इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

जितेन्द्र सुकुमार : दो गज़लें

( 1 )
तुम्हें अच्छा कहूँ या बुरा कहूँ
तुम्हें दर्द कहूँ या दवा कहूँ
कुछ तपन सी है दिल में यारों
तुम्हें आग कहूँ या धुँआ कहूँ
सर झुक जाता है तुम्हारे आगे
तुम्हें इश्‍क  कहूँ या खुदा कहूँ
दीवाने सारे मचल रहे खुशी में
तुम्हें हुस्न कहुँ या नशा कहुँ
आखिरी तमन्ना सी लगती हो
तुम्हें हयात कहूँ या कजा कहूँ
हर बूँद में इक  नया रंग है
तुम्हें नीर कहूूँ या सुधा कहूं
( 2 )
फलक पर सितारे बहुत हैं
मुकद्दर के मारे बहुत है
इक दफा निगाहें खोलों
यहाँ हसीन नजारे बहुत है
जिंदगी कुछ इस तरह है
इक  दरिया, किनारे बहुत है
जाकर देखो हालत - ए - वतन
फूटपाथों पे बेसहारे बहुत है
सोच - समझ के आना मिलने
मेरे मकां में दरारें बहुत है
पता - उदय - आशियाना, चौबेबांधा [राजिम]
जिला - गरियाबंद [छ.ग.] 493885
मोबाईल : 9009187981  

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