इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 30 अगस्त 2014

वापसी

अनामिका

उन्होंने कहा - हैण्ड्स अप
एक - एक अंक फोड़कर मेरा
उन्होंने तलाशी ली।
मेरी तलाशी में क्या मिला उन्हें ?
थोड़े से सपने मिले और चाँद मिला-
सिगरेट की पन्नी - भर
माचिस - भर उम्मीद
एक अधूरी चिठ्ठी जो वे डी कोड नहीं कर पाए
क्योंकि वह सिंधु घाटी की सभ्यता के समय मैंने
लिखी थी -
एक अभेद्य लिपि में
अपनी धरती को-
हलो धरती, कही चलो धरती।
कोल्हू का बैल बने गोल - गोल घूमें हम कब तक?
आओ, अगिन बान - सा छूटें
ग्रहपथ से दूर।
उन्होंने चि_ी मरोड़ी
और मुझे कोच दिया कालकोठरी में।
अपनी कलम से लगाता
खोद रही हूं तबसे
कालकोठरी में सुरंग।
एक तरफ से तो खुद भी गई है वो पूरी।
ध्यान से जरा झुककर देखो -
दीख रही है कि नहीं दिखती
पतली रोशनी
 और खुली खिली घाटी।
वो कौन है कुहरे से घिरा ?
क्या हबीब तनवीर -
बुंदेली लोकगीत छीलते - तराशते,
तरकश में डालते।
नीचे कुछ बह भी रहा है।
क्या कोई छुपा हुआ सोता है।
सोते का पानी
हाथ बढ़ाने को उठता है
और ताजा खुदी इस सुरंग के
दौड़ आती है हवा।
कैसी खुशनुमा कनकनी है -
घास की हर नोंक पर।

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