इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

आधुनिक आदर्श आदमी

  • वीरेन्द्र सरल

बहुत पुरानी बात है। एक राजा था। एक दिन राजा ने दरबार में दहाड़ते हुये कहा - '' मंत्रियों! ये मैं क्या सुन रहा हूँ ? क्या हमारे राज्य में एक भी ऐसा आदर्श आदमी नहीं है ,जिसका हम राजकीय सम्मान कर सके  या जिसका नाम राष्ट्रीय सम्मान हेतु प्रस्तावित कर सके ? क्या हमारे राज्य में आदर्श आदमियों का अकाल पड़ गया है ?''
एक मंत्री ने सिर झुकाकर कहा - '' जी हाँ महाराज! अखबारों में मैंने भी कुछ ऐसा ही समाचार पढ़ा है। राजा फिर गुर्राया -जब आपको यह बात पहले से ही मालूम है तो आपने अभी  तक किसी को पकड़कर जबरदस्ती आदर्श आदमी बनाया क्यों नहीं ? सिर झुकाकर खड़े रहने से काम चलने वाला नहीं है मंत्री जी, आप अभी जाइये और हमारे लिये एक आदर्श आदमी ढूंढकर हमारे सामने पेश कीजिए। हम अभी और यहीं उसका सम्मान कर देते हैं।''
मंत्री हाथ जोड़कर थर - थर कॉंपते हुये बोला- नहीं,नहीं महराज! ऐसा अन्याय मत कीजिये। इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं हैं। हमें कुछ समय दीजिये। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि इस राज्य मे जितने भी आदर्श आदमी हैं , उन्हें चुन - चुन कर आपके सामने पेश कर देंगें फिर आप उनका जितना और जैसा सम्मान करना चाहें कर लीजियेगा। हड़बड़ी में यदि किसी गलत आदर्श आदमी का सम्मान हो गया तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा, महराज। एक बार आप ठंडे दिमाग से सोच विचार कर लीजिये फिर हमें आदेश दे तो बड़ी कृपा होगी।''
कुछ समय तक सोचने के बाद राजा ने कहा - ठीक  है,हम आपको एक माह का समय देते है। एक माह के भीतर चाहे जैसे भी हो ,हर हाल में आप हमारे सामने एक आदर्श आदमी पेश करेंगें नहीं तो आपकी नौकरी गई , समझ गये ?''
मंत्री चुपचाप सिर झुकाकर  जो आज्ञा सरकार कहा और दरबार से बाहर निकल आया। राजा की झिड़की सुनने के कारण उसका दिमाग गरम हो गया था। इसलिये वह सिपाहियों को बुलाकर अपना गुस्सा उतारते हुये कहा - राजा का आदेश है कि इस राज्य का कोई भी आदर्श आदमी ,चाहे वह पाताल में ही क्यों न छिपा हो ,उसे पकड़कर पन्द्रह दिनों के भीतर मेरे सामने पेश करो। चारों तरफ  नाकेबंदी कर दो। कोई भागने न पाये। और यदि कोई भागने की कोशिश करे तो उसे पकड़कर उसका वहीं सम्मान कर दो,अंडरस्टेण्ड।''
आदेश मिलते ही सिपाही गाँव - गाँव ,शहर - शहर, घूम - घूम कर आदर्श आदमी तलाशने लगे। वे चप्पा - चप्पा छान मार रहे थे पर कहीं भी किसी आदर्श आदमी का उन्हें नामोनिशान तक नहीं मिल रहा था। सिपाहियों की हालत ठीक वैसे ही हो गई थी जैसे सुग्रीव के आदेश पर सीता माता की खोज में निकले वानरों की हुई थी। वे सोच रहे थे कि ये राजा को भी किसी आदर्श आदमी के सम्मान करने की क्या सनक सवार हो गई है ? आदर्श आदमी के पीछे हाथ धोकर पीछे पडऩे की क्या आवश्यकता है,सम्मान ही तो करना है ,कर देते किसी का भी। आखिर सम्मान तो सम्मान ही होता है। वह चाहे किसी आदर्श आदमी का हो ,चाहे किसी और का। पर क्या करें भाई,राजा का आदेश है तो ढूँढना तो पड़ेगा ही। थके  हारे सिपाही भगवान से बार - बार प्रार्थना कर रहे थे कि भगवन! किसी आदर्श आदमी का पता बतला दीजिये या उससे मिलवा दीजिये जिससे कम से कम प्राण तो बचे। नहीं तो भूख प्यास मे ही दम निकल जायेगा। बहुत प्रयास करने के बाद भी जब कोई आदर्श आदमी पकड़ में नहीं आया  तब सिपाहियों ने एक नया फार्मूला अपनाया।
जहाँ कहीं भी लोगों की ज्यादा भीड़ दिखती ,सिपाही वहीं पहुँच जाते और लोगों को धमकाते हुये कहते - तुममें से जो भी आदर्श आदमी हो सीधी तरह से अपने आपको हमारे हवाले कर दो। बाद में यदि तुम लोगों मे से किसी पर भी आदर्श आदमी होने का अपराध सिद्ध हो गया तो तुम्हारी खैर नहीं। धमकी सुनकर लोग सकपका जाते। डर के मारे सभी लोग कहते - नहीं ,नहीं माई बाप ! हममें से कोई भी आदर्र्श आदमी नहीं है। हम ही क्या हमारे खानदान में कोई भी आदर्श आदमी आज तक न हुआ है और न ही भविष्य में होगा। हूजूर , हम तो आम आदमी हैं , बस दो जून की रोटी की चिन्ता में मरे जा रहे हैं। आदर्श होना तो दूर ,हम तो ये आदर्श किस चिडिय़ा का नाम है ,ये भी नहीं जानते। जाने अंजाने यदि हमसे कभी कोई आदर्श काम हो भी गया हो  तो हमें माफ कर दीजिये सरकार। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि भविष्य में हमसे ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी ।''
ये सब देख सुनकर सिपाहियों की नजरें आपस में मिलती जैसे एक दूसरे को पूछ रही हो -  अब क्या करें ? ये फार्मूला तो बेकार गया फिर वे आगे बढ़ जाते। मंत्री से उन्हें इस काम के लिये पन्द्रह दिन का समय मिला था,जिसमें से तेरह दिन बीत चुके थे। इसलिये उनके चेहरे पर चिन्ता की लकीरें स्पष्ट दिखलाई पडऩे लगी थी। उनका दिल धक - धक करने लगा था।
थक हार कर वे एक जगह बैठकर विचार विमर्श करने लगे। विमर्श के बाद सभी सिपाही अंतिम रूप से इस निष्‍कर्ष पर पहुँचे कि बिना मुखबिर की सहायता लिये इस आपरेशन आदर्श आदमी मे सफल होना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। इसलिये जगह - जगह मुखबिर तैनात करना जरूरी हैं।
दूूसरे ही दिन सिपाहियों के द्वारा मुखबिर तैनात कर दिये गये। उनकी यह योजना तुरंत सफल हुई। एक मुखबिर ने उन्हें सूचना दी कि अमुक स्थान पर एक आदर्श आदमी छिपा है । सिपाही अविलंब दौड़ पड़े और उस स्थान को घेर कर खड़े हो गये।
एक सिपाही ने चिल्लाकर कहा - हमें पता चल गया है कि तुम एक आदर्श आदमी हो और यहाँ छिपे हो। सीधी तरह से हमारे सामने आत्मसमर्पण कर दो। भागने की कोशिश करना बेकार है। तुम चारों तरफ  से घिर चुके हो। भागने की कोशिश करोगे तो यही सम्मानित कर दिये जाओगे।''
उस धमकी का असर हुआ। सामने वाले मकान का दरवाजा खोलकर एक आदमी बाहर निकला। हाथ उठाकर आत्मसमर्पण की मुद्रा में आगे बढ़ते हुये सिपाहियों के पास आया । सिपाहियों की बंदूके उस पर तनी हुई थी। वह बहुत समय तक अपने आपको आदर्श आदमी होने से इंकार करता रहा पर सिपाहियों के सामने उसकी एक न चली। अन्तत: उसे कबूल करना पड़ा कि वह एक आदर्श आदमी है। उसे तुरंत गिरफ्तार कर के मंत्री जी के हवाले कर दिया गया। और मंत्री ने उसे राज दरबार मे राजा के सामने पेश कर दिया ।
राज दरबार में राजा ने उसे घूर - घूर कर देखा। फिर कड़क आवाज में पूछा - तुम पर एक आदर्श आदमी होने का गंभीर आरोप है । साफ  साफ  बताओ की तुम किस तरह के आदर्श काम में संलिप्त रहतें हो। राजा के सामने चालाकी करने का अंजाम तुम भली भांति जानते हो। इसलिये यहाँ जो भी कहना,बहुत सोच समझकर और सच - सच ही कहना ,समझ गये।''
उस आदमी पर राजा की धमकी का कोई असर नही हुआ। उसने निर्भीकतापूर्वक कहा-महाराज मैं सामाजिक समरसता , साम्प्रादायिक सौहाद्र्र और समता मूलक समाज की स्थापना के लिए सतत प्रयत्नशील हूं। अन्याय ,अत्याचार ,भ्रष्ट्राचार के विरूद्ध आवाज उठाता हूँ। भय , भूख ,भ्रष्ट्राचार मुक्त समाज व्यवस्था निर्माण के लिये लोगों में जागृति लाने के लिये अपना सारा जीवन सर्मिर्पत कर दिया है और इन्हीं पवित्र उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये निरन्तर प्रयास कर रहा हूँ।
वह आदमी राजा की परीक्षा मे सफल हुआ था। इसलिये राजा खुशी से उछल पड़ा। उसे गले लगाकर शाबासी देने के लिये राजसिहांसन से बस उतरने ही वाला था। तभी एक मंत्री ने कान में फुसफुसाते हुये कहा - जरा ठहरिये राजन ! ये आप क्या कर रहे हैं ? इसने अभी क्या कहा आपने सुना नहीं ? यदि ये अपने मकसद में कामयाब हो गया तो समझ लीजिये आपकी राजगद्दी गई। राजगद्दी प्यारी है तो इसके सम्मान को गोली मारिये और अपनी कुर्सी की फिक्र कीजिये ,समझ गये ना ?''
राजा के कान खड़े हो गये। उसने तुरंत पैतरा बदलते हुये कहा - अरे यार! तुम तो ओल्ड मॉडल के आदर्श आदमी हो। कहाँ ऐसे पुराने आदर्श काम के पीछे पड़े हो ? कुछ ढंग का काम करो और मजे से रहो। मुझे तो सम्मान करने के लिये आधुनिक आदर्श आदमी की तलाश है। तुम यहाँ से चुपचाप निकल ही जाओ, इसी में हमारा भला है।'' यह सुनकर वह आदमी दरबार से बाहर चला गया।
राजा ने उस आदमी को लाने वाले मंत्री को झिड़कते हुये कहा - क्या आपको अपने लिये अच्छे बुरे आदमी की पहचान नहीं है ? मैंने आपको लेटेस्ट मॉडल का आदर्श आदमी लाने के लिये कहा था , आदर्श काम में संलिप्त रहने वाले को लाने के लिये नहीं। जाओ कोई ढंग का आदर्श आदमी पकड़कर लाओ।''
मंत्री अपना मुँह लटकाये हुये फिर दरबार से बाहर निकल आया। इस बार उसे ज्यादा मेहनत मशक्कत नहीं करनी पड़ी। वह ज्यों ही दरबार से बाहर आया तो देखा कि एक आदमी अपने हाथ में एक मोटा फाइल लिये हुये चिल्ला रहा था। मैं ही हूँ वह आदर्श आदमी ,राजा को जिसकी तलाश है। मैं अपना सम्मान कराने के लिये मरा जा रहा हूँ। भगवान के नाम पर एक बार मेरा सम्मान कर दो बाबा,प्लीज।'' मंत्री जी ने उस आदमी को पहले ध्यान से देखा। पहली नजर में वह उसे पागल नजर आया। वह नजदीक जाकर उसे डाँटते हुये कहा - ये क्या पागलपन है , तुम होशहवाश में तो हो ? यहाँ ये क्या तमाशा बना रखा है ?''
वह आदमी मंत्री जी की चरणों में दण्डवत लोट गया फिर बोला - नहीं ,नहीं, श्रीमान मैं पागल नही हूँ । मैं एक आधुनिक आदर्श आदमी हूँ। आप मेरा फाइल देख लीजिये। यह कहते हुये उसने अपना फाइल मंत्री जी के हाथों में थमा दिया। मंत्री जी ने फाइल देखा ,उसमें तरह - तरह के प्रमाण पत्र और फोटोग्राफ्स बडे ही व्यवस्थित रूप में जमे हुये थे। मंत्री जी गदगद हो गये। उसने उस आदमी को पकड़ कर तुरंत राजदरबार में पेश किया ।
राजा ने वही प्रश्न उससे भी पूछा जो पहले आदमी से पूछा गया था। उस आदमी ने बड़े ही अदब से झुककर पहले राजा को प्रणाम किया फिर पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा की जय हो का जयघोष किया। उसके बाद बोला - '' राजन! मेरा तो हर काम आदर्श है। मैं फर्जी प्रमाण पत्र जुटाने में माहिर हूँ। चाटुकारिता में मुझे गोल्डमेडल प्राप्त है। जिधर दम उधर हम के सिद्धाँत को मैंने आत्मसात किया है। बिना पेंदी के लोटे की तरह लुढ़कने में मुझे दक्षता प्राप्त है। अपने स्वार्थ के लिये गधे को भी बाप कहने में मुझे कोई परहेज नहीं है। जुगाड़ भिड़ाने में एक्सपर्ट हूँ। कोई व्ही आई पी मुझे थप्पड़ भी मार दे तो भी मैं उससे इसका प्रमाण पत्र माँग लेता हूँ और फोटो खिंचवा लेता हूँ और नीचे लिखवा लेता हूँ फलाँ व्ही आई पी से मार खाते हुये। राजा चाहे जो भी करे , मै हमेशा उसका प्रशस्ति गान करता हूँ। मैं आदर्श काम करता ही नहीं बल्कि उसे धारण करता हूँ। आप मेरा फाइल देख लीजिये,इसमें भानुमति के पिटारे से भी ज्यादा प्रमाण पत्र रखे हुये हैं।'' वह कुछ और बताता उससे पहले ही सारे दरबारी ,महाराजाधिराज की जय -  जय कार करने लगे।
राजा ने उस आधुनिक आदर्श आदमी को देखकर कहा - मोगेंम्बो खुश हुआ। मुझे बस तुम्हारे जैसे ही आदर्श आदमी की तलाश थी आज वह पूरी हुई। अब मैं तुम्हें  चैन से सम्मानित कर सकूंगा। राजा ने  एक बार गौर से अपना सिहांसन देखा और मंत्रियो को उस आदमी के राजकीय सम्मान करने की तैयारी का आदेश दे दिया। 

पता - 
बोडऱा (मगरलोड)
पोष्ट-भोथीडीह व्हाया-मगरलोड़
जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)
मो-7828243377

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