इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 30 अगस्त 2014

बदलती हवा

राजेन्‍द्र मोहन त्रिवेदी ' बन्‍धु ' 
हरीश जब कार्यालय से लौटा। माँ को उदास देखकर पूछा - मम्मी,क्या बात है। आज तुम उदास लग रही हो?
- क्या कहूं, बहू अब मेरी कोई बात नहीं सुनती। वह वही करती है जो उसे ठीक लगता है। हमारे कहने का उस पर कोई असर नहीं होती। मन की पीड़ा को बेटे के समक्ष उगल दिया।
- क्या करुं मम्मी, पढ़ी - लिखी, बड़े घर की बेटी होने के कारण मेरा भी कहना कहाँ सुनती है। उल्टा मुझसे ही सारे काम करवाने की इच्छा रखती है। उसे जब पैसा चाहिए तभी ढंग से बात करती है। अपनी विवशता बता रहा था कि उसकी पत्नी का कर्कश स्वर गूंजा - अब वहीं खड़े होकर भाषण देते रहोगे या अन्दर भी आओगे? सुबह जो काम कहे थे उसका क्या हुआ? हंगामा न हो जाए यह सोचकर हरीश पत्नी की ओर बढ़ गया।
उसके जाते ही माँ सोचने लगी - यह तो स्वयं पत्नी से घबराता है। उसे समझायेगा कैसे ... ? वह दुखी हो उठी, आगे का जीवन ऐसा ही कटेगा? उसकी दृष्टि  कमरे में रखी देवता की मूर्ति पर चली गई। भरी आँखों से उसने कमरे की बत्ती बुझा दी।
पता - 331, निराला नगर, निकट हनुमान मन्दिर,
रायबरेली - 229001
मोबाईल : 09005622219

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