इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 22 मई 2014

उसके हाथों में नहीं

ब्रजभूषण चतुर्वेदी '' ब्रजेश ''
उसके हाथों में नहीं आजादी की रेख।
अब भी धनिया ढो रही, सिर पर मैला देख।।
संविधान ने दे दिया, समता का अधिकार।
पर होरी के भाग्य में, लिखी वही बेगार।।
सब रिश्तों को भूल कर, बस दौलत से प्यार।
आज आदमी कर रहा, यह कैसा व्यवहार।।
बहशी बाजों ने किया, जब से लहूलुहान।
खोई है उस रोज से, चिडिय़ा की मुस्कान।।
आजादी की भोर में होरी मिला उदास।
रहन महाजन के रखा खुशियों का मधुमास।।
काले धन की हो रही चर्चा चारों ओर।
कैद तिजोरी में हुई, आजादी की भोर।।
आज व्यवस्था दे रही, कैसे - कैसे घाव।
अंतर से उठने लगा, पीड़ा की सैलाव।।
लूट अपहरण हादसे, हत्या बलात्कार।
लाते हैं खबरें यही, रोज सुबह अखबार।।
नेताओं ने कर दिये, सपने लहूलुहान।
आजादी हित जो दिये, व्यर्थ गये बलिदान।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें