इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 30 अगस्त 2014

दो व्‍यंग्‍य गज़ल़ें - अशोक ' अंजुम '

( 1  )
आये थे थानेदार जिन्हें कल लताड़ के।
वे ले गये मुहल्ले का खम्बा उखाड़ के।।
हैरत है रेस कछुए ही क्यों जीते बारहा,
देखे नहीं है रंग क्या तुमने जुगाड़ के।
कुनबा जुटा है करने खुदाई यहाँ - वहाँ,
अम्माजी चल बसी है कहीं माल गाड़ के।
बीमा करा लो, कह रही हूं कब से आप से,
बीबी ने कहा रात में मुझसे दहाड़ के।
पहरे पे था रखा जिसे हमने यकीन से,
वो ले गया निकाल के पल्ले किवाड़ के।
किन बन्दरों के हाथ में है संविधान उफ।़
डर है यही कि ये इसे रख दें न फाड़ के।
हर एक शा$ख पे है उल्लुओं का बसेरा,
रख दी है मेरे देश की सूरत बिगाड़ के।
( 2 )
सच रह - रह कर बाहर आया, बोतल खुल जाने के बाद।
दीवानों ने जश्र मनाया, बोतल खुल जाने के बाद।।
सारी कसमें, धरम - करम सब, इधर गये, उधर गये,
पण्डित जी ने मुर्गा खाया, बोतल खुल जाने के बाद।
बाबू टाल रहा था कब से, आज पकड़ में आया तब,
उसने फाइल को सरकाया, बोतल खुल जाने के बाद।
गूँगा बोला पंचम सुर में, लंगड़ा नाचा ठुमक - ठुमक,
और अँधे  ने तीर चलाया, बोतल खुल जाने के बाद।
परिभाषाएँ बदल गयी सब, उल्टा - पुल्टा सब आलम,
घूरे ने गुलशन महकाया, बोतल खुल जाने के बाद।
पल - पल नाक रगड़ने वाला वो चपरासी दफ्तर का,
आज साब जी पर गुर्राया, बोतल खुल जाने के बाद।
वो काकू जिनसे डरते थे सभी लफंगे बस्ती के,
उनने वल्गर लोक सुनाया, बोतल खुल जाने के बाद।
पता - स्ट्रीट 2, चन्द्रविहार कॉलोनी,
नगला डालचन्द, क्वार्सी बाइपास,
अलीगढ़ - 202127 उ.प्र.
मोबाईल : 09258779744,09358218907 

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