इस अंक में :

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शनिवार, 30 अगस्त 2014

रघुवीर सहाय की राजनैतिक चेतना

डॉ.नरेश टांक 

स्वातन्त्रयोत्तर भारतीय जीवन की विसंगतियाँ तथा मनुष्य जीवन की विडंबनाएं रघुवीर सहाय के काव्य की आधर - भूमि रही हैं। जहाँ एक ओर उनके समकालीन कवि-रचनाकार भिन्न-भिन्न वाद तथा मत की जमीन पर मनुष्यता की कसौटी तय करते हैं वहीं रघुवीर सहाय के काव्य में आये मनुष्य को किसी चौहद्दी में बाँधकर नहीं देखा जा सकता। उन्होंने मनुष्य को ठीक वैसा ही चित्रित किया है जैसा वह उन्हें नज़र आता है, किसी प्रकार का कोई स्वप्न, युटोपिया या क्रांति के भ्रम में उनके मनुष्य नहीं जीते। रघुवीर सहाय की स्पष्टत: कोई राजनैतिक विचारधारा नहीं थी, हाँ भिन्न-भिन्न मतों का प्रभाव उन पर अवश्य था जैसे - गांधी, लोहिया तथा मार्क्स के मतों का। साथ ही उनकी पत्रकारिता ने उनके महानगरीय - बोध् को तीक्ष्ण भी किया। ऐसे समय में जब मनुष्य को मनोरोग से त्रस्त तथा वर्गीय-चेतना से हीन बताया जा रहा था उन्होंने उस मनुष्य को चित्रित करने का बीड़ा उठाया जो खतरनाक रूप से निस्संग है तथा उसकी निस्संगता की वज़ह से हत्या की संस्कृति जन्म ले रही है। रघुवीर सहाय ने नेहरू युग की असफलता को बड़े नजदीक से देखा था इसीलिए
उनके काव्य-पात्रा आदर्शवादी नहीं बल्कि यथार्थ का नंगा चित्रण करने वाले साधारण मनुष्य हैं -
दोनों, बाप मिस्तरी, और बीस बरस का नरेन
दोनों पहले से जानते हैं, पैंच की मरी हुई चूड़ियाँ
नेहरू - युग के औज़ारोंं को मुसद्दीलाल की सबसे बड़ी देन।
सहाय, अपनी कविताओं के लिए खाद-पानी रोजमर्रा की होने वाली घटनाओं से लेते हैं। उनकी कविताओं में आये मनुष्य उन्होंने अपने आस-पास से ही उठाये हैं, जो मनुष्य से एक दर्जा नीचे रहने को विवश हैं - हर दिन मनुष्य से एक दर्जा नीचे रहने का दर्द उन पात्रों के साथ रघुवीर सहाय का दर्द साझा हो जाता है, जो कि नेहरू युग की भूखी पीढ़ी का नेतृत्व करते हैं। सत्ता से सार्थक संवाद हेतु मनुष्य की अभिव्यक्ति की समस्या तथा डरे - सहमे मनुष्य में उन्होनें कोई हीरोईज्म या नायकत्व न दिखलाकर उन्होंने एक ईमानदार रचनाकार होने के नाते सिर्फ मनुष्य के विभिन्न चरित्र दिखाए हैं जो तंगहाल परिस्थिति में जिंदगी जीने को विवश हैं।
आजादी के बाद महानगरों के बनने से एक नई तरह की संस्कृति ने जन्म लिया। रघुवीर सहाय भी इसी महानगरीय मशीन में एक पुर्जे के रूप में शामिल थे, जो कि महानगर की तमाम आपा - धपी को अपनी नंगी आंखों से देख रहे थे, महानगरों ने जहाँ आधुनिकता को पनपाया, वहीं मनुष्य को निस्संग तथा अकेला भी कर दिया, महानगर में मनुष्य किसी समुह का हिस्सा नहीं बना या उस रूप में जनता नहीं बना जैसे आजादी से पहले था बल्कि साठोत्तरी दशक में वह जनता कम भीड़ के रूप में अधिक दिखलाई पड़ता है, एक ऐसी भीड़ जो खतरनाक रूप से तटस्थ न्यूट्रल है, रघुवीर सहाय का काव्य-मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं उनका मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए चगली खाता है, खुशामद करता है तथा चापलुपी रूपी हंसी हंसता है। इस संस्कृति से रघुवीर सहाय बहुत आहत थे जो कि आदमी और कुत्ते को सरपट -गाड़ियों के बीच चांप लिया जाने के लिए सहमा हुआ छोड़ जाती है।
रघुवीर सहाय, आत्महत्या के विरुद्ध [भूमिका]
गौरतलब है कि रघुवीर सहाय ने मनुष्य को बोदा तथा कमजोर दिखाया है। हारता हुआ, विद्रोह न करने वाला मनुष्य दिखाया है तो इसकी पृष्ठभूमि में राजनैतिक - सामाजिक विसंगतियों की गहरी पैठ है जिसकी जांच - पड़ताल की। माँग उनकी कविता करती है। अन्य रचनाकारों की तरह त्राहि-त्राहि का भाव न रखकर तथा अपनी कविताओं में प्रौढ़ संवेदनाओं के रंग न भरकर सहाय ने संवेदना - सुत्र छोड़ रखे हैं जो पाठक या श्रोता से विशेष अलर्टनेस की अपेक्षा करते हैं जिससे उन आउटलाइन रूपी कविताओं की वास्तविकताओं तथा जिंदगी को समझा जा सके जिसे अपनी तक जाना, समझा और जिया नहीं गया। रघुवीर सहाय की कविता हारे हुए व्यक्ति की एकालाप न होकर हारे हुए उस
आदमी की खोज-खब़र है। जो कि कुलीन सामाजिकता के विरुद्ध लड़ रहे उस साधारण आदमी का ही प्रतिनिधित्व करता है। ''जिसे इंसान का शानदार जिदंगी और कुत्ते की मौत के बीच चाँप लिया है।ÓÓ
महान वृतांतों के टूटने की अनुगूंज उनकी कविता में सुनायी देती है, इसीलिए रघुवीर सहाय की कविता में कोई नायक नहीं है। केवल चरित्र हैं जो परिस्थितियों के दबाव में जिंदगी जीने के लिए विवश हैं, जिन्हें लोक लुभावन नारों से कोई उम्मीद नहीं। उनकी कविता मनुष्य के महानगरीय जीवन के बिम्बों का कोलाज है। कहीं बच्चा गोद में लिये बस में चढ़ती स्त्री है तो कहीं सुथन्ना संभालता हरचरना, कहीं सड़क पार करता दुबला-पतला बोदा आदमी है तो कहीं -गुलाम हंसी हंसते लोग, कहीं सवारी ढोता रिक्शा-चालक है तो कहीं तोंददानी संसद सदस्य, कहीं - गंधाती भीड़ है तो कहीं रंगे चुंगेे लिफ्ट माँगते नौजवान।ू
रघुवीर सहाय, प्रतिनिध् िकविताएँ, पृ 84
रघुवीर सहाय का कवि व्यक्तित्व अपनी अस्मिता के प्रति बड़ा सचेत है, वह स्वयं को इस्तेमाल किये जाने की छूट सत्ता तंत्रा को कहीं नहीं देता। चाहे वह कितना ही साधारण या आम जिन्दगी क्यों न जी रहा हो, वहीं उनके काव्य में अस्मिताविहीन तथा शोषण के विरुद्ध आवाज न उठाने वाले मनुष्य के प्रति हिकारत का भाव है, वे दबे - कुचले तथा डरे - सहमे मनुष्य के लिए समान अवसर तथा सामाजिक न्याय चाहते हैं, इसीलिए वे वह खास तथा सच्ची नफरत उस वर्ग से करते हैं जिसने यथास्थिति से समझौता कर लिया है। वास्तव में रघुवीर सहाय लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण तथा संवर्धन चाहते थे, ऐसे में उन लोगों के प्रति या उस वर्ग के प्रति उनमें किसी प्रकार कोई उम्मीद नहीं है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सचेत नहीं।
आज जबकि ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड बाजार केन्द्रित है, मनुष्य ब्राँड-संस्कृति का पोषक हो सभी मूल्यों तथा कर्मों को खारिज कर धता बता चुका है, ऐसे में रघुवीर सहाय का काव्य तथा उसमें अभिव्यक्त मनुष्य-बिम्ब हमें निरंतर मनुष्य तथा मशीन के द्वंद्व में संवेदना तथा मानव-मूल्यों की तरफ  अग्र्रसर होने की प्रेरणा देता है।
पता 

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