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शनिवार, 30 अगस्त 2014

कुछ जाते वनवास में

मुकुन्‍द कौशल 


भरी दुपहरी आ ठहरी है संध्या के आवास में।
अनचाहे अवसाद घुले हैं जीवन के सन्त्रास में।।
मिथ्याभाषी रथी - सारथी
सब निकले पाखण्डी
मुख्य मार्ग तक पहुँच न पाई
गाँवों की पगडण्डी
हमने बहुधा धोखे खाए अपनों पर विश्वास में।
पद से, मद से आकर्षित हो
निकले घर से जितने
उनमें से निज गंतव्यों तक
पहुँच सके है कितने
कुछ तो होते राजतिलक तो, कुछ जाते वनवास में।
वाक्य, वाक्य का हुआ विरोधी
शब्द, शब्द से रुठा
भाषा भी अब लगे परायी
और व्याकरण झूठा
मूल कथन की भोर खो गई अक्षर के अनुप्रास में।


पता - 
एम - 516, पदनाभपुर, दुर्ग ( छ.ग.)

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