इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 30 अगस्त 2014

आखर के अरघ

समीक्षक - यशवंत मेश्राम

अक्षर को समर्पित करना बड़प्पन से बड़ा है। कथित और लिखित भाषा में अंतर होता है। छत्तीसगढ़ी राजभाषा लेखन प्रयोग संभव है। कठिनाई, कि देश की हिन्दी अक्षर स्वयं में समर्पित न कर सके; तो छत्तीसगढ़ी की स्वीकृति मानेंगे। (पढ़िये - विचार वीथी, मई-जून-जुलाई अंक 2014) राजभाषा छत्तीसगढ़ी फरियाव छुपकर नहीं, जब समर्पणता हो। रिषी (ऋषि) संस्कृति अस्पष्ट है? संस्कृति-आधार धर्मशास्त्र नहीं, लोकधर्म पश्चात् शास्त्र बने हैं। सरला शर्मा का तर्क बेबुनियाद है। (पृ. 13) सुआ गीत उदाहरण में '' रामायण '' हिन्दी उच्चारण है, छत्तीसगढ़ी नहीं।  (पृ. 21) पूंजी व्यवस्था में सेंधमारी चीनी की नहीं, वैश्विक पूंजी का हाथ है। लेखिका चीन को छोड़कर विश्व में सेंधमारों का क्या समर्थन कर रही हैं? '' जागव संगवारी मन '' की सुंदर उपमा, '' लोरी '' की चिंता वाजिब है। मशीनवादी युग ने मनुष्य को उपभोक्ता-बाजारवाद युग कर दिया, जिससे लोरी नष्ट हो रही है। (पृ. 32) समुद्रतटीय जीवनयापन वालों के प्रति सोच प्रसंशनीय है। (पृ. 35) जिस कालिदास की चर्चा लेखिका ने की है, वह उज्जयिनी से है। अनेक कालिदास हुए हैं, इस पर लेखिका ने कोई प्रमाण क्यों नहीं दिया है? (पृ. 37) अमीरी रेखा कहाँ तक? सरला जी जवाब नहीं देती। '' गरीबी रेखा ले नीचे रहवइया मन के पेट चलाय के फिकर सरकार ह करत हवय।'' (पृ. 39) पेट तो सूअर भी भर लेता है। उसका स्तर है? अमीरी किसके श्रम से बढ़ी? क्यों बढ़ी? किसका खून चूसा गया है? ऐसे गंभीर प्रश्न सरला जी की चिंता और चिंतन का विषय नहीं बन पाया है। फिर थोथे को खपाने की जुगत तो करना ही पड़ेगा न भाई। '' आखर के अरघ '' जिसे समर्पित किया गया है, संदर्भ से गायब क्यों है। शब्दों का समर्पण किसे, प्रश्न तो उठ ही रहा है।
संस्कृति में बच्चों की शिक्षा परंपरा पर शेष चिंता बेहतर है, पर वर्तमान में सरकार ही गली-चौराहों में अंग्रेजी प्रचार-प्रसार हेतु मुक्तहस्त से अनुदान देती है - इस मर्ज की दवा सरला जी स्पष्ट नहीं करती। (पृ. वही) आदिवासी परबुधिया हैं, जैसा सरला जी लिखती हैं, (पृ.40) उसके जल-जंगल-जमीन-जोरू को एस्सार आदि कंपनियाँ व्यवस्था के नुमाइन्दों से मिलकर वहाँ की पूरी संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने पर तुले हुए हैं। '' हिन्दी काव्य में छत्तीसगढ़ी '' रम्य निबंध बन गया है। '' फूफूपाती के नाव '' उपदेशात्मक निबंध में सुंदर आलोचना की गई है। '' मोहरी के धुन अउ भासा के गुण '' में सचिव सुरेद्र दुबे की मंचीय कविता '' बम्बलई म चढ़ '' कौन सी छत्तीसगढ़ी भाव की है? काली कोठरी में सफेदी का चोवा-चंदन या सफेद कोठरी में कालिख का दाग। मोबाइल गुण-दोष वर्णन सटीक और उपयोगी है। वर्णाश्रम पर गुरू आश्रम, राजा-रंक की तुलना बेतुकी लगती है। (पृ. 58) भारत में सभी को शिक्षा का अधिकार 1825 ई. में अंग्रेजों ने दिया। कड़े संघर्षों के पश्चात महात्मा ज्येति बा फूले ने अस्पृष्यों को सर्वप्रथम स्कूलों में प्रवेश दिलाया था। जिससे आगे वर्षों में अच्छे परिणाम से रहा। रवीन्द्र नाथ ठाकुर का याद स्मरणीय है। पर व्यावहारिक पथ कुछ अलग भी है - '' टैगोर की कथनी-करनी में असंगति है। तीन बेटियों का बाल विवाह क्रमश: 10 और 14 वर्ष में कर दिया। 14 वर्ष की उम्र में सुशीला के विधवा होने पर पुनर्विवाह नहीं होने दिया। स्वतंत्रता संग्राम से अपने को अलग-सलग रखा। गांधी के सत्याग्रह-असहयोग आंदोलन का भी मुखर विरोध किया। (टैगोर: एक दूसरा पक्ष - गीतेश शर्मा, संदर्भ -समयान्तर- श्याम कश्यप की समीक्षा पृ. 65-66, जून 2014) पुस्तक की नयी सूचना ये है कि काका हाथरसी का नाम प्रभुदयाल गर्ग था। बहुत कम लोगों को जानकारी है। '' सुरता पंडित शेष नाथ शर्मा '' ' शील ' लेख आखर के अरघ का प्राण है। पृ. 76 पर लिखा है -
'' नारी जनम के पोथी म दुई पान
मइके के, ससुरे के बीच म प्राण। ''
उत्कृष्ट संदर्भ की कविता है। संग्रह की छत्तीसगढ़ी भाषा अनेक जगह अनुवादित लगती है। व्याकरण संतुलित नहीं है। '' अभियोन '' का व्याकरण समझ से परे है। (पृ.42) इसी तरह दुरबल बर दू असाड (पृ.24), पेट घला (पृ.43)े, दूबर बर दू असाड़ (पृ.50) के मिलान में अमिलनता है। संवत् सन् की अंतर्राष्ट्रीय स्वीकृति नहीं है तो सरला शर्मा को ईसवी सन् लिखने में क्या आपत्ति थी? संवत 2068, संवत 2069 (पृ.42) को छोड़कर अन्य स्थानों पर ईसवी सन् तथा पृष्ठ 03 पर पर भी ईसवी सन् होने के बावजूद पुस्तक पठनीय है। छत्तीसगढ़ी भाषा प्रयोग हेतु धन्यवाद। 
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शंकरपुर, वार्ड नं. 7, गली नं. 4
राजनांदगाँव (छ.ग.), पिन 491441

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