इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 30 अगस्त 2014

आचार्य रामचन्‍द्र शुक्‍ल की '' आदर्श जीवन ''

डां. अरूणाकर पाण्‍डे 
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की पुस्तक '' आदर्श जीवन '' उनकी एक ऐसी कृति है जो उन्हें उनकी छवि से अलग चरित्र प्रदान करती है। वे हिन्दी के शिक्षा जगत, साहित्य संसार और पाठकों की दुनिया में अपने इतिहास, त्रिवेणी, जायसी ग्रन्थावली जैसी मानक और अनिवार्य पुस्तकों के लिए सर्वप्रिय हैं। इसके साथ ही उनके निबन्ध और अनुवाद भी हिन्दी की इसी मानसिक भूमि में प्रतिष्ठित हैं। लेकिन आदर्श जीवन उनके चिंतक - चरित्र, लोकोपयोगी विस्तार करती है। यह पुस्तक उनके बोध के सूक्ष्म और विस्तृत आयतन का प्रमाण है। वह तत्कालीन आचरण संहिता की एक ऐसी प्रस्तावना है जिस पर ऐतिहासिक दबाव और सामाजिक प्रशिक्षण के चिह्न विद्यमान हैं।
'' आदर्श जीवन ''  सन 1914 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा से '' मनोरंजन पुस्तकमाला '' के अंतर्गत प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तकमाला का उद्देश्य हिन्दी के वांगमय को योजनाबद्ध तरीके से परिपुष्ट करने का था जिससे जनसाधारण को हिन्दी में विविध और अनिवार्य विषयों पर पुस्तकें पढ़ने के लिए प्राप्त हों। इस समूची माला के सम्पादक आधुनिक हिन्दी के आदि आचार्य बाबू श्यामसुन्दर दास थे। '' आदर्श जीवन '' सभा की मनोरंजन पुस्तकमाला की पहली किताब है। यह किताब '' एडम्स विलियम डेवनपोर्ट '' की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक '' प्लेन लिविंग एंड हाई थिंकिंग '' का भारतीय रूपांतरण है। मनोरंजन पुस्तकमाला और यह किताब बहुत ही विनम्रता से हमारे सामने मनोरंजन शब्द का नया अर्थ गढ़ते हैं। आज के अनुसार देखें तो मनोरंजन बहुत ही बिकाऊ, चलताऊ और बाजारू शब्द बनता चला जा रहा है, लेकिन इस पुस्तकमाला की दृष्टि से विचार करें तो मनोरंजन सभ्यता और संस्कृति के स्वाभाविक और सहज परिचायक के रूप में स्थापित होता है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ शुक्ल जी ने भारतीयता के परिचय में युरोप के विचार - चिन्तन का समावेश किया है, बल्कि कहना यह चाहिए कि सांस्कृतिक निर्माण का उनका बोध विविधता को शक्ति मानता है और सामंजस्य के अपने मूल्य का व्यावहारिक वहन करता है। यह चिन्तन और प्रभाव इतना गहरा है कि युरोप और भारतीय - अभारतीय की सीमा का ध्यान स्वयं पाठक को ही नहीं रह जाता। इसलिए यह मानना अनिवार्य है कि शुक्ल जी बाबू साहब और नागरीप्रचारिणी सभा के प्रयास हिन्दी भाषा के माध्यम से विश्व नागरिकता की परम्परा के निर्माण के प्रयास थे।
शुक्ल जी ने '' आदर्श जीवन '' में पहला प्रकरण पारिवारिक जीवन पर लिखा है। आज के समय में जब परिवार और सम्बन्ध लगातार श्रीहीन और लघुतर होते चले जा रहे हैं तथा समाज धीरे - धीरे व्यक्तिगत आवश्यकताओं के इर्द - गिर्द बनता है। शुक्ल जी की पुस्तक का यह पक्ष एक खोयी हुई कहानी का अहसास कराता है। इस अध्याय में वे स्पष्ट लिखते हैं कि पारिवारिक जीवन के लिए एक - दूसरे की स्मृति परस्पर सदभाव, मंगलकामना, सहानुभूति, माता - पिता के आशीर्वाद तथा भाई - बहन के सम्बन्धों की जीवन्तता पर बल देते हैं। एक अन्य निबन्ध में उन्होंने लिखा था कि जैसे - जैसे सभ्यता का विकास होता जायेगा, कवि - कर्म या साहित्य की रचना करना और कठिन होता चला जाएगा। हम जानते हैं कि शुक्ल जी के बहुत बाद '' चीफ़ की दावत '' जैसी कारुणिक कहानी हिन्दी समाज को पढ़ने के लिए मिलती है और इस अर्थ में लिखना कठिन होने के साथ ही बड़े साहस के साथ बोध को विस्तृत करने का कर्म साबित हुआ है। लेकिन शुक्ल जी का उक्त अध्याय जैसे समूची सभ्यता को मर्मविहीन होने से बचाने का प्रयास जान पड़ता है।
शुक्ल जी की इस पुस्तक का अगला पड़ाव सांसारिक जीवन है। इस प्रकरण में उन्होंने मित्रता के धर्म पर बहुत व्यापकता के साथ प्रकाश डाला है। यहाँ शुक्ल जी परिवार के बाद मित्रों को ही गाढ़े का साथी मानते हैं। संकट और धैर्य - पोषण के समय मित्र ही मनुष्य को सशक्त बनाते हैं।  ऐसी में भी यह प्रकरण पढ़ते हुए इस सम्बन्ध में युगीन विरोधाभास सामने प्रकट होते ही हैं। समकालीनता में मित्रता का बोध भी कम से कम लगातार परीक्षा की मांग तो करता ही है, लेकिन वहाँ भी ये दो पंक्तियाँ कि मित्र का पता आपातकाल में चलता है। ( तुलसीदास ) और न काहूँ से दोस्ती न काहूँ से बैर ( कबीरदास ) तनाव पैदा करती दिखती हैं। शायद व्यापक अर्थ में यह समय चुनने का नहीं रह गया है लेकिन मनुष्य का इतिहास और उसका बोध ही हमें इस समकालीनता की पूरी समझ दे सकते हैं। इसी अध्याय में एक जगह वे ग्रामीण युवाओं के लिए यह सलाह देते हैं कि नगर में अकेले होते ग्रामीणों को साहित्य समाज में प्रवेश करना चाहिए। यह अपने समय के अनुसार बेहद प्रगतिशील विचार है लेकिन आज हम देखते हैं कि वह ग्रामीण समाज ही नगर के प्रभाव में इतना विखंडित हो चला है कि उसके सांस्कृतिक उत्पाद उसी की स्थानीय भाषा या मातृभाषा में रिमोट कंट्रोल से लहंगा उठाने की कल्पना पर अपार सफलता प्राप्त करता चला जा रहा है।
पुस्तक का अगला प्रकरण आत्मबल पर केन्द्रित है। इस अध्याय में वे  स्वतंत्रता, सत्य, वीरता, आज्ञापालन, साहस, परिश्रम, अध्यवसाय, नियम का पालन और विनोदप्रियता जैसे मूल्यों और गुणों पर बात करते हैं। आज के समय जब इन मूल्यों और गुणों पर बातचीत होती है तो उसे अव्यावहारिक, उपदेशात्मक और नाटकीय माना जाता है जिसके अनगिनत संदर्भ मौजूद हैं। इस दृष्टि से इन पर सीधे बात करना थोड़ा सशंकित करता है लेकिन यहाँ इस तथ्य पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है कि आचार्य शुक्ल का समय गुलामी का समय था जहाँ स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता सामाजिक और मानसिक आवश्यकताएँ थी। इस कारण यह संभव है कि आज का पाठक इन बातों में रुचि न दिखाये लेकिन यदि इतिहास बोध के तर्क से देखें तो इसमें फिर कभी गुलामी न झेलने की एक बड़ी आकांक्षा मौजूद है। बल्कि इस अध्याय में एक रोचक मोड़ तब आता है जब आचार्य शुक्ल बेंजमिन फ्रेंकलिन की समूची दिनचर्या पाठक से साझा करते हैं। पढ़ते ही यह समझ बनती है कि यह अध्याय कोरा उपदेश नहीं है बल्कि भविष्य में भारत को बचाने और विकसित करने की लम्बी तैयारी की भूमिका है। जैसे वे भारतेन्दु की '' भारत दुर्दशा '' का अगला अध्याय सबको सचेत करते हुए लिख रहे हों!
आचार्य शुक्ल ने अगला अध्याय आचरण पर लिखा है।  इसमें वे उन लोगों पर कटाक्ष करते हैं जो आलस्य में तल्लीन रहते हुए प्रारब्ध को ही सब कुछ मानते हैं। इसके साथ ही शुक्ल जी का मानना है कि सदाचरण का आधार धर्म ही होता है। लेकिन सबसे अधिक मार्के की बात वे धन के उपयोग को लेकर करते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि रूपये की कद्र हमेशा करनी चाहिए और उसे हाथ का मैल मानना एक मानवीय भूल है।  वे रुपया ही पैदा करने वालों तथा रूपये से विरक्त रहने वाले दोनों ही प्रकार के लोगों से अपनी गहरी असहमति रखते हैं क्योंकि वे धन को उपकार और गृहस्थ लोगों के लिए आवश्यक मानते हैं। आमोद - प्रमोद के लिए भी अजायब घर, चित्रशालाओं, विज्ञानालय तथा संगीत जैसे साधनों की ओर संकेत करते हैं जिसमें किसी भी प्रकार के व्यय से बचकर निर्धन व्यक्ति भी अपने आस्वादन सुरक्षित रख सकता है। कहना चाहिए कि जो लोग बैंक के कर्ज की निर्मम अदायगी से गुजरते हैं,उनके लिए यह अध्याय एक शिक्षक की ध्वनि का काम करता है।
अध्ययन '' आदर्श जीवन '' का सबसे महत्वपूर्ण प्रकरण है। इसमें पाठक के निर्माण की प्रक्रिया की प्रस्तावना शुक्ल जी करते हैं। इस  अध्याय का प्रमुख स्वर  यही है कि पढ़ना जीवन की शर्त है। शुक्ल जी का यह अध्याय बतलाता है कि पढ़ने का अर्थ इतिहास की क्रियाशीलता में समाया हुआ है। जो नहीं पढ़ते उन्हें इतिहास की अस्थिरता का बोध नहीं हो सकता। इसके उदाहरण स्वरुप एक जगह शुक्ल जी ने बताया है कि विकास शक्ति के क्रमश: क्षीण होने का संकेत है। यहाँ पर वे लखनऊ के विकास के सन्दर्भ में वाजिदअली शाह की विलासिता को रेखांकित करते हैं। यही नहीं उनका अटूट विश्वास है कि जो विद्याभ्यासी पढ़ते हैं वे साथियों का अभाव महसूस नहीं कर सकते। इसके साथ ही शुक्ल जी अध्ययन का एक अन्य महत्व यह मानते हैं कि व औषधि का कार्य करता है क्योंकि इससे तर्क - वितर्क और सूक्ष्म विवेचन की शक्ति तो पैदा होती ही है, साथ ही भावों का परिष्करण भी होता है। इन सभी बातों से अलग जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात वे यह लिखते हैं कि विषयों के पठन में एक क्रम होना ही चाहिए अन्यथा पढ़ना वृथा है। देखा जाए तो यहाँ पर वे साधारण पाठक को शोधार्थी में रूपांतरित करने की कला का संदश दे रहे हैं। इसका स्वाभाविक प्रतिफलन वे पढ़ने को आलोचनात्मक क्रिया के रूप में देखते हैं।
'' आदर्श जीवन '' का अंतिम  अध्याय स्वास्थ्य विधान से सम्बन्धित है जिसमें आचार्य शुक्ल ने भोजन के नियम, पेय पदार्थ, व्यायाम, स्नान और निद्रा के बारे में अपने विचार प्रकट किये हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आचार्य शुक्ल केवल साहित्य और शिक्षा के ही चिंतक नहीं थे बल्कि उनकी दृष्टि उस अध्यापक सरीखी थी जो अपने समाज के सर्वांगीण विकास के बारे में सोचता है। यह अध्याय सिद्ध करता है कि उस समय भी बौद्धिकता की सीमा में स्वास्थ्य और शारीरिक विकास जैसे विषयों पर भी उनकी दृष्टि उसी प्रकार का पैनापन लिए थी जैसा कि वह अपने मूल विषयों के प्रति उजागर होती है। शिक्षा की इस परम्परा के बारे में आगे के आलोचकों का चिन्तन खोजना भी इसी कारण एक अनिवार्यता लगती है। यही इस पुस्तक का देय है।

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