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शनिवार, 30 अगस्त 2014

कविता

दिनेश कुशवाहा 
रेखा
जो लोग तुम्हें नशा कहते थे
मुकम्मल ताजमहल
उनके लिए भी
नहीं है तुम्हारा कोई पुरातात्विक महत्व
कि बचाकर रखे जाएँगे तुम्हारे खंडहर।

न तो इन्द्र ही रखेंगे बचाकर तुम्हें
धरती पर सहस्र वर्ष
पुरानी वारुणी की तरह।

अजंता-एलोरा के शिल्पियों के स्वप्न भी
नहीं थीं तुम
पर तुम्हारे माथे पर लिखा जा सकता था
कोणार्क का सूर्य मंदिर।

पहली बार देखा था तुम्हें
तो याद आया एक टुकड़ा कहरवा
लगा जैसे रजत खंभे पर हाथ टिकाये
तिर्यक मुद्रा में खड़ी हो कोई यक्षिणी
जिसकी गहरी नाभि और उन्नत वक्षों पर
बार-बार आकर टिक जाता हो ढीठ सूरज
एक याचक का पीला चेहरा लिये हुए।

मेरा कहानीकार दोस्त देवेन
करता था जिन दिनों प्यार
उन दिनों भी
उसके रात के सपनों में
चली आती थीं तुम
ऐसा क्या था दुर्निवार?
जो बान्हने-छानने पर भी
झाँक ही जाता था
जीभ चिढ़ाती चंचल किशोरी की तरह।

तुम्हारे चौड़े पंजे नाचे होंगे न जाने कितने नाच
तुम्हारी लम्बी अँगुलियाँ बुनी होंगी ज़रूर
कुछ मोज़े-कुछ स्वेटर
एक अनदेखे बच्चे के लिए।

मैंने देखा कि कला में डूब जाना
भूल जाना है काल को
पर हमें रात-दिन डसती रहती हैं उसकी क्रूरताएँ
कि जिसे मन से उरेहते हैं ब्रह्मा
उसे कैसे लग जाती है
पहले उनकी ही नज़र!

सोचता रहा मैं
कि धरती की सुन्दर कलावती बेटियों को
कौन बाँटता है
नटी से लेकर नगरवधू तक के ख़ानों में
कि जिसे हज़ारों-हज़ार लोग
लिफ़ाफे़ में भरकर भेजते हैं सिन्दूर
उसे कोई नहीं भेजता डिठौना?


हेलेन
 हँसना कोई हँसी-ठ_ा नहीं है
क्या आप बता सकते हैं
अपनी ज़िन्दगी में कितनी बार
हँसे होंगे ईसा मसीह?

ठ_ा नहीं है थिरकना भी
या तो बलइया लेती हैं
या विद्रोह करती है देह की
एक-एक बोटी।

मैंने उसे कभी खड़े
या लेटे हुए नहीं देखा
समुद्र का एक उत्ताल नर्तन
आता था लहराते हुए
और लौट जाता था
सामने किनारों तक छूकर
अपनी अथाह दुनिया में।

चमकते श्रमबिन्दु याद दिलाते थे
कि अभी-अभी
पर्वत-जंगल-मैदान लाँघती
इधर से दौड़ती हुई गई लकड़हारे की बेटी
या किसी वनवासी ने चन्दन घिसकर
बिंदियों से सजा दिए हैं
अपनी प्रिया के कपोल
और उसे पहनाने के लिए
लेने गया है वन देवता से एक चितकवरी खाल।

मैंने उसके हाथ में कभी पानी नहीं देखा
न कोई खाने की चीज़
जब भी देखी तो शराब
मन हुआ कई बार
जैसे कोठे पर
मिली लड़की से पूछने को होता है
क्या है तुम्हारा असली नाम?
उसने दुखी होकर कहा
झूमते हाथी, दौड़ते खरगोश
नाचते मोर से तुम नहीं पूछते
उसका असली नाम?
तुम्हारी पंचकन्याओं में
कैसे आएँगी इजाडोरा डंकन
प्यारी मग्दालीना?

दुनिया के सारे कलावंत बेटों को
मैंने ही नहीं बनाया शराबख़ोर!
न झूठों से कहा
कि खोल लो शराब के कराख़ाने!
मैंने नहीं बिछाई
सूली ऊपर पिया की सेज!

बारूद से जली
गुलाब की पत्तियों का हाहाकार
मैंने नहीं चुराया।

स्मिता पाटिल
उसके भीतर एक झरना था
कितनी विचित्र बात है
एक दिन वह उसमें नहा रही थी
लोगों ने देखा
देखकर भी नहीं देखा
उसकी आँखों का पानी।

मैना ने कोशिश की
कि कैसे गाया जाए पिंजरे का गीत
कि लोग
आँखों में देखने के आदी हो जाएँ। 

तब घर के पीछे बँसवारी में
हवा साँय-साँय करती थी
जब उसने कोयल की नक़ल की थी
और चल पड़ी थी बगीचे की ओर
कि देखा
बड़े बरगद के पेड़ पर
किस तरह ध्यान लगाकर बैठते हैं गिद्ध
पूरे सीवान की थाह लेते हुए।

पिटती-लुटती-कुढ़ती स्त्री के रूप में
गालियाँ नहीं
मंत्र बुदबुदाती थी नैना जोगिन।


एक दिन मैंने उससे पूछा
बचपन में तुम ज़रूर सुड़कती रही होंगी नाक
वह मुस्कुराकर रह गई
मैंने कहा
जिसने गौतम बुद्ध को खिलाई थी खीर
तुम जैसी ही रही होगी वह सुजाता।

उसने पूछा
पुरुष के मुँह में लगी सिगरेट
बढ़कर सुलगा देने वाली लड़की भी
क्या इसी तरह आ सकती है इतिहास में?

कविता द्रोही भी मानते थे
अभिनय करती थी कविता
जीवन के रंगमंच पर
भीड़ भरी सिटी बसों में।

सुनते थे हम प्रसव की पीड़ा के बाद
औरत जनमती है दूसरी बार
अभिनेत्री!
जीवन के इस अभिशप्त अभिनय के लिए
हम तैयार नहीं थे।

मीना कुमारी
बिस्तर पर जाते ही
किसी का माथा सहलाने के लिए
हुलसी हथेलियाँ
फफक पड़ती इतनी
कि उसके चेहरे पर उभर आती थी कोख।

जलते बलुवे पर नंगे पैर
चली जा रही थी एक माँ
तलवों में कपड़ा लपेटे
जब हम उसे देख रहे थे अमराइयों में।

महुवा के पेड़ तले
अपने आँचल में बीनते हुए कुछ
शायद दुनिया का सबसे रस भरा फूल
उसके गाल खिल उठते थे
और साथ ही भर आती थीं आँखें।

यह क्या उल्लाह मियाँ?
मात्र आँसुओं की भीख के लिए ही
नहीं होते बड़री आँखों के कटोरे।

चाँदनी में सिफ़र्  चाँद-तारों से
बातें कर जी नहीं भरता
चाहिए ही चाहिए एक आदमी
अकेले आदमी का आसमान
कभी ख़त्म नहीं होता।

वर्जित फल खाया भी, नहीं भी
स्वर्ग में रही भी, नहीं भी
पर ज़िन्दगी-भर चबाती रही धतूरे के बीज
और लोग कैंथ की तरह उसका कच्चापन
अपनी लाडली के लिए ही
रसूल ने भेजा था एक जानमाज़
मु_ी-भर खजूर और एक चटाई।

झुकी पलकें पलटकर लिखतीं
एक ऐसे महान अभिनय का शिलालेख
कि मन करता था चूम लें इसे
जैसे करोड़ों-करोड़ लोग चूमते हैं क़ाबे का पत्थर
या जैसे बच्चों को बेवज़ह चूम लेते हैं।
 पता - 
हिन्दी विभाग, 
अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा (म0प्र0)
फोन नं0  -     (07662) 233929, 09425847022        

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