इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 22 मई 2014

जीवन नगरी पर सदियों से

कृपाशंकर शर्मा '' अचूक ''
जीवन नगरी पर सदियों से शासित कर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
किसी किसी को दृष्टिदोष ने
दूषित कर डाला
कोई तो है अमृत पीता
और कोई हाला
उछल रहा बाजार अजब - सा धीरज धर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
पंखों बिन उड़ान है भरते
नील गगन नीचे
जिसकी जैसी ताकत होती
इधर उधर खींचे
दोनों ओर लगी है होड़ें नदी न उतर सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
चौबे जी छब्बे बनने में
सब कुछ भूल गए
चकाचौंध जगती में आ के
उलटे फूल गये
उधड़बुनी के चक्कर खाते तनिक सुधर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
जोड़ रहे सब अपनी - अपनी
कटी हुई नाकें
अपनी ओर कभी न देखा
दुनियां को ताके
गज भर की अचूक छाती ले खुद से डर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके

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