इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 30 अगस्त 2014

समाज की भाषा, परम्परा, संस्कृति,लोकसाहित्य और लोकगीत किसी की बपौती नहीं

 इन्हें बेचने और विकृत करने का कुत्सित प्रयास बंद हो 
कुछ साल पहले एक आडियो-वीडियो एलबम बाजार में आया, जिसका नाम है - चुलबुली। इस एलबम में एक युगल गीत है -
'' हाय-हाय तोर लाल फीता, देख के मोला चढ़ गे निशा।
हाय रे मोर मनीषा, हाय रे मोर मनीषा।''
गीत के बोल श्रृृँगारिक हैं, सुंदर हैं। छत्तीसगढ़ में यह एलबम बहुत लोकप्रिय और प्रसिद्ध हुआ था; और कमोबेश आज भी लोकप्रिय है। परन्तु इस गीत में बहुत सारी बातें मन-मस्तिष्क को चुभने-झकझोरने वाली हैं, आपत्तिजनक हैं; गीत-संगीत की लय में बहकर जिसे शायद हम नजरअंदाज कर जाते हैं। समाज में दूषित वातावरण पैदा करने वाली इस तरह की बातों को नजरअंदाज करने के पीछे क्या है हमारी मजबूरी ? मजबूरी कुछ भी नहीं है। आमजन के लिए क्या कहें, यहाँ के बुद्धिजीवी-साहित्यकार, हम सभी अपने खिलाफ हो रहे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और तमाम तरह के शोषणों को सहने और चुप रहने के लिए कंडीशण्ड हो चुके है। किसी कवि ने कहा है - '' जिंदा आदमी सोचता है, बोलता है। नहीं सोचने, नहीं बोलने से आदमी मर जाता है। '' हमने सोचना और बोलना बंद कर दिया है। क्या हम सब मरे हुए हैं ? जिस मुद्दे की ओर मैं आपका ध्यान आकृष्ट करने जा रहा हूँ वह एक सामाजिक मुद्दा है, उसका संबंध शायद '' शिक्षा का अधिकार अधिनियम '' से भी हो और इस कारण यह एक राष्ट्रीय मुद्दा होना चाहिये, परंतु छत्तीसगढ़ी भाषा से सम्बद्ध होने के कारण इस मुद्दे को मैं विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ियों की अस्मिता के साथ ही जोड़कर देखना चाहूँगा।
इस गीत में मुद्दा है नायिका की वेशभूषा (कस्ट्यूम), उसका अभिनय, गीत के दृश्य तथा इस गीत के फिल्मांकन की। नायिका की वेशभूषा प्राथमिक शालाओं अथवा पूर्व माध्यमिक शालाओं में पढ़ने वाली बालिकाओं, किशोरियों की है। बालिका की दोनों चोंटियाँ लाल फीतों से बंधी हुई हैं जो इस एलबम के प्रौढ़ नायक के जेहन में प्यार का नशा पैदा करते हैं। नायिका के पीठ पर बस्ता लदा हुआ है; जाहिर है, इस गीत की नायिका प्राथमिक शाला अथवा पूर्व माध्यमिक शाला में पढ़ने वाली कोई बालिका है। या तो वह घर से स्कूल जाने के लिए निकली है या स्कूल से घर लौट रही है। रास्ते में उसका वयस्क प्रेमी (प्रेमी की वेशभूषा छात्रों वाली नहीं है।) मिल जाता है और उसके साथ प्रेमालाप करते हुए छेड़छाड़ युक्त संयोग श्रृँगार का गीत गाने लगता है। प्रेम-अभिसार का आमंत्रण देने वाले प्यार भरे कुछ मीठे प्रतिरोधों के बाद नायिका भी नायक का सुर अलापने लगती है। प्राथमिक शालाओं अथवा पूर्व माध्यमिक शालाओं में पढ़ने वाली बालिकाओं, किशोरियों की अवस्था बारह-तेरह वर्ष की होती हैं। किसी अवयस्क छात्रा के साथ इस तरह का फिल्मांकन क्या आपत्तिजनक नहीं है? बालिका हो अथवा बालक, यह अवस्था प्यार-मुहब्बत करने की अवस्था नहीं होती है। किशोर-मन सदा मधुर भावनाओं, कल्पनाओं और स्वप्नों के संसार में विचरण कर रहा होता है। प्यार भरे छेड़़छाड़ से युक्त इस गीत का और इस गीत के प्रेमालापों से युक्त दृश्यों का किसी किशोर-मन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, इसकी सहज कल्पना किया जा सकता है। क्या यह गीत अवयस्क बालिकाओं के प्रति यौन हिंसा को बढ़ावा देने वाला, इसके लिए दुष्प्रेरित करने वाला नहीं है? क्या यह गीत छात्र-छात्राओं के मन में शाला और कक्षा के प्रति प्रतिकर्षण और अरूचि पैदा कर उन्हें कल्पनाओं और अपराध की दुनिया की और दुष्प्रेरित करने वाला नहीं है? अवयस्क बालिका के साथ इस तरह की छेड़छाड़ या छेड़छाड़ का दृश्यांकन करना क्या गंभीर आपराधिक कृत्य नहीं है? '' शिक्षा का अधिकार अधिनियम '' के अनुसार स्कूली छात्र-छात्राओं से किसी भी प्रकार का श्रम करवाना तथा उन्हें शारीरिक, मानसिक अथवा भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करना अपराध है। तो क्या सिर्फ इसलिए कि इस एलबम के निर्माण के समय '' शिक्षा का अधिकार अधिनियम '' नहीं था, निर्माता को बख्श देना चाहिए?
भाषा और संस्कृति का अटूट संबंध होता है। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की एक समृद्ध परंपरा है। इन लोकगीतों में यहाँ की परंपराओं, रीतिरिवाजों और यहाँ के लोकसमाज की भावनाओं आशाओं, इच्छाओं और आकांक्षाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति होती है। इन लोकगीतों का कलात्मक सौन्दर्य आह्लादकारी और मनोहारी होता है। इनमें भाषा का सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य होता है। परन्तु खेद का विषय है कि एक अर्से से, छत्तीसगढ़ी गीतों के आडियो-वीडियो एलबम जो जारी हो रहे हैं, उनमें छत्तीसगढ़ की भाषा और यहाँ की लोकसंस्कृति को विकृत रूप में प्रस्तुत करने की एक विकृत परंपरा विकसित हुई है और इस परंपरा को आगे बढ़ाने की होड़ सी मची हुई है। छत्तीसगढ़ी गीतों के इन एलबमों की भाषा में भाषा के सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य का स्थान, आपत्तिजनक फूहड़ता और कामुकता ने ले लिया है। एलबम निर्माताओं की दलील होती है - '' हम वही माल तैयार करते हैं, बाजार में जिसकी मांग होती है, ग्राहक जिसे खरीदना चाहता है।''
बाजार अब इन निर्माताओं के घर की इज्जत की मांग कर रही है। ग्राहक अब इनकी मां, बहन, बहू और बेटियों की इज्जत खरीदना चाहता है। इनकी मां, बहन, बहू और बेटियाँ इनका निजी मामला है, संभव है, ये इन्हें भी बेंच देंगे। लेकिन समाज की भाषा, समाज की परंपरा, समाज की संस्कृति, लोकसाहित्य और लोकगीत इनकी बपौती नहीं है; ये इन्हें बेचने और विकृत करने का कुत्सित प्रयास बंद करे।
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संपादक

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