इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 22 मई 2014

मैं समझूंगी वरमाला है

सरिता बाजपेयी ' साक्षी '
आज चली इस दुनियां से,
साजन न मिला इस घरती पर
यदि अपनी सी मैं तुम्हें लगू
दो फूल चढाना अर्थी पर
ये मौन हड्डियां अब मेरी
तुमको न बुलानें जायेंगी
कुछ समझ सको तो आ जाना
वर्ना य़ुँ ही जल जायेंगी,
यूँ तो जीवन भर बला किया बस
आज आखिरी ज्वाला है
तुम दो आंसू टपका देना
मैं समझूंगी वरमाला  है..!!!
- पता -
शिवम संगीत अकादमी, 250, वाडूजई, 
शाहजहांपुर - मो. 094252756034

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