इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

जितेन्द्र सुकुमार : दो गज़लें

( 1 )
तुम्हें अच्छा कहूँ या बुरा कहूँ
तुम्हें दर्द कहूँ या दवा कहूँ
कुछ तपन सी है दिल में यारों
तुम्हें आग कहूँ या धुँआ कहूँ
सर झुक जाता है तुम्हारे आगे
तुम्हें इश्‍क  कहूँ या खुदा कहूँ
दीवाने सारे मचल रहे खुशी में
तुम्हें हुस्न कहुँ या नशा कहुँ
आखिरी तमन्ना सी लगती हो
तुम्हें हयात कहूँ या कजा कहूँ
हर बूँद में इक  नया रंग है
तुम्हें नीर कहूूँ या सुधा कहूं
( 2 )
फलक पर सितारे बहुत हैं
मुकद्दर के मारे बहुत है
इक दफा निगाहें खोलों
यहाँ हसीन नजारे बहुत है
जिंदगी कुछ इस तरह है
इक  दरिया, किनारे बहुत है
जाकर देखो हालत - ए - वतन
फूटपाथों पे बेसहारे बहुत है
सोच - समझ के आना मिलने
मेरे मकां में दरारें बहुत है
पता - उदय - आशियाना, चौबेबांधा [राजिम]
जिला - गरियाबंद [छ.ग.] 493885
मोबाईल : 9009187981  

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