इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 30 अगस्त 2014

स्‍त्री मुक्ति का स्‍वर है थेरीगाथाएं

अनिता भारती 

महिलाओं के जीवन में अचानक परिवर्तन तब आया जब गौतम बुद्ध ने उनको संघ में शामिल होने की आज्ञा दी। बौद्धकाल से पूर्व स्त्रियों का जीवन घर तक सीमित कर दिया गया था। उनसे सब अधिकार छीनकर उन्हें मात्र पुरूष की भोग्या के रूप में देखा गया। बुद्ध की विचारधारा स्वंय अपने आप में क्रंातिकारी थी। बुद्ध से पूर्व साधारण मनुष्य के मनुष्य होने की कोई कीमत नहीं थी। वह जातियों में बंटा धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास तथा जातीयता से उत्पीड़ित था। ऐसे समय में बुद्ध ने मानवता का मलहम लगाकर इसी दुखी मनुष्य को सहारा दिया। नारी की स्थिति तो और भी अधिक शोचनीय थी। उस पर तरह - तरह के अत्याचार किए जाते थे। डॉ. रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार बौद्ध धर्म का आर्विभाव ऐसे समय में हुआ जब नारी पुरूष के अत्याचारों से दबी जा रही थी। शास्त्रकारों ने जिसे कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं दी, उसके लिए बौद्धकाल में अमर संवेदना का संदेश मिला। संस्कृति के चार अध्याय पृ. 155 बुद्ध काल में पहली बार स्त्रियों को पुरूषों के बराबर समझा गया। अभी तक हिन्दू धर्म में सभी अधिकारों का भोक्ता एकमात्र पुरूष हुआ करता था। घर - परिवार से लेकर ज्ञान के अधिकार तक पर उसका एकमात्र अधिकार था। स्त्रियों के लिए ज्ञान प्राप्त करना वर्जित था। स्त्रियों का कार्यक्षेत्र घर माना जाता था परन्तु बुद्ध - काल में स्त्रियों के लिए सभी सीमाएं टूट गईं। बुद्ध ने लड़की जन्म को खुशी का अवसर बताया। कहा जाता है कि एक बार जब राज प्रसेनजीत तथागत के पास उपस्थित थे तब राजमहल से खबर आई कि रानी मल्लिका ने पुत्री को जन्म दिया है। पुत्री के जन्म की बात सुनकर प्रसेनजीत दुखी हो गए। तथागत ने उनकी उदासी का कारण जान उन्हें समझाते हुए कहा कि इसमें उदास होने की क्या बात है राजन! कन्या एक पुत्र से भी बढ़कर सन्तान सिद्ध हो सकती है क्योंकि वह भी बड़ी होकर बुद्धिमान तथा शीलवान बन सकती है। बुद्ध स्त्रियों के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं, स्त्री संसार की विभूति है क्योंकि उनकी अपरिहार्य महत्ता है। उसके द्वारा ही बोधसत्व तथा विश्व के अन्य शासक जन्म ग्रहण करतें हैं। हिन्दू नारी का उत्थान पतन। डॉ. अम्बेडकर पृ . 22
अत: बुद्ध ने कन्या - जन्म को हर्ष का विषय माना तथा स्त्रियों की इस संसार अत्यन्त महत्ता है, ऐसा कहकर उन्होंने स्त्री जाति के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया। बुद्ध ने ही सबसे पहले स्त्री को ज्ञान का  अधिकार दिया। वे कुंआरी हो अथवा विवाहित या फिर बृद्धा किसी भी अवस्था में संघ में प्रवेश ले सकती थी। स्त्रियां किसी भी जाति की हों शूद्र हों या ब्राह्मण, अमीर हो या गरीब, सधवा हो अथवा वेश्या, बुद्ध ने सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दिए। केवल बुद्ध - काल में ही हमें ऐसी अनेक दलित स्त्रियां मिल जाएंगी जिन्होंने उस समय की घृणित जाति - पांति और शोषणकारी सत्ता को ठुकरा कर समाज में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई। वे स्त्रियों के मानसिक और दैहिक शोषण के तंत्र को लात मारकर स्त्री - मुक्ति के गीत गाती हुई संघ में शामिल हो गई। मोक्ष के द्वारा जो कि अभी तक केवल उच्च - जाति के पुरूषों के लिए खुले थे, अब उसकी अधिकारिणी बन गई। बौद्ध काल में स्त्रियां ज्ञान अर्जित करती, गली -गली घूमती हुई ज्ञान बांटती, भिक्षुणी संघ स्थापित कर रही थीं। उन्होंने समाज द्वारा जबरदस्ती लादी गई जिम्मेदारियोंको उतार फेंका। वे अपनी बात बेबाक, बोलाग और स्वतंत्र रूप से कहती हुई तथाकथित स्त्री - शोषण की दीवार को तोड़ धराशायी कर देती हैं। वे समझ जाती हैं, देह स्त्री के शोषण का आधार है और जाति व्यवस्था परिवार व पुरूष सत्तात्मक समाज उसका कारण है। इसमें कोई शक नहीं, दलित व गैर - दलित, दोनों महिलाएं उस समय भेदभाव व विषमतामूलक समाज में पिस रही थी। इस गैर - बराबरी के समाज में राजकुमारी से लेकर दासी तक दुखी और उदास थी। उसकी एक मात्र उपयोगिता भोग्या की थी, चाहे वह भोग जमीन, परिवार या फिर समाज के लिए हो। दलित स्त्रियों का जीवन तो और भी नारकीय था। एक तरफ  वे उच्चवर्ग की सेवाएं करने को मजबूर थीं तो दूसरी ओर परिवार में उसको उत्पीड़न झेलना पड़ता। ऐसी दलित - पद दलित स्त्रियों को बुद्ध ने समाज में सम्मानीय स्थान दिया। यही कारण है कि बुद्ध तथा बुद्धकालीन नारियों पर हमेशा से ही इन कट्टर पथियों द्वारा तरह - तरह के घृणित आरोप लगाए जाते रहे हैं। हिन्दू मानते है कि बुद्ध ने स्त्रियों को संघ में प्रवेश देकर उनको ज्ञानार्जन एंव अध्ययन मनन का अधिकार देकर उनको व्यभिचारी तथा स्वेच्छाचारी बना दिया। इन  हिन्दुओं के इन कुतर्को का समय - समय पर डा. अम्बेडकर से लेकर प्रगतिशील ताकतें तथा स्त्रियों की आजादी के पक्षधरों ने हमेशा मुँहतोड़ जबाब दिया है। परन्तु दुख और चिन्ता इस बात की है कि आज अपने आप को दलित चिंतक, साहित्यकार व मार्गदर्शक मानने वाले कुछ लोग भी बुद्ध की जाति ढूँढने लगे हैं तथा बुद्ध के काल में शिक्षित व संघ में प्रबज्जित थेरियों को लेकर उन पर गम्भीर कुत्सित आरोप मढ़ रहे है। ऐसे स्वार्थी, पदलोलुप व चर्चा में बने रहने वाले जातिवादी दलित साहित्यकार गौतम बुद्ध को क्षत्रिय मानकर उन्हें दलित व सम्पूर्ण समाज का आदर्श मानने से नकारते हुए उनके संघर्ष एंव त्यागपूर्ण कार्यों पर कीचड़ उछाल रहें हैं तथा उनके अथक प्रयासों से स्वतन्त्रता प्राप्त थेरियों को भी नहीं बख्श रहें हैं।
ऐसे ही कुत्सित और घृणित आरोप मढ़ने वाले जातिवादी दलित साहित्यकार डा. धर्मवीर हैं जिन्होने अपनी पुस्तक सामंत के मुंशी: प्रेमचन्द के लोकार्पण के अवसर पर अपने बीज भाषण में कहा कि बुद्ध ने मेरी स्त्रियाँ छीनी हैं। घर से बेघर करने और विवाह से छीनकर स्त्रियों को सन्यास वाली सामाजिक मृत्यु की भिक्षुणियाँ बनाना उनका धार्मिक अपहरण कहा जाना चाहिए। धर्मवीर बीज व्याख्यान पेज 4. थेरियों की सामाजिक मृत्यु का क्या आशय है ? क्या धर्मवीर ये कहना चाहते हैं कि बुद्ध के संघ में शामिल होकर स्त्रिया असामाजिक हो गईं। क्या सामाजिक मृत्यु का आशय समाज के उपयोगी न होना है। क्या धर्मवीर यह मान कर चलते कि स्त्री की समाज में एक मात्र उपयोगिता घर के अन्दर ही है और अगर वह समाज के नियम तोड़ती है तो उसके जीने - मरने का कोई महत्व नहीं। और अगर वह घर छोड़कर बुद्ध के संघ में शामिल हो गई तो वह समाज के लिए अनुपयोगी हो गई। डा. धर्मवीर के अनुसार स्त्रियों की भूमिका घर संभालने, बच्चे पालने व अपने पति को खुश करने तक सीमित है। अगर कोई स्त्री घर छोड़कर अपने अस्तित्व की खोज व अपने होने के अहसास को जानने के लिए अध्ययन मनन व ज्ञानार्जन का अधिकार चाहती है तो वह समाज के लिए अनुपयोगी हो जाती है। इसका अर्थ यह भी निकलता है कि धर्मवीर पुरूष वर्चस्व के सिद्धान्त के आधार पर मनु के समान चाहते हैं कि स्त्रियों को ज्ञान व शिक्षा न दी जाए क्योंकि वह अपने अस्तित्व व अपनी स्वतन्त्रता की बात करने लगेगी। जैसे ही स्त्री अपनी अस्मिता की बात करती है धर्मवीर जैसे ब्राह्मणवादी सकीर्ण विचारधारा वाले लोगों के पैरों तले जमीन खिसकने लगती है। उन्हें अपने अधिकार छीनने का भय सताने लगता है। उन्हें लगता है कि अगर नारी हमारे बराबर आ गई तो हमारा हुक्म कौन मानेगा? वे अपना गुलाम किसको बनायेंगे। इसलिए वे मनु की तरह ही स्त्री को घर में रखने की हामी है और वे बिल्कुल मनु महाराज की तरह औरतों का गठन चाहते है।
अनष्ता दष्त काले च मंत्र संस्कार कष्दत्पति
सुखस्य नित्यं दातेह परलोक च योषिता:
सदा प्रछष्या भाव्यं गहकार्येषु दक्षया।
सुसंस्कष्तों पस्करया के चामुक्तहस्तया।।
अर्थात विधिवत मन्त्रों द्वारा गृहित पति, स्त्री के लिए हर काल व ऋतु में सुखदायक है। लोक परलोक में उससे सुख ही सुख मिलता है अत: उसे सदैव प्रसन्नचित रहना चाहिए और गृहकार्य दक्षता पूर्वक करते हुए घर के बर्तन आदि को साफ रखे तथा खर्च में मितव्ययता बरते। डा. अम्बेडकर द्वारा लिखित पुस्तक हिन्दू नारी का उत्थान और पतन से उधृत-
डा. धर्मवीर के विचार और मनु महाराज के विचारों में कोई विभिन्नता नहीं । जिस प्रकार उस समय मनु महाराज ने बौद्ध धर्म को जड़ से मिटाने के लिए, बौद्ध धर्म को मानने वालों में शूद्र व स्त्रियाँ सबसे अधिक थीं। शुद्र व स्त्री को बौद्ध से मोड़ने के लिए दोनों पर ही व्यक्तिगत व सामाजिक प्रतिबन्ध लगाये। आज उसी प्रकार के प्रतिबंधों की बात डॉ. धर्मवीर कर रहे हैं। डा. धर्मवीर को लगता है भिक्षुणि या ज्ञानार्जन कर शिक्षित हुई स्त्री शायद उनके हाथ से निकल जायेगी इसलिए वो बुद्ध पर आरोप मढ़ते है कि बुद्ध ने मेरी स्त्रियाँ छीनी हैं। मेरी स्त्रियाँ छीनने से मतलब है मनु के हाथ से स्त्रियाँ छीनी हैं। स्त्री छीनना यह शब्द ही अपने आप में फासिस्टवादी मानसिकता का घोतक है। एक समय था जब युद्ध जीतने वाली या लुटेरे मानी जाने वाली जातियाँ हारे गये स्त्री पुरूषों को लूटी गई वस्तुओं में शामिल मानते थे। डॉ. धर्मवीर इसी मानसिकता के हैं तभी वे अपने अपने पुरूषवादी अंहकार भरे ब्राह्मणवादी स्वर में घोषित कर रहें हैं, बुद्ध ने मेरी स्त्रियाँ छीनी हैं। यह डा. धर्मवीर नहीं उनके भीतर सोयी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता बोल रही है जो औरतों को वस्तु मानती है तथा उनके द्वारा उठाई गई अस्तित्व,समानता व स्वतन्त्रता की मांग को अपने पैरों तले क्रूरता से रौंद देती है। अब सवाल उठता है, आखिर बौद्ध काल में स्त्रियों की दशा कैसी थी और क्यों कर हजारों हजार दलित पददलित औरतें स्वेच्छा से संघ की ओर आकृष्ट हुई ? बुद्ध संघ में शामिल होने पर उन्होंने अपने अन्दर क्या परिवर्तन महसूस किया ? कैसे उन भावों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।
थेरी गाथा में उन भिक्षुणियों के जीवन के अनुभव हैं, जो बुद्ध की समकालीन थीं। थेरी गाथा एक तरह से बुद्धकालीन स्त्री के जीवन में कटु अनुभवों के साथ उनसे मुक्ति व विरक्ति के अनुभव भी हैं। घर परिवार इन भिक्षु महिलाओं ने क्या अनुभव किया। उन खुशी के पलो का भी थेरी गाथा में चित्रण है।
थेरी गाथा बौद्ध साहित्य की अमूल्य निधि त्रिपिष्टक साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। थेरी गाथा में 73 भिक्षुणियाँ जिन्हें अर्हत पद प्राप्त था, उनकी खुशी अथवा पीड़ा के समय व्यक्त किए गए उद्गार शामिल हैं। थेरी गाथा बुद्ध साहित्य के साथ - साथ नारीवादी, महिला आन्दोलन के लिए भी महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उस समय थेरियों ने तथाकथित समाज के खिलाफ  जिस ईमानदारी से अपने आप को व्यक्त किया वैसी स्वतंत्र स्वाधीन वाणी आज भी मुश्किल से मिलती है। यह भारत के सम्पूर्ण इतिहास का यह पहला अवसर था जब वे ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र थी। वे अपने कष्टों के प्रति भी उतनी मुखर थीं जितनी अपने उल्लासमयी क्षणों को व्यक्त करने के लिए। दलित स्त्रियों का जीवन उस समय कितना कठिन था। उस पूरे विषाक्त वातावरण को पूर्णिमा थेरी व्यक्त करते हुए कहती हैं, मैं पनिहारिन थी। सदा पानी भरना मेरा काम था। स्वामिनियों के दंड के भय से, उनकी क्रोध भरी गालियों से पीड़ित होकर मुझे कड़ी सर्दी में भी सदा पानी में उतरना पड़ता था। एक तरफ  सामाजिक उत्पीड़न के चलते महिलाअें की दासों से भी गई बीती जिन्दगी थी तो दूसरी और पारिवारिक वातावरण उससे भी कहीं अधिक दूषित था। थेरी सुमंगल कवयित्री अपनी पीड़ा थेरी बनने के बाद अपने पूर्व अनुभव अन्य थेरियों के समक्ष रखते हुए कहती है। मेरी दरिद्र व्यस्था के वे छोटे - छोटे बर्तन जिनके बीच में मै मैली कुचैली बैठती थी और मेरा निर्लज्ज पति मुझे उन छातों से भी तुच्छ समझता था, जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था। कवयित्री सुमंगला भिक्षुणी संघ में आकर अत्यंत प्रसन्न थी। उसके परिवार में बिताए गए दु:ख के दिन कट गए। वह स्वतंत्र हो गई। उसने रात - दिन घिसघिस कर परिवार के लिए बिताए। अनेक गुलामी भरे सम्बन्धों से मुक्ति या आजादी की सांस ली। वह उन्मुक्त स्वर में उन्मुक्त स्त्री की तरह गा उठी। मुक्त हूँ, मैं मुक्त धनकुटे से पिंड छुटा देगची से भी मैं कितनी प्रसन्नचित हूँ अपने पति से मुझे घृणा हो गई है। उसकी छत्र छाया को अब मैं बर्दास्त नहीं कर साकती इसलिए मैं कड़कड़ा का नष्ट करती हूं। लालच और नफरत क्रोध और अपने आपसे कहती है, आह! यह है सुख और करती है चिंतन मनन सुखपूर्वक।
भिक्षुणी सुमंगला भिक्षुणी संघ के स्वतंत्र वातावरण में पहली बार महसूस करती है कि वह भी एक इंसान है, उसके भी कुछ सुख हैं। वह सुख देह से इतर हो सकते हैं। वह हर कदम पर महसूस करती है कि क्यों केवल वह ही स्त्री हाने के नाते ही हर समय किसी की छत्रछाया मेें रहने की अधिकारी है, उसे सुकून चाहिए हजां वह इत्मीनान से ठहर अपने होने के अस्तित्व का आनन्द ले सकें।
थेरी गाथा में ही मित्ता नामक भिक्षुणी अपने भिक्षुणी पूर्व जीवन को व्यक्त करते हुए कहती है - कितनी आजाद हूँ मैं! कितनी अनोखी है आजादी? तीन तुच्छ वस्तुओं से मुक्त ओखली, मूसल और अपने है अपने टेढ़े मालिक से। पूर्वजन्म और मृत्यु से मुक्त हंू मैं जिस तमाम ने दबाए रखा था मुझे वो सब अब दूर फिंक चुका है। आम जीवन जीने के बाद बनी भिक्षुणियों ने अपने घर व समाज में स्त्रियों के दोहरे शोषण को महसूस किया और उससे विद्रोह किया। उस समय विद्रोह का एकमात्र रास्ता भिक्षुणी संघ में शामिल होना था जिसे अनेक स्त्रियों ने अपनाया। सन्यास लेकर भिक्षुणी संघ  में शामिल होने वाले अनेक स्त्रियाँ ब्राह्मण वर्ग से भी आई थीं। जो ब्राह्मण वर्ग के कर्मकांड, आडम्बरों अंधविश्वासों में फंसी थी। जब उनको इन व्यर्थ के पचड़ों का ज्ञान हुआ तो वे इस जातीय भेदभाव से पूर्ण लिंगभेद पर आधारित हिन्दू धर्म को छोड़ बौद्ध भिक्षुणी बन गई। मिता थेरी हर समय धार्मिक अनुष्ठानों व पूजा पाठ में लगी रहती थी। बुद्ध के सम्पर्क में आने के बाद उसके मन में पला डर व अंधविश्वास दूर हो गया। वह अनुभव बताते हुए कहती है - मैं हर चतुर्दशी को, पूर्णमासी को और प्रत्येक पक्ष की अष्टमी को व्रत रखती थी, यह सोचकर कि मंै देव योनि को प्राप्त कर स्वर्ग जाउँगी। वहीं मैं आज रोज एक समय आहार ग्रहण करने वाली मंडे सर वाली चीवर पहनने वाली हँू। किन्तु आज मुझे स्वर्ग में वास करने की अभिलाषा नहीं है। कारण कि मंैने अपने हृदय की पीड़ाओं और चिंताओं को ही दूरी फेंक दिया हैं।
ये थेरियाँ स्वतंत्रता की कीमत तथा स्वाधीनता के अहसास को समझ चुकी थी, तभी तो अपनी स्वाधीनता को स्वर्ग से बढ़कर बताती हैं थेरी गाथा में पटाचारा गौतम बुद्ध की सर्वाधिकर प्रिय शिष्याओं में से एक थी जिसे अर्हत पद प्राप्त था। पटाचारा की 500 से अधिक शिष्याएं थीं जो जगह - जगह घूम शांति और सद्भाव व स्वतंत्रता का सन्देश देती थीं। पटाचारा उच्च कोटि की कवयित्री होने के साथ - साथ उच्च कोटि की दार्शनिक भी थी, पटाचारा ने समाज व परिवार से विद्रोह करके अपने घर के नौकर से विवाह किया। परन्तु विवाह के कुछ समय बाद पटाचारा पर दुखों के पहाड़ टूट पड़े। पहले पति की मृत्यु हुई और फिर उसके नवजात शिशु व दो वर्षीय पुत्र की भी मुत्यु हो गयी। कुछ ही दिनों में घर गिरने से उसके माता - पिता व भाई - बहनों की भी मृत्यु हो गई। जब वह भिक्षुणी संघ में आई तो विक्षिप्त अवस्था में थी। परन्तु भिक्षुणी संघ के स्वतंत्र, बौद्धिक एवं स्नेही वातावरण में वह शीघ्र ही ठीक हो गई। पटाचारा ने निस्सारता पर विचार करते हुए कहा - लोग छल से भूमि जोत उसमें बीज बोते हैं, इस प्रकार वे धन उपार्जन कर अपने स्त्री - पुत्रादि का पालन - पोषण करतें हैं, तो मुझ जैसी साधिका निर्वाण को क्यों न प्राप्त कर पाती ? मैं जो शील से सम्पन्न हूँ, अपने शास्त्र के शासन को पूरा करने वाली हूँ, अप्रमादिन हँू, अचंचल और विनीत हूँ। किसी गौतमी थेरी अत्यन्त निर्धन परिवार में जन्मी थी। उसका पूरा जीवन अभावों में बीता। विवाह के बाद भी उसे दो पल का सुख नसीब न हुआ। उसने अपने ससुराल में देखा और स्वयं अनुभव किया कि औरतों का जीवन अत्यन्त हीन है। उनका सारा जीवन रोते - रोते कट जाता है। अपने मुसीबतों के साथ - साथ वह सम्पूर्ण स्त्री - जीवन के दुखों की सुन्दर अभिव्यक्ति करते हुए कहती हैं - दुखों से भरपूर नारी तूने असंख्य जन्मों में इस प्रकार का अपरिमित दुख अनुभव किया है, तूने सहस्त्रों जन्मों में आँसुओं को बहाया है। सबने तुझे छोड़ दिया। तेरा पति भी तुझे छोड़कर चला गया। अन्त में जब किसा गौतमी अपने कष्टपूर्ण मानसिक ताप से भरे जीवन को छोड़कर भिक्षुणी संघ में शामिल होकर आनन्दविभोर हो गा उठती है - आह! आज मेरी पीड़ का तीर निकल गया। सभी प्रकार के बोझों को मंैने दूर फेंक दिया। पूरे हुए मेरे सब कर्तव्य - मुक्त हूँ। मैं सब बंधनों से, विमुक्त है मेरा चित, मैं किसा गौतमी यह कहती हूँ।
स्त्री पारिवारिक दुख में डूबी थी परन्तु स्वयं उसके अपने शरीर के दुख - जैसे माँ बनने की भंयकर पीड़ा भी झेलनी पड़ती थी जिसे आज तक माँ बनने की गर्वपूर्ण शब्द चाशनी में डूबो कर छुपा दिया जाता है। बुद्ध काल की स्त्री यानि थेरी किस्सा गौतमी में बनने में होने वाली पीड़ा का मार्मिक शब्दों में वर्णन करती है। कोई - कोई बच्चे जनने वाली माताएँ एक बार ही मृत्यु चाहती हुई, अपना गला काट लेती हंै, ताकि दोबारा यह असह्य दुख न सहना पड़े। कुछ सुकुमारियॉ विष खा लेती हैं। बच्चा जब पैदा नहीं होते और गर्भ के बीच में रूक जाता है तो रुग्ण मातृघातक बन जाता है और जच्चा बच्चा दोनों के दोनों ही विपदा अनुभव करतें हैं। माँ बनने की पीड़ा का ऐसा मार्मिक वर्णन संस्कृत साहित्य से लेकर आज तक वर्तमान साहित्य तक में दुर्लभ है। परिवार और समाज के नियमों - उपनियामों की चक्की में पिसती हुई नारी निराशा के सागर में आकंठ डूबी थी। मन में अवसाद के भाव समेटे जीवन से मुँह मोड़ते हुए आज तक न जाने कितनी स्त्रियाँ आत्महत्या करती आई है। सीहा थेरी अपने पूर्व पारिवारिक दुखों और निराश जीवन का वर्णन करते हुए कहती हंै, जीवन  में पूरी तरह निराश होकर एक दिन रस्सी को लेकर में घने वन में  घुस गई। सोचा बार - बार हीन आचरण करने से तो मेरे लिए यही श्रेय होगा कि मैं फांसी लगाकर मर जाऊँ  पर उसके निराशापूर्ण जिन्दगी से मुक्ति मिलती है भिक्षुणी संघ में शामिल होकर।
थेरी गाथा में गृहस्थ जीवन बिता चुकी थेरियों के अलावा ऐसी भी थेरियां थीं जो अविवाहित थीं। जो किसी भी पुरूष के संसर्ग में नहीं आना चाहती थी। जो विवाह न करके आध्यात्मिक सुख प्राप्त करते हुए जीवन बिताना चाहती थी। ऐसी थेरियों में गरीब परिवार की स्त्री से लेकर राजकुमारियाँ तक शामिल थीं। बुद्ध - काल में स्त्री अपनी मर्जी से अविवाहित भी रह सकती थीं।
बुद्ध जो कि शुरू में स्त्रियों को संघ में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे परन्तु आनन्द से विचार - विमर्श के बाद वे स्त्रियों को संघ में शामिल करने के पक्ष मे हो जाते हैं। इसका कारण यह कदापि नहीं कि वे स्त्रियों के विरोधी थे परन्तु परिवार में बच्चों के पालन - पोषण व घर - गृहस्थी के कर्तव्यों की वजह से बुद्ध इस अन्तर्द्वन्द्व में थे कि अगर स्त्रियाँ अपने परिवार व बच्चे छोड़कर संघ में आएगी तो उनके बच्चों का क्या होगा? उनका मानना था कि स्त्रियों से बढ़कर बच्चे को और कोई अच्छे से नहीं पाल सकता। परन्तु उन्होंने अपने इस अन्तर्द्वन्द्व पर विजय पायी और संघ के द्वार स्त्रियों के लिए खोल देने से डॉ. अम्बेडकर के कथानुसार बुद्ध ने औरत को भिक्षुणी बनने की आज्ञा देकर न केवल एक ओर उनके लिए आजादी का मार्ग खोल दिया बल्कि उन्हें सैक्स से मुक्त गरिमा पाने की अनुमति दी तो दूसरी ओर पुरूष के साथ समानता का मार्ग खोल दिया।
बुद्ध - काल में स्त्री सिर मुंडाए, चीवर धारण किए उन्मुक्त भाव से ध्यान लगा सकती थी। अपने समान भिक्षु से तर्क कर सकती थी। वे बेरोकटोक जंगल, पहाड़, पर्वत चढ़ सकती थी। स्वयं अपने होने के अहसास का अनुभव करती हुई। अपने को पुरूष की छत्रछाया से दूर एक सम्पूर्ण इकाई मानते हुए इस वास्तविक संसार को स्वंय अपने अनुसार सोच - समझ सकती थी।
बुद्ध के भिक्षुणी संघ में शामिल होने वाले स्त्रियों में अति प्रतिष्ठित गणिकाएँ एवं वेश्याएँ भी थीं। ये वो स्त्रियाँ थीं जो अपने रूप और पैसे से मतान्ध थीं। भिुक्षुणी संघ का आकर्षण इनका इनसे दूषित जीवन छुड़ा इन्हें संघ तक खींच लाया। इनमें प्रमुख थी आम्रपाली और अड्ढाकाशी। ये दोनों ही बाद में गौतम बुद्ध की सर्वाधिक प्रिय शिष्याओं में से थी। बुद्ध काल में गणिकाओं ओर वेश्याओं को अत्यन्त सम्मान मिलता था। अनेक लोग इनके चाहने वाले थे। इनको नगरवधू की उपाधि से विभूषित किया जाता था। परन्तु ये जानती थी ये आदर, सम्मान, धन - दौलत आदि केवल युवा रहने तक ही हैं। वृद्धावस्था में जब यह शरीर रोग का घर हो जाएगा, युवावस्था खत्म हो जाएगी तब कोई द्वार तक पर न फटकेगा। बुद्ध की चारों ओर होती प्रशंसा से प्रभावित होकर आम्रपाली ने गौतम बुद्ध और उनके शिष्यों को भोजन पर आमंत्रित किया। भोजन उपरान्त बुद्ध के भौतिक सुखों की निस्सारता पर प्रभावशाली प्रवचन सुन अम्रपाली सब कुछ छोड़ थेरी बन संघ में शामिल हो गई। अम्रपाली एक कुशल नृत्यांगना के अलावा अत्यंत उच्च कोटि की कवयित्री भी थी। वह अपनी वृद्धावस्था का अत्यंत सजीव काव्यमयी चित्र खींचते हुए कहती है - एक समय यह शरीर ऐसा था। इस समय यह जर्जर और अनेक दुखों का आलय है। एक ऐसे जीर्ण घर के समान जिसकी लीपन टूट - टूट कर नीचे गिर गई है। बिना लेपादि के यह जया का घर शरीर शीघ्र ही गिर जाएगा। जैसे टूटी हुई लीपन वाला जीर्ण घर, सत्यवादी के वचन कभी मिथ्या नहीं होते। अम्बपाली द्वारा मनुष्य शरीर का एक टूटे घर से बांधा गया रूपक अत्यन्त मार्मिक एवं मनोहारी है।
भिक्षुणी अड्ढा कासी थेरी में भिक्षुणी बनने से पूर्व राजगृह की अत्यंत प्रसिद्ध वेश्या थी। अड्ढा कासी की एक दिन की आय काशी राज्य की एक दिन की आय के बराबर थी, परन्तु भिक्षुणियों के सुखी स्वतंत्र और बौद्धिक जीवन से युक्त जीवन को देख कासी थेरी भिक्षुणी संघ में शामिल हो गई। अपने पूर्व जीवन पर दृष्टिपात करते हुए अपनी कहानी सुनाती है - किन्तु आज मेरा सारा सौन्दर्य आज मेरे लिए है घृणा का कारण ग्लानि पैदा करने वाला मैं उसके मोह से विरक्त हो चुकी हँू। मुझे अब और नहीं घूमना मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्कर में, मंैने साक्षात्कार कर लिया है तीनों विधाओं का। मैंने भगवान सम्यक् सम्बुद्ध के शासन को पूरा कर लिया है।
अपने समस्त दुखों से छुटकारा पाए अपनी मानसिक शारीरिक कमजोरियों पर काबू करके, मानसिक - बौद्धिक आध्यात्मिक भूख मिटाने व व्यक्तिगत - सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त करती हुई बुद्ध की समकालीन स्त्रियाँ भिक्षुणी संघ में शामिल होकर अपने व्यक्तित्व को पूर्ण मनोयोग से जीती हैं। वे अर्हत पद प्राप्त करती हैं।  अपने मनुष्य होने के अहसास को भिक्षुणी संघ में शामिल होकर कथा - कविताओं के माध्यम से अत्यंत सरल, सरस व निडरतापूर्वक बयान करती हैं। वे कामना करती हैं स्त्री मुक्ति की। स्त्री - मुक्ति के क्षेत्र में कविता - कहानियों द्वारा इतिहास रचती हैं। ये निडर थेरियाँ चीवर धारण किए सिर मुंडाए गली - गली, गाँव - गाँव, जंगल - जंगल, पर्वत - पर्वत की खाक छानती हुई निर्द्वन्द्व निर्भय पुरूषों की छत्र - छाया से दूर, स्त्री मुक्ति की राह पर निकल पड़ती हैं। मन, तन, वचन की पीड़ा से मुक्त जाति वर्ण लिंग व समाज के बन्धनों से स्वतंत्र हो वे गा उठती हैं - यहाँ इस शिला पर बैठी। मंै पूर्ण मुक्ति का अनुभव कर रही हँू। स्वाधीनता का वातावरण, मेरी आत्मा व शरीर को, आच्छादित किए हुए है।
थेरी गाथाएँ बुद्धकालीन ही नहीं अपितु आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। थेरी गाथाएँ स्त्री जगत को मानसिक, शारीरिक व बौद्धिक गुलामी के प्रति विद्रोह की चेतना जगाए उसे स्वतंत्र, निर्भय स्वाधीनता जीवन जीने की प्रेरणा देती है। भिक्षुणी संघ में पहली बार भारतीय समाज में स्त्रियों के अन्दर छिपी प्रतिभाएँ उर्जा एवं विचार स्वातंत्रय को न केवल पूर्ण अवसर मिला अपितु उन्हें मौलिक अधिकार समानता व स्वतंत्रता भी प्राप्त हुई। थेरी गाथाओं में थेरियों की उन्मुक्त उल्लासमयी वाणी कविताओं व कहानी के रूप में स्त्री समाज के साथ - साथ आज भारतीय समाज के लिए भी अमूल्य निधि है। थेरी गाथाएँ नवीनता के साथ - साथ आधुनिकता की मशाल जलाए मनुष्यमात्र को परतंत्रता के खिलाफ  उठ खड़े होने की प्रेरणा जगाती हैं। स्त्री मुक्ति के प्रतीक रूप में थेरी गाथाओं की कविता को लाखों - करोड़ों वर्षों तक याद रखा जाएगा।
पता 
ए डी 118 बी, शालीमार बाग,
दिल्ली 88, मोबाईल : ९८९९७००७६७
मेल  : anita.bharti@gmail.com

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