध ’ में सपना है। सपने जुए से नहीं साकार होते, कर्मयोगिता से सफल होते हैं। ’’ उनका सपना था कि इस मुल्‍क के दस सबसे अमीर आदमियों में उनका भी नाम सुमार हो।’’ बाबूलाल अग्रवाल का लिखित बयान मरणोपरांत कहानीकार दर्शाता है -’’ व्यापार में जो चाहो, जितना चाहो रिस्‍क  लेना पर तेजी और जल्दी से पैसा कमाने के लिए कभी तेजी-मंदी के धंधे में हाथ न डालना।’’
वैष्विक युग में संतोष परमसुखम नहीं होता। शार्टकट से जादा मुनाफा कमाने के लिए अवैधानिक रिवाज अपनाना एक रिवाज बना हुआ है। रुतबा स्थापित करना एक रस्म हो गया ... ये बर्बादी के तट हैं। कहानी अनावश्यक लंबी हो गई है, संक्षेप में भी समेटा जा सकता था। विस्तारिता भी एक कला है, जो यहाँ गायब है। ’ सुप्रिया’ कैसे वेश्यालय पहुँची इसका जिक्र न कर भी कहानी में गतिशीलता रही। दुखांत कहानी किसी के फायदे की न रही। आँसू लेकर जीना क्या है ? सुप्रिया के, और न ही विनोद के। लड़कियों को चिडिय़ा समझने वाले नौजवानों की हालत ठीक नहीं रहती। राह कठिन होती है।
प्रतिशोध में जीने की चेतना विनोद को आई नहीं।
मानव सेवा सन्यासी बनकर नहीं कर सकते ? मानव-मानव एक समान घासीदास का सत्य है? तो बुद्ध ने सन्यास विवाह पश्चात् लिया ? बुद्ध का गृहत्याग क्या था ? मानव सुख की खोज ? या असीम शांति की प्राप्ति ? घासीदास, बुद्ध, महावीर में पाखण्ड नहीं था। ये निश्चित है। वर्तमान में पाखण्ड-सन्यास क्यों पनपा ? अपने गुनाहों को छिपाने के लिए ? अनेकानेक प्रश्नों को लेकर विश्लेषण करती है ’सन्यास’ कहानी। सुबह का भूला शाम को घर पहुंचेगा तो ? आज के जमाने में देरी से पहुँचेगा। देर रात तक। रोडब्रेकर जो हैं इसी समाज से हैं। उच्चकोटि की कहानी है। परंपरागत शैली में लिखित ’प्रवृत्ति’ आस्तीन के साँप को उजागर करती है। साँप को कितना ही दूध पिलाओ, जहर ही उगलेगा। सौ टके की बात, साँप कभी दूध पीता ही नहीं। डॉ. संजय दानी स्वयं डॉक्टर हैं, साँप को दूध पिला दिया ? शायद मुर्दे को जिंदा होते देखा होगा। कहानी में मनोहर द्वारा तक्षक को  दूध पिलाना प्रतीक है। प्रतीक आधुनिक शोषण का स्वार्थ स्वरूप है। प्राचीन शैली के आधुनिक राग-विराग का बखान आख्यान हैं - ’’हमें पानी में जिंदा रहने का आशीर्वाद तो ऊपर वाले ने दिया है पर पानी के इस बहाव में अपने मनमाफिक तैरने का वरदान हमें नहीं मिला हे। बेवजह की गर कोशिश करूँगा तो,अपने वतन पहुँचने की जगह धमधा या दुर्ग पहुँच जाउँगा और उन स्थानों पर मेरे दुश्मनों का राज है। राजनीतिक गुण्डागर्दी की भाषा में आवाज दें तो ? एक नागनाथ है दूसरा साँपनाथ है। सुंदर सामाजिक तस्वीर पेश करती है ’प्रवृत्ति’ कहानी।
’रैट रेस’ का आर्थिक युगीन अंतर्व्‍दद  रूपये  हेतु शीघ्रता से सफलता के ऊँचे मापदण्डों को पा लेने की बेतहाशा दौड़, वर्तमान के प्रति असंतुष्टि और सामान्य तौर से रूचिकता से उसी काम में रहते हुए क्रमवार उसी कंपनी में उच्चावस्था पा लेने की समान्तर दो संघर्षों की कहानी है। प्रभावित होते हुए एक, कम सकारात्मक है तो दूसरी सफलता अधिक सकारात्मक है। भारतीय व्यवस्था की तंत्रात्मकता असहयोगी है। प्रतिभा भ्रष्टाचारियों द्वारा बलि चढ़ा दी जाती है, जिसका शिकार अर्जुन होता है। भारतीय कंपनियों की पहुँच भी धनपतियों के बिना नहीं चलेगी। व्यवस्था को ’पूर्व’ से सब हिस्सा चाहिए। शायद इसी कारण सामान्य परिवार के अनेक बी. ई. ग्रेजुएट बेकार हैं। रैट रेस देखते हैं। कम रेट पर काम नहीं करना चाहते। व्यवसायिक शिक्षा क्षेत्र का उद्देश्य भटक गया ? व्यवसायिक पाठ्यक्रम और अन्वेशक मात्र अधिक सैलरी या पूँजीपति से जुड़ गया है। यह हमारे देश में ही नहीं,परदेश में भी गहरी जड़ें जमा रहा है। विडंबना है। रैट रेस का नकुल मात्र धन कमाने जैसे स्वार्थी तत्व को नकार कर काम शुरू कर देता है। सफलता के कदम चूमता है। उसे भले बीस बरस लग जाते हैं। संघर्ष पर मुक्तिबोध याद आते हैं - ’मुक्ति अकेले नहीं मिलती।’ क्या रैट रेस संस्‍कृति टुच्ची संस्‍कृति में अंतर है ? ( पृष्ठ 23 ) पर वाक्य हैं - ’’हालाकि सैलरी बहुत कम थी, पर काम मेरे मनमाफिक था। साथ ही ज्यादा पैसे से प्रभावित होकर कभी किसी अन्य कंपनी में शिफ्ट नहीं हुआ।’’ वे कौन से सामाजिक -आर्थिक कारण हैं कि देश के नवजवान बेरोजगार हैं जिन्होंने बी. ई., बी. टेक. किया है? कम दर पर कंपनियों में व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों का शोषण बहुत है। जहाँ भाषा माध्यम भी अड़ंगे डालती है। जिसका निराकरण दु्रतगति से भारत में नहीं हो सका। आई.आई. टी. वाले देश सेवा से कम ही जुड़ पाते हैं। यही रैट रेस कहानी का मजबूत पक्ष है। संजय दानी को बधाई। साजिश में महेश नपुंसक था ? रहस्य ही रहा। चार वर्ष बाद भी वैशाली गर्भधारण नहीं कर पाती। महेश में शारीरिक कमियाँ थी ? वैशाली महेश को नपुंसक क्यों कहती है। फिर विजय से शादी कर मात्र छ: महीने में ही गर्भवती हो जाती है। ’’ किराये की कोख’’ का बचाव है या दौलत एवं दाम्पत्य का सुख। दौलत-शारीरिक संबंध, तथा पुरूष की शारीरिक कमियाँ,ख्वाहिशें मनुष्य को यहाँ-वहाँ की मंजिलें पार करवाती हैं। कल्पना से बाहर तक की भी। संजय दानी ने बड़ी खूबसूरती से इस कहानी को प्रस्तुत किया हैं। कार्य-पैसे की चाह में पत्नी को समय नहीं देना चाहिये ? यह मानसिक कमजोरीहै या शारीरिक ? जवाब तो ’इन्द्रधनुष’ पढऩे से ही मिलेगा। साजिश का तथ्य दौलत है। वैशाली-विजय की चाल है। पाक साफ  दोनों बच निकलते हैं। सजा पाता है श्याम समंघानिया। संस्‍कार -सभ्यता का जबरदस्त संघर्ष -साजिश’ कहानी में है - ’’आज भी स्व. राम बाबू का मकान, दुकान पर मालिक - मालकिन की प्रतीक्षा में बुलंद खड़े हैं।  सांस्‍कृतिक  बदलाव आया। समय अनुसार न ढल सकने वाला मानव टकराव के संग चौपट तो होगा ही।
कहानियाँ घटते क्रम में अर्थात् बड़ी से छोटी, फिर छोटी ...  होती है।
दुर्घटनाएँ, प्रतिशोध, अधिग्रहण ’सन्यास’ से लेखक को अत्यधिक मोह है, ऐसा प्रतीत होता है, संग्रहीत कहानियों में यही सब कुछ बार-बार होता है। क्यों ? संयोग या संजय दानी की टेक्नीक ? कहानीकार सिद्धहस्त होता चलता है। सभी कहानियाँ अर्थव्यवस्था के आसपास घूमती नजर आती हैं।
इन्द्रधनुष में अर्थ का रंग, पाने, खोजने, खोने, रखने, उखाडऩे, उड़ाने और ईज्जत देने में .......आदि, आदि अनेक रंगों में कहानियों में काम आया है। प्रयोग और सफलता प्राप्ति के लिए ’इन्द्रधनुष’ संकलन पढऩा होगा।
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पता 
शंकरपुर, वार्ड नं. 7
गली नं. 4, राजनांदगाँव [ छ.ग.]
पिन - 491441

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