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गुरुवार, 22 मई 2014

बसंत की कुचियों में ग्रामीण जनजीवन मूर्तरुप लेता है

सुशील भोले

सुशील भोले
रंगों में ढलकर सहज और सरल जनजीवन असीम आंनद की किस तरह प्रतीती करा सकते हैं इसका अनुभव बसंत साहू
की पेंटिंग को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। आदिवासी जनजीवन में घुले रंगों से बनाई गई बसंत साहू की पेंटिंग में कभी खिलौने वाली का सहज सौंदर्य अभिभूत करता है, तो कभी बकरी चराने वाली वन बालाओं का सरल जीवन आकृष्ट करता है। बैलगाड़ी में सवार बाराती, मछली बेचने वाली, राउत नाचा की टोली, सुवा नाचती युवतियों की टोली, मुर्गा लड़ाई में रमे ग्रामीण जैसे जनजीवन को उकेरती बसंत साहू की पेंटिंग में रंगों का उछाह कुछ इस तरह है कि ग्रामीण जनजीवन मूर्त रूप लेता प्रतीत होता है।
बसंत साहू
15 दिसंबर 1995 को 23 वर्ष की अवस्था में दुर्घटना ग्रस्त होने के बाद रंगों को जीवन का संबल बनाने वाले बसंत साहू कहते हैं -  सहज और सरल जीवन का हिमायती हूं। और यही कारण है कि मेरी पेंटिंग में सहज और सरल जीवन चित्रांकित रहते हैं। दुर्घटना के पहले ग्रामीण जीवन के जिन रंगों को अनुभूत किया था आज उसे ही अभिव्यक्त कर रहा हूं। सभी रंगों के प्रति मेरा लगाव है लेकिन नारंगी और भूरे रंग मेरी पेंटिंग में अनायास ही घुल जाते हैं। लोकजीवन के साथ - साथ आध्यात्मिक चित्रण की ओर मेरा रुझान है। मैं अनुभूत करता हूं कि एक दिव्य शक्ति है जो अनवरत रंग बिखेरती रहती है। इस अनुभूति को केनवास में उकेरते हुए मुझे असीम आनंद की प्राप्ति होती है। जो कुछ मैंने सीखा है प्रकृति से सीखा है। हजारों पेंटिंग बनाने के बावजूद मैं प्रोफेशनल आर्टिस्ट नहीं बन पाया हूं। मैं किसी के आर्डर पर पेंटिंग नहीं बनाता हूं। चित्रकला को मैं तपस्या मानता हूं। रंगों से खेलना ही मेरा जीवन है। जिस दिन रंगों से नहीं खेल पाऊंगा उस दिन मेरा जीवन थम जाएगा। बसंत साहू  के चित्रों की प्रदर्शनी अनेक स्थानों पर हो चुकी है। उनका पता है -  बसंत साहू, पिता श्री श्याम साहू, सरोजनी चौक, कुरुद, जिला धमतरी छत्तीसगढ़ मोबाइल नं 098937 50570
पता :- 
संजय नगर, टिकरापारा
रायपुर छ.ग. मोबा.  080853 - 05931, 098269 - 92811
ईमेल  sushilbhole2@gmail.com, blog -  mayarumati.blogspor.com

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