इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 22 मई 2014

साफ ना - कामयाब हो चाहे

केशव शरण
साफ ना - कामयाब हो चाहे
देख लूं ख्‍वाब, ख्‍वाब हो चाहे

हो गया इश्‍क खूबसूरत से
जि़दगी अब खराब हो चाहे

लग गयी है तो लग गयी है लत
ज़हर माफिक शराब हो चाहे

नफरतों की ये पुस्तिका तो नहीं
आशिकी की किताब हो चाहे

हुस्न दिल में उतार लूंगा मैं
मुंह पे घूंघट, ऩकाब हो चाहे

दिल तो अपना सवाल रक्खेगा
दौर अब ला - जवाब हो चाहे

आंख से रात ओस टपकाऊं
खुश्क बासी गुलाब हो चाहे
- पता -
एस 2/ 564, सिकरौल,
वाराणसी - 221002
मोबाईल : 0 9415295137

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