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गुरुवार, 22 मई 2014

जीवन नगरी पर सदियों से

कृपाशंकर शर्मा '' अचूक ''
जीवन नगरी पर सदियों से शासित कर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
किसी किसी को दृष्टिदोष ने
दूषित कर डाला
कोई तो है अमृत पीता
और कोई हाला
उछल रहा बाजार अजब - सा धीरज धर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
पंखों बिन उड़ान है भरते
नील गगन नीचे
जिसकी जैसी ताकत होती
इधर उधर खींचे
दोनों ओर लगी है होड़ें नदी न उतर सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
चौबे जी छब्बे बनने में
सब कुछ भूल गए
चकाचौंध जगती में आ के
उलटे फूल गये
उधड़बुनी के चक्कर खाते तनिक सुधर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
जोड़ रहे सब अपनी - अपनी
कटी हुई नाकें
अपनी ओर कभी न देखा
दुनियां को ताके
गज भर की अचूक छाती ले खुद से डर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके

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