इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 30 अगस्त 2014

बरसों बाद

आनन्‍द तिवारी पौराणिक 
सोंधी माटी गाँव की
फिर आई याद
बरसों बाद

    छू - छूव्वल, गिल्ली डंडे
    गोल - गोल रंगीन कंचे
    अमराई में आम तोड़ना
    कागज की नाव, नदी में छोड़ना
    चिड़ियों सी चहकने की साध
    बरसों बाद

चुम्मा अम्मा का
हुम्मा बछिये का
नानी के हाथों भुने भुट्टे
भइया के दिए पैसे छुट्टे
मंदिर में कीर्तन, शंखनाद
बरसों बाद

    शाला में टंगी पेंडुलम घड़ी
    गुरुजी की वह बड़ी छड़ी
    जलसे, मेले - ठेले, हाट
    खुशियों की नहीं तादाद
    बरसों बाद

दीदी की लाई गठरी
स्वाद भरी मिठाई - मठरी
चिड़ियों का कलरव बंसवारे
सोनकिरन सुबह पांव पखारे
हर दिन था आबाद
बरसों बाद

    वह निश्छल, अबोध बचपन
    कितना पावन, तन - मन
    आँखों में फिर नर्त्तन करता
    अतीत को वर्तमान में करता
    प्रेम, सुलह, नहीं विवाद
    बरसों बाद
पता -
श्रीराम टाकीज मार्ग,
महासमुन्‍द (छ.ग.) 549
3445




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