इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 22 मई 2014

पाठकों की कलम से

एक अच्‍छा अंक, बधाई 
विचार वीथी अंक फरवरी-अप्रेल 2014। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग उद्देश्यहीन है। राजभाषा बन जाना और बात है, सदुपयोग होना अलग चीज है। छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिक - माध्यमिक पाठयक्रमों में लागू करना ढकोसला है। रूपयों का दुरूपयोग है। जनता के साथ छल है। छत्तीसगढ़ी भाषा में पाठ्यक्रम लागू करने के पूर्व ध्यान देना पड़ेगा -
1. सर्वेक्षण। 2. माता-पिता, बालक - बालिका और समाज कितनी स्वीकृति प्रदान करता है। 3. औद्योगिक पृष्ठभूमि वाले छत्तीसगढिय़ा कितने हैं जो इस भाषा में पढ़ पायेंगे। 4. कितने छत्तीसगढ़ी भाषा शिक्षक हैं जिन्होंने स्नातकोत्तर विषय के रूप में छत्तीसगढ़ी को पढ़ा है। 5. शासकीय - अशासकीय क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ी भाषियों को लेकर कितनी नियुक्तियाँ हैं?
उपरोक्त कारणों के बिना छत्तीसगढ़ी भाषा लागू की गई तो जस हाल माधो, तस हाल उधो ही होगा। सर्वोत्तम उदाहरण ’हिन्दी’ हैं एक विशिष्ट उदाहरण दूँगा, मेरी बात स्पष्ट हो जायेगी। ’’आज भी पचासों साल बाद विद्वान लोग हिन्दी को ’राष्ट्र भाषा’ कह रहे हैं। यह हिन्दी का दुर्भाग्य है। हमने सन् 1948 में अपनी किशोरावस्था में स्व. सेठ गोविन्द दास के साथ हिन्दी का कार्य किया था। फिर 1963 में हिन्दी को मात्र ’राष्ट्रभाषा’ दर्जा दिला पाये। इस भ्रम को लोग आज भी पाले हैं कि हिन्दी ’राष्ट्रभाषा’ है।’’ (श्रीमती सुधा रानी श्रीवास्तव, जबलपुर म.प्र., वैचारिणी, कोलकाता, अंक मार्च-अप्रेल 2013, पृ. 81)  राकेश भारती हिन्दी दशा पर लिखते हैं - ’’आज की पीढ़ी को जिस ’चटनी प्रक्रिया’ से हिन्दी पढ़ाई जाती है वह छात्रों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से काटकर रखती है।’’ ऐसा ही हाल छत्तीसगढ़ राजभाषा का है और आगे भी जारी रहेगा। सर्वेद जायज लिखते हैं - ’’डॉ. सुरेन्द्र को लाज नहीं आती होगी।’’ कैसे आयेगी जब लोग अपनी डफली, अपना राग अलापने लगे हैं।
अंक में मनोज कुमार शुक्ल और संध्या विश्व के आलेख महत्वपूर्ण हैं। ’अरमान’ और ’फूलो’ दोनों कहानी में संघर्ष है; एक में पूर्ण होता है, दूसरे में लड़ाई का उत्सर्ग होने को है। देर-सबेर होगा ही। अर्पणा शाह की कहानी, ’जितना इलाज में पैसा लगेगी, दिक्कत होगी। उससे कम में आसानी से दूसरा बच्चा पैदा कर लोगी’। (पृ.29) तब भला आदर्श मनुष्य की  खोज जारी रहेगा? आजादी गिनने की नहीं समझने, जानने, विचार-विन्यास का विषय है। लघुकथाएँ उत्‍कृष्ट हैं। सर्वेद ने तीन पृष्ठ बेकार में रंगे हैं। महापर्व महाशिवरात्रि से सभी पाप हनन हो जाते तो दुनिया में कोई भी समस्या नहीं रहती। साहित्य के बहाने किसी एक वाद को लेकर चलना संपादक का काम नहीं , जनता-जनार्दन पर छोड़ देना चाहिए। थानसिंह वर्मा की कविता आज के दौर की कविता है। एक अच्छा अंक। सादर बधाई।
यशवंत मेश्राम,  शंकरपुर, वार्ड नं. 4, राजनांदगाँव 491441 (छ.ग.)
वंदनीय कार्य र रहे हैं, बधाई
आपके  द्वारा प्रेषित पत्रिका विचार वीथी हमें प्राप्त हुई। पढ़कर बड़ी खुशी हुई। विषय सामग्री चाहे वह गजल,कविता,कहानी व आलेख वगैरह हो सभी का चयन सावधानी पूर्वक किया गया है। पेपर के साथ प्रिंटिंग का भी स्तर बहुत अच्छा लगा। जिसके लिये आप एवं आपके सहयोगी गण बधाई के पात्र है।
मैं रायपुर में लगभग 11 वर्ष अपने बैंक में सेवा के दौरान रहा। रायपुर नगर के सभी साहित्य मनीषियों का स्नेह व आशीर्वाद मिला। कुछ पुराने अपनत्व भरे पलों की याद तरो ताजा हो आयी है। अच्छा लगा। श्री देवीसिंह चौहान, श्री सरयूकान्त झा, डां. राजेश्वर गुरु, श्री हरिठाकुर, श्री बबन मिश्रा, श्री प्रभाकर चौबे, डां. सालिग राम सलभ, श्री बालचंद कछवाहा, श्री लखनलाल गुप्ता, श्री केयूर भूषण, डां. रामकुमार बेहार, श्री अमरनाथ त्यागी जैसे अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों का सानिध्य सुख प्राप्त हुआ। बड़ा ही आनंद संयोग रहा है।
साहित्य की सेवा वस्तुत: एक समाज ही नहीं वरन राष्ट्र की सेवा है। जो अपने समाज व देश को बौद्धिक स्तर पर जागरुक करने का कार्य कर रही है। इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं। कलम के सिपाही अपनी क्षमता व शक्ति के द्वारा हमारे देश के तम को दूर कर प्रकाश फैलाने का वंदनीय कार्य कर रहे हैं।
मनोज कुमार शुक्ल ''  मनोज '' ,  जबलपुर ( म.प्र.)
48 पृष्ट की पत्रिका में बहुत कुछ मिला, बधाई
विचार वीथी पत्रि·ा लगातार मिल रही है। निश्चित रूप से अब यह पूर्ण साहित्यिक पत्रिका बन पड़ी है। रचनाओं का चयन आप बहुत ही अच्छे ढंग से कर रहे हैं। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं। नवबंर अंक के मुख्य आवरण को देखकर बहुत अच्छा लगा। भीतर की सामग्री ने प्रभावित किया। जहां कुबेर द्वारा अनुदित कहानी मन को भा गया वहीं गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी जिंदगी की  कतरन पढ़कर मन प्रसन्न हो उठा । इसी अंक में इब्राहीम कुरैशी,डां. गार्गीशरण मिश्र मराल, केशव शरण, डां. सुशील गुरु की रचनाएं बहुत ही अच्छी लगी। 48 पृष्ट की इस पत्रिका में आपने इतना कुछ दे दिया जो सोच से बाहर है। पुन: बधाई ...
मंगलदास, जयपुर 

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