इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 30 अगस्त 2014

दो लघुकथाऍ - अंकुश्री

शक्ति परीक्षा 
श्मशान में एक तांत्रिक शक्ति की दूर - दूर तक चर्चा थी। एक खोजी पत्रकार ने तांत्रिक की शक्ति की सत्यता जांच करनी चाही। वह इसी उद्देश्य से श्मशान की ओर जा रहा था। वह अभी श्मशान पहुंचने ही वाला था कि सुनसान रास्ते में एक आदमी दिखायी दिया। उसे देख कर पत्रकार ठिठक गया। वह दुबला - पतला आदमी मैला - कुचैला कपड़ा पहने था। उसने सोचा कि पहले उसी आदमी से तांत्रिक के बारे में पूछ लिया जाये - सुना है, यहां एक बहुत शक्तिशाली तांत्रिक रहते हैं ?
उस आदमी के चेहरे पर प्रश्न से उत्पन्न कोई भाव दिखलायी नहीं दिया - मैं नहीं जानता। कहता वह आदमी श्मशान की विपरीत दिशा में चला गया। पत्रकार आगे बढ़ कर श्मशान पहुंच गया।
श्मशान पहुंच कर पत्रकार ने जो देखा, उससे वह दंग रह गया। तांत्रिक की खुली कुटिया में वही आदमी बैठा था, जो अभी - अभी रास्ते में मिला था। बिना पूछे उसे उत्तर मिल गया था। वह वहां से चुपचाप वापस आ गया।
संकरीकरण 
संकर बीज का प्रचलन जोर पकड़ चुका है। गरीब किसान ही परम्परागत बीज का प्रयोग कर रहे हैं। उसने आगे कहा - आज फल सब्जी और बीज के जो अनेक रुप दिखाई दे रहे हैं, वह हायब्रीड का परिणाम है।
- तो ?
- जाति और धर्म का भेद भूलकर फल, सब्जी और बीज की तरह अपना गुण और स्वरुप बदल डालो ...।
प्रकार की बातें छोड़ कर आकार के बारे में सुझायी गयी बातें उसे भी अच्छी लगने लगी। इसीलिए उसे मानी पड़ीं। परिणामत: वह शीघ्र ही जातिगत और धर्मगत संस्कृति से अलग हो गया। उसे एक ऐसे माहौल में आना पड़ गया, जहां न उसकी संस्कृति थी और न अपना समाज। लेकिन वह खुश था कि उसने परम्परा तोड़ दी है। परम्परा को तोड़ना ही वह उपलब्धि मान रहा था। उसके परिणाम का उसे न तो बोध था और न ही ज्ञान ही।

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