इस अंक में :

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गुरुवार, 22 मई 2014

अव्दितीय क्रांतिकारी कवि - कुंज बिहारी चौबे

आचार्य सरोज व्दिवेदी
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में छत्तीसगढ़ के जिन महापुरुषों ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और सामाजिक क्राति के बीज बोए उनमें स्वर्गीय कुंजबिहारी चौबे का नाम सम्मान पूर्वक लिया जाएगा। स्वर्गीय कुंज बिहारी चौबे स्वतंत्रता और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति थे मात्र 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता और समाज सुधार का  इतना काम किया कि छत्तीसगढ़ तथा राजनांदगांव के लिए वह गौरव की बात है।
स्वतंत्रता आंदोलन के कठिन दौर में श्री कुंज बिहारी का जन्म 16 जुलाई 1916 को राजनांदगांव के निकट बजरंगपुर - नवागांव में सभ्रांत ब्राम्हा्रण परिवार में हुआ। छह पुत्रियों के बाद जन्में इस बालक को पिता छबिराम चौबे ने बहुत लाड़ प्यार दिया। परिवार के इस स्नेह ने उन्हें क्रोधी और जिद्दी तो बनाया साथ ही कुछ कर गुजरने की अद्भुत प्रेणना भी दी। प्रखर प्रतिभा के धनी श्री चौबे अपनी क्रांतिकारी विचारधारा के प्रबल  प्रवाह में बहते चले। इस प्रवाह ने उन्हें महात्मा गाँधी और ठाकुर प्यारेलाल सिंह जैसे क्रांतिकारी  लोगों के साथ ही डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे साहित्यकार का चहेता बना दिया। साथ ही अनेक महापुरूषों के क्रांतिकारी  विचारों से प्रभावित श्री चौबे जीवन में ऐसा कुछ कर गये जो हमारे लिये अनुकरणीय है।
छात्र जीवन में ही श्री चौबे ने स्टेट हाईस्‍कूल के विद्यार्थी के रूप में ऐसा कर दिखाया जो बड़े क्रांतिकारियों के लिए ही संभव था। उन्होंने स्‍कूल पर लगा यूनियन जैक उतार कर जला दिया तथा उसके बदले तिरंगा फहरा दिया और हेडमास्टर के पूछने पर साहसपूर्वक अपना यह अपराध स्वीकार लिया। इसके लिए उन्हें इतनी बेंते खानी पड़ी थी कि मारने वाला भी थक गया।  इस घटना से पूरे नगर में सनसनी फैल गई और वह अंग्रेजों की नजर  में चढ़ गये। उन पर निगरानी रखी जाने लगी।
इस घटना ने उनके जीवन की धारा ही बदल दी। और वह राष्ट्रीय आंदोलन और समाज सुधार के गीत गाने लगे। उन्होंने कालेज में प्रवेश तो लिया किन्तु पढ़ाई छोड़कर क्रांति के गीत गाने लगे। उन्हें रियासत से निकाल दिया गया तब वह कुछ समय के लिए गाँधी जी के पास सेवाग्राम चले गए। बाद में वापस आकर उन्होंने गृहस्थी बसाई। साथ ही प्रखर लेखनी से देशभक्ति और समाज सेवा की कविताएं लिखते रहे, उन्होंने अंग्रेजों को ललकारा  -
तैंहर ठग डारे हमला रे गोरा,
आँखी में हमर धुर्रा झोंक दिये
मुड़ म थोप दिये मोहनी,
अरे बैरी जान तोला हितवा
गंवाएन हम दूधो - दोहनी,
अंग्रेज तैं हमला बनाए कंगला
सात समुंदर विलायत ले आ के,
हमला बना दे भिखारी जी
हमला नचाए तैं बेंदरा बरोबर,
बन गए तैंहा मदारी जी
साथ ही उन्होंने नवयुवको को देशभक्ति और समाज सेवा के लिए प्रेरित किया -
नवयुवक उठ, बंधनों को तोड़
बहस औ मुबाहिसे कर बंद
ले न वाद - विवाद में आनंद
व्यर्थ बातों का बतंग्गड़ त्याग
बंधनों को काट हों स्वच्छंद
उन्होंने शराब की बुराइयों के प्रति आगाह करते हुए अनेक कविताएं लिखी। जिनमें एक कविता बड़ी प्रसिद्ध है जो उन्होंने मध्य प्रांतीय कवि सम्मेलन रायपुर में पढ़ी -
मदिरा विष है इससे बढ़कर,
इस दुनिया में कोई पाप नहीं
स्वर्गीय कुंज बिहारी चौबे को किसानों के प्रति अत्यधिक हमदर्दी थी। किसान की दशा पर उन्होंनें अनेक कविताएं लिखीं जिनमें प्रसिद्ध है -
चल मोर भैया बियासी के नागर
अरे, कैसे मजा के बियासी के नागर
बोये हो ऐ दारी खांड़ी जी,
दू खांड़ी के लाने हौं बाढ़ी जी
बुढ़वा हों गे हे मोर बइला के जोड़ी
औ अतरो में छूटे ला है लागा बोड़ी
मुड़ ले हो गे हे करजा ह आगर
चल मोर भैया बियासी के नागर
उन्होंने कुछ चिंतनशील और आध्यात्मिक कविताएं भी लिखी जिसमें एक है मृत्यु भय -
मेरे मन में क्यों बार - बार
उठता है भय का मौन ज्वार ?
यों लगता है तन का अन्तिम
उच्छवास निकलने वाला है
छग - दीप बुझ रहे मेरे
मेरे जग का मिट रहा उजाला है
इस तरह उन्होंने अनगिनत कविताएं लिखी। उनका जीवन असाधारण था और कविताएं विलक्षण थी। वह सभी काम समाज के ढर्रे से हटकर करते थे और सभी बातों पर अपनी प्रखर विचारधारा से विलक्षण तर्क प्रस्तुत करते थे। जिसे देख - सुनकर सभी लोग अचंभित होते थे। यह विलक्षण जीवन जीकर विलक्षण और आकस्मिक ढंग से 5 जनवरी 1944 को काल के गाल में समा गए।
स्वर्गीय कुंज बिहारी चौबे की मृत्यु पर डॉ. नंदूलाल चोटिया ने लिखा -
ह्दय वेदना, शब्द समूहों को
धरती पर मेल रही है
अब भी उसके आँगन पर
उसकी कविता खेल रही है
अब भी अश्रु  ढलक पड़ते है
सिहरे, कर्मठ ज्ञान विचारी
मेरा कवि था, कुंज बिहारी
उनके निधन पर डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, नर्मदा प्रसाद खरे, अवतार श्री मेहर बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ के अनेक महापुरूषों ने उनकी भूरि - भूरि प्रशंसा करते हुए अविस्मरणीय और उल्लेखनीय संस्मरण लिखे हैं।
राजनांदगांव की धरती संस्‍कारधानी कहलाती है क्योंकि यहां उपजे अनेक महापुरूषों ने पुराने संस्‍कारों में परि किया है तथा नये संस्‍कारों को जन्म दिया है, स्व.कुंज बिहारी चौबे ने नांदगांव की माटी को सुगंधि दी है। उनसे हमारा मस्तक जनप्रतिनिधि छत्तीसगढ़ के कर्णधार बने हैं तब हम आशा करते हैं कि महान स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर क्रांतिकारी कवि स्व.कुंज बिहारी चौबे पर कुछ रचनात्मक कार्य अवश्य ही होंगे।
स्वर्गीय चौबे की कुछ कविताओं का संकलन कुछ महान व्यक्तियों के संस्मरणों के साथ उनके  सुपुत्र श्री अविकल चौबे ने अवशेष नाम से प्रकाशित किया है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर अभी बहुत काम बाकी है।
मेरा सुझाव है कि स्व.कुंज बिहारी चौबे पर राजनांदगांव में एक शोध पीठ की स्थापना होनी चाहिए और इस महान कवि की रचना पर काम करके छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को आगे बढ़ाना चाहिए।  
पता 
ज्‍योतिष कार्यालय, मेन रोड,
 तुलसीपुर, राजनांदगांव ( छ.ग.)

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