इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 30 अगस्त 2014

मेरे तुम्‍हारे बीच

प्रो.फूलचंद गुप्‍ता

मेरे तुम्हारे बीच अब पर्दा नहीं रहा।
सचमुच कहें तो आगे भरोसा नहीं रहा।।

लो अब हमारे आपसी झगड़े $खतम हुए,
चर्चा के वास्ते कभी, मुद्दा नहीं रहा।

वह हो गया स्वच्छंद करे वो जो दिल कहे,
मासूमियत में कैद वह बच्चा नहीं रहा।

मुझको बड़ा गुमान था रिश्ता है खून का,
रिश्ता बचा रहा मगर ज्यादा नही रहा।

उष्म खत्म हुई है नसों में लहू तो है,
ऐसा नहीं कि बाप या बेटा नहीं रहा।
पता - 
बी - 7, आनंद बेंगलोस,
गायत्री मंदिर रोड, महावीर नगर,
हिम्मत नगर, एस.के.गुजरात,
मोबाईल : 094263 79499

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