इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

गुरुवार, 22 मई 2014

लोक की समूहवादी चेतना और राऊत नाच

डां. गोरेलाल चंदेल

लोक श्रम का पर्याय है। लोक को श्रम से और श्रम को लोक से अलग कर दिया जाय तो एक ओर श्रम का अवमूल्यन होगा और दूसरी ओर लोक की अवधारणा गड़बड़ाने लगेगी। मानव समाज का विकास मनुष्य के सामाजिक-श्रम से ही संभव हो पाया है। प्रकृति को अपनी आवश्यकता के अनुरूप रूपान्तरित करने का प्रयास श्रमजीवी वर्ग द्वारा ही संभव हो सका है। आखेट कर भोजन जुटाने, जंगल काटकर कृषि योग्य भूमि बनाने, आधुनिक कल-कारखानों को चलाने में, मनुष्य के सामूहिक श्रम की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विकास के हर युग और हर पहलू पर मानवीय श्रम के अमिट चिह्नों को देखा जा सकता है। उनके इन सामूहिक प्रयासों के चिन्तन को ही लोक दर्शन माना जा सकता है। यही वजह है कि विभिन्न वादों से घिरे हुए दर्शन का लोकजीवन, लोक संस्कृति, लोकभाषा, लोक-संस्कार तथा लोक-धर्म से कोई तालमेल दिखाई नहीं देता। उन दर्शनों को धार्मिक रंग देकर लोक जीवन को उससे रंगने की दिशा में अथक प्रयास के बाद भी लोक का श्रमवादी दर्शन अपने अस्तित्व का आभास करा ही देता है। लोक कला रूपों में, मिथकीय संरचना के भीतर से श्रम की महिमा और श्रम की सामाजिक महत्ता को देखा जा सकता है।
लोक का इतिहास और समाजशास्त्र ' मिथ ' से आवेष्ठित होता है। मिथकों की इतिहास सम्मत व्याख्या से ही लोकजीवन की कला, संस्कृति और सामाजिक जीवन की सामूहिकता का ज्ञान हो सकता है। इन्द्र का ब्रज पर कोप का ही ' मिथ ' ले लीजिय। ' मिथ' के अनुसार गोवर्धन की पूजा से इन्द्र नाराज होकर ब्रज को डुबाने के लिए भयंकर वर्षा करते हैं और कृष्ण सारे ग्वाल-बाल, ब्रजवासियों के साथ गोवर्धन पर्वत को उठाकर इन्द्र के कोप से ब्रज की रक्षा करते हैं। लोकजीवन में ' मिथ ' का यह रूप गोवर्धन पूजा के रूप में आज भी विद्यमान है। दीपावली के दूसरे दिन ' राऊत' (यादव) जाति के लोग नाचते-गाते, ग्राम प्रमुखों को सहयोग के लिए ' परघाते ' हुए, गाँव के बाल-वृद्ध-युवा-नारी-पुरूष के साथ ' सहडा़देव ' में पूजा के लिए इक के होते हैं जहाँ गोवर्धन का प्रतीक गोबर का ढेर रखा होता है। इस गोवर्धन के चारों तरफ  राऊत नाच में निमग्न दल घूम-घूमकर नाचता है और एक गाय को ' सुहई ' बाँधने का रस्म पूरी करता है। इस प्रक्रिया में ' मिथ ' और लोक जीवन की सामूहिकता का जो स्वरूप दिखाई देता है इसमें लोकजीवन की समूहवादी परम्परा का इतिहास आसानी से देखा जा सकता है।
कृष्ण के ' मिथ ' और आज के ' मिथ ' में अद्भुत साम्यता भी दिखाई देती है। कृष्ण ने देव पूजा की परम्परा को समय और काल की कसौटी पर कसकर, अव्यवहारिक और अनुपयोगी सिद्ध कर, समाज में परिवर्तन का शंखनाद किया था और पूजा को प्रकृति के साथ जोड़कर जीवनोपयोगी बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास किया था। उन्होंने जीवन और समाज के लिए उपयोगी प्रकृति की पूजा को देवपूजा से ज्यादा जरूरी माना। इसीलिए उन्होंने इन्द्र की पूजा का निषेध कर, गोवर्धन की पूजा की शुरूआत की। सामाजिक परिवर्तन के इस महान् कार्य में कृष्ण अकेले नहीं थे वरन् उस युग का संपूर्ण यादव समाज उसके साथ था। परजीवी देव जाति का इससे कुपित होना स्वाभाविक ही है। इससे उनकी पूजा में व्यवधान डाला जाना ही प्रतीत होता है।
साथ ही इस ' मिथ ' की यदि ऐतिहासिक चीर-फाड़ की जावे, वैज्ञानिक विश्लेषण किया जावे तो यों प्रतीत होता है कि कृष्ण-काल में यमुना में महाप्लावन जैसे कोई भयंकरतम बाढ़ आई रही होगी और कृष्ण के नेतृत्व में ब्रज और गोकुल के तमाम निवासियों ने गोवर्धन पर्वत में शरण लेकर बाढ़ से अपनी रक्षा की होगी। किन्तु यह मात्र अनुमान है। इस दिशा में शोध कर इसकी ऐतिहासिकता सिद्ध की जा सकती है।
इन दोनों स्थितियों में लोक समाज का समूहवादी दर्शन बहुत स्पष्ट हो जाता है। इन्द्र से रक्षा के लिए जिस तरह सभी लोगों ने मिलकर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया ठीक उसी तरह बाढ़ से रक्षा के लिए भी सभी लोगों ने एक दूसरे का सहयोग करते हुए गोवर्धन पर्वत में शरण ली होगी। दोनों स्थिति में इस संकट से मुक्ति के पश्चात् यादवों का, प्रकृति सुलभ प्रसाधन सामग्रियों से सज-धजकर नृत्यगान करना भी स्वाभाविक ही प्रतीत होता है। इसीलिए इस नृत्य में लय अथवा ताल की शास्त्रीय नाप-जोख की अपेक्षा हृदय में उत्पन्न होने वाले उत्साह की लहरों का नाप-जोख अधिक जरूरी लगा है। आज भी  ' राऊत नाच ' में शास्त्रीय व्याकरण भले ही न हो किन्तु लोकजीवन का उत्साह, लोकजीवन की मस्ती अपने चरम पर दिखाई देती है।
लोक दर्शन समूहवादी दर्शन होता है। लोकजीवन में तमाम कलाओं का जन्म सामूहिक प्रयास से ही हुआ है। लोक समाज एक साथ नाचता भी था और गाता भी था, चित्र भी बनाता था और अभिनय भी करता था। वहाँ न कोई विशिष्ट होता था न कोई सामान्य। न कोई कला-मर्मज्ञ होता था न कोई कलाशून्य। जो कुछ भी था वह समाज का था, समूह का था। व्यक्ति विशेष का कुछ भी नहीं था। दूर अतीत में तो जाति विशेष का भी कुछ नहीं था। एक समूह के विशिष्टीकरण की प्रक्रिया तो काफी बाद की प्रक्रिया है। वादक और नर्तक, कलाकार और दर्शक में तब कोई अंतर नहीं होता था। दर्शक जरूरत पडऩे पर वादक भी हो सकता था और कलाकार भी। नृत्य से अलग रहने वाला व्यक्ति कब नृत्य में शामिल हो जाया करता था उसके लिए कोई कोमल-कठोर नियम भी नहीं था। गम्मत में कब दर्शकों के बीच से उठकर कोई व्यक्ति औपचारिक संवाद बोलने लगता था, गम्मत का हिस्सा बनकर कलाकार बन जाता था उसे तय कर पाना बड़ा कठिन कार्य है। लोककला, लोक और लोकदर्शन के बीच तब भेद कर पाना बेहद मुश्किल था। लोक कलाकार ही एक अर्थ में लोक होता रहा है और लोकदर्शन लोक-चेतना का पर्याय होता रहा है।
राऊत नाच में लोककला के इस समूहवादी चेतना अथवा लोकदर्शन के समूहवादी पक्ष को आसानी से देखा जा सकता है। यहाँ वादक, चाहे वह ' गुदुम', 'दफड़ा' अथवा मोहरी का वादक हो या फिर बाँसुरी का; वह वादक होने के साथ ही साथ नर्तक भी होता है। यहाँ बच्चे से लेकर वृद्ध तक, उम्र की तमाम सीमाओं के बंधनों को तोड़कर मस्ती में झूमझूमकर नृत्य किया करते हैं। मैंने बचपन में वह दृष्य भी देखा है जब राऊतों के साथ गाँव के अन्य जाति के उत्साही युवा वर्ग भी अपनी लाठी ऊँचा करके नाचने लगते थे। कभी-कभी तो पांवों में ' पैजन ' या घूँघरू पहनकर लोक समाज को राऊतों के साथ नाचते-गाते और दोहा बोलते हुए देखा गया है। तब राऊत और अन्य जाति के लोगों में अंतर कर पाना लगभग असंभव ही होता था। समूहवादी चेतना का ऐसा बेमिसाल उदाहरण लोकसमाज के बाहर देख पाना दुर्लभ है। अन्तर सिर्फ ' सजुआ '  और सादा का ही रह जाता है। ऐसी स्थिति में कभी यह भी भ्रम होता रहा है कि यह नृत्य लोकसमाज का है कि राऊतों का। न यहाँ मालिक का भेद होता है न ' मजूर ' का, न यहाँ धनी का भेद होता है न निर्धन का, न यहाँ स्तरता का भेद होता है न स्तरहीनता का; मात्र यहाँ लोक का, समूह का और समूह के लोक का ही दर्शन होता है। 
पता : -
दाऊ चौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)

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