इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 22 मई 2014

जल उठी ज्‍योति

डां: जय जयराम आनन्‍द
मछुआ  रे ने कहा मछरिया
तू मेरी  रोटी का जरिया
मेरा जाल तुझको बुलाता
सोन मछरिया फस जा फस जा
सोनमछरिया हँस हँस बोली
भैया अपनी खोलो झोली
डाल दिया झोले में मोती
दोनों ओर  जल उठी जोती
E7/70 Ashoka Society Arera colony,Bhopal, MP 462016
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