इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 29 नवंबर 2014

वर्गीय विभाजन को बनाए रखने वाले सांस्‍कृतिक हथियार के रूप में ' इंग्लिश ' उर्फ ' अंग्रेजी '

अश्विनी कुमार 

भगत सिंह ने कहा था - '' मुझे विश्वास है कि आने वाले 15 - 20 सालों में ये गोरे मेरे देश को छोड़ कर जाएंगे। पर मुझे डर है कि आज जिन पदों पर ये '' गोरे अंग्रेज''  विराजमान हैं, उस पर पद पर '' काले अंग्रेज''  विराजमान हो जाएंगे तो हमारी लड़ाई और भी कठिन हो जाएगी।''  भगत सिंह की इस घोषणा के लगभग 17 साल बाद '' गोरे अंग्रेज ''  तो चले गये। पर जाते जाते वे सत्ता मैकाले के मानस पुत्रों अर्थात '' काले अंग्रेजों''    को सौंप गये। फिर  क्या था, सरकार बदली, झंडा बदला, रंगाई - पुताई के साथ राज व्यवस्था को भी नया रंग रूप भी मिला पर राज सत्ता का ढाँचा वही का वही रहा। वही अंग्रेजी कानून, वही अंग्रेजी शिक्षाव्यवस्था। जी हाँ! राज सत्ता का स्वरूप नहीं बदला। एक तरीका जिसके माध्यम से तीन लाख अंग्रेज तीस चालीस करोड़ अविभाजित हिन्दुस्तानियों को नियंत्रित करते थे। यह तंत्र ही विरासत के रूप में काले अंग्रेजों को प्राप्त हुआ। अंग्रेजों के समय से ही भारतीय समाज में अंगे्रजीयत का वर्चस्व अंग्रेजों द्वारा राजसत्ता में सहयोग के लिए पैदा किये के सहभागी दलाल वर्ग का सांस्कृतिक वर्चस्व रहा। 200 साल के अंग्रेजी राज में, अंग्रेजों का सहभागी - सहयोगी अंग्रेजी दां वर्ग ही भारतीय समाज में उच्च एलिट वर्ग के रुप में स्थापित हुआ। यह वर्ग ही शिक्षा, नौकरशाही, कांग्रेस, अंग्रेजों के सहयोगी समाजसेवकों अर्थात सत्ता के हर शीर्ष पर काबीज भी हुआ और 1947 में हुए सत्ता हस्तांरण के बाद भी शीर्षत् पदों पर बना रहा है। स्पष्ट है झंडा बदला पर डंडा वही का वही रहा। भारतीय समाज में अंग्रेजी मैकाले के मानस पुत्रों की ही सुविधा की भाषा है। अंग्रेजीयत का वर्चस्व इस वर्ग का ही राजनैतिक, आर्थिक एवं साँस्कृतिक वर्चस्व भी है। अंग्रेजी वर्चस्व के हथियार के रुप में राजनैतिक, आर्थिक एवं ज्ञान की सत्ता को इस देश की 3 प्रतिशत आबादी तक समेटे रखती है। राजसत्ता का चंद हाथों तक सिमटा रहना ही उसे भ्रष्ट बनाता है। अत: यह अंग्रेजीयत का सिस्टम ही भ्रष्टाचार, गैर - बराबरी और शोषण की व्यवस्था का मूल कारण है। यह परिवर्तन भी इंग्लिश मीडियम सिस्टम द्वारा व्यवस्था को 1- 2 प्रतिशत के अंग्रेजीदां वर्ग तक समेटे रखने के लिए ही है।
अभी हाल ही में सिविल सेवा चयन हेतु ली जाने वाली सीसैट ( CSAT ) की परीक्षा पर परीक्षा के अभ्यर्थियों का गुस्सा फूटा, पर ये कहानी सिविल सेवा की सीसैट परीक्षा तक सीमित नहीं है। यूपीएसी (  UPSC )ने 2011 से सीसैट ( CSAT ) की नयी प्रणाली लागू कर प्रारंभिक परीक्षा के स्वरुप में परिवर्तन किया है। बोधगम्यता अपने आप में मूल्यांकन की एक बेहतर, विस्तरित एवं बहुआयामी पद्धति है। पर सीसैट परीक्षा में अंग्रेजीदां वर्ग के अनुरूप कॉम्प्रिहेंशन तैयार करने एवं उसका मैकेनिकल सरकारी हिन्दी में अनुवाद करने की वजह से ही समस्या पैदा हुई है। यूपीएससी की इस परीक्षा ने यह सिद्ध किया कि अच्छे सिद्धांत को जिस तरह बुरे उद्देश्य के लिए प्रयोग किया जा सकता है। ऐसा भी नहीं कि यूपीएससी के द्वारा 2011 से पहले ली जाने वाली परीक्षा भेद - भाव मुक्त थी। यदि हम 2011 से पूर्व के ग्राफ को भी देखें तो पाते हैं कि प्रारंभिक परीक्षा में बेशक हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषा माध्यमों से औसतन 45 प्रतिशत अभ्यार्थी पास होते थे पर साक्षात्कार के बाद आँकड़ा औसतन 10- 12 या उससे भी कम रहा जाता था। अत: इस परीक्षा के पुराने पैटर्न में भी अंग्रेजीदां वर्ग का ही दबदबा था। 1979 से पूर्व तो यूपीएससी से पूर्व सिविल सेवा परीक्षा पूर्णत: अंग्रेजी में ही ली जाती थी और आज भी यूपीएससी  द्वारा ली जाने वाली अधिकतर परीक्षा अंग्रेजी में संपन्न होती है। चाहे वह भारतीय आर्थिक सेवा परीक्षा हो या भारतीय वन सेवा परीक्षा इन सभी परीक्षाओं के माध्यम उच्च ओहदों को अंग्रेजीदां वर्ग के लिए आरक्षित रखा गया है। वही हाल राज्य पीसीएस, एस.एस.सी., डी.एस.एस.एस.बी, बैकिंग और तमाम दूसरी नौकरियों का चयन करने वाली संस्थानों का भी है। इन सभी संस्थानों में अंग्रेजी एक अनिवार्य पत्र के रुप में रहता है। डी.एस.एस.एस.बी. ने तो अभी हाल ही में चयन परीक्षाओं में पहले से चले आ रहे अंग्रेजी के वस्तुनिष्ट प्रश्रों के अतिरिक्त अंग्रेजी की वर्णनात्मक परीक्षा को भी अनिवार्य बनाया है। (जानकारी के स्रोत - यूपीएससी रिपोर्ट, पीएससी,डी.एस.एस.एस.बी. बेवसाईट आदि ) सच्चाई यह है कि जिस भी परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता है वह 3 प्रतिशत के अंग्रेजीदां वर्ग को 50 - 100 प्रतिशत तक आगे बढ़ाती है और 95 प्रतिशत के गैर अंग्रेजीदां ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्न मध्यमवर्गीय आबादी को 30 - 100 प्रतिशत तक पीछे धकेलती है। इन सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता इसलिए रखी जाती है कि अंग्रेजी के सहारे इस देश की ग्रामीण, कस्बाई गैर अंग्रेजीदां वर्ग को सत्ता के गलियारे से दूर रखा जा सके। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय में संविधान की धारा 348 के माध्यम से अंग्रेजीदां वर्ग का आरक्षण सुनिश्चित किया गया है। इस प्रकार सत्ता पर अंग्रेजीदां वर्ग का आरक्षण बना रहता है।
सरकार ने सीसैट की प्रणाली का विरोध करने वाले अभ्यार्थियों की आवाज को न केवल अनसुना कर दिया बल्कि बुरी तरह कुचल भी दिया। तमाम दूसरी परीक्षाओं एवं दस्तावेजों की भांति सिविल सेवा परीक्षा की सीसैट प्रणाली भी मूल प्रश्र पत्र अंग्रेजी में बनाकर हिन्दी में महज अव्यवहारिक एवं कृत्रिम अनुवाद भर ही किया गया। इस अनुवाद की प्रक्रिया में प्रचलन से बाहर के शब्दों का प्रयोग किया गया। जो पढ़ने में तो संस्कृतनिष्ट - तत्सम शब्द प्रतीत होते हैं। पर हकीकत में उनका प्रचलन में कहीं कोई प्रयोग नहीं होता है। इन अप्रचलित शब्दों ने ही अभ्यार्थियों को गुमराह किया। पर यह समस्या सिर्फ सी - सेट परीक्षा की नहीं। आप किसी भी सरकारी दस्तावेज को उठा ले और चौराहे पर ले जाकर पढ़ भर दे। फिर पता लगा ले कितने लोग इस सरकारी अनुवाद की हिन्दी को समझ पाते हैं। सच्चाई तो यह है कि जिस हिन्दी का विरोध हमारे तमिल तेलगू भाषी भाई करते हैं, वह सरकारी कृत्रिम, एसी कमरों में बैठकर गढ़ी गयी हिन्दी तथाकथित हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों की समझ से बाहर की है। युरोप और अमेरिका की सरकारों के सरकारी दस्तावेज मामूली से मामूली पढ़ा लिखा व्यक्ति समझ सकता है। पर भारत में स्थिति कुछ भिन्न है। अंग्रेजी तो है ही परदेशी पर उस अंग्रेजी के अनुवाद के अनुरुप गढ़ी गयी हिन्दी और भी अव्यवहारिक है। सीसैट आन्दोलन हकीकत में प्रचलन से बाहर की इस कृत्रिम हिन्दी अनुवाद के विरुद्ध ही आन्दोलन था। जिसे सरकार द्वारा अनिवार्य अंग्रेजी के प्रश्रों में छूट देकर इतिश्री करने की कोशिश की गई। अभ्यार्थी न तो कॉम्प्रिहेंशन के खिलाफ थे न रिजनिंग के। अभ्यार्थियों की मुख्य मांग तो मूल प्रश्रों को भारतीय भाषाओं में बनाए जाने की ही थी। जिसका सरकार ने न केवल अवहेलना की बल्कि आन्दोलन को गुमराह करने के लिए साम - दाम -दण्ड - भेद सभी उपायों का प्रयोग किया। अंत में पूर्ण अहिंसात्मक रुप से चलने वाले इस आन्दोलन को समाप्त करने के लिए न केवल दमनात्मक उपाय ही अपनाए अपितु आईएएस अभ्यार्थियों के गढ़ कहलाने वाले मुखर्जी नगर क्षेत्र में अघोषित कर्फ्यू की स्थिति भी पैदा कर दी। सरकार यहीं तक नहीं रुकी, उसने अभ्यार्थियों में भय पैदा करने हेतु निर्दोष अभ्यार्थियों पर पुलिस केस भी दर्ज किये।
संवैधानिक संस्था यूपीएससी, डीएसएसएसबी,राज्यों की पीसीएस एवं गैर संवैधानिक संस्था यूजीसी, आई.आई.टी., आई.आई.एम. आदि बैरिकेटिंग एजेंसी भर हैं जो इस सिस्टम को बनाए रखने का काम करती है। भारत में अंग्रेजी सिर्फ भाषा नहीं व्यवस्था बना दिया है। भारत के संविधान की धारा 348, 343 (1)& ( 2 ), 120,210, 351, 147 ने अंग्रेजी को व्यवस्था बना दिया है। अंग्रेजी की अनिवार्यता इस संविधान जनित व्यवस्था का ही परिणाम है। आने जाने वाली सरकारें ऑपरेटिंग एजेंसी के रुप में इस व्यवस्था का काम करती है। इसलिए भारतीय भाषा आंदोलन से जुडे अटल बिहारी बाजपेयी भी सत्ता में आने के बाद न केवल अंग्रेजीदां व्यवस्था के सामने घुटने टेके बल्कि यूपीएससी के बाहर चल रहे धरने को भी उखाड़ फेंका। यही हाल मोदी सरकार का है। एक तरफ मोदी देश से बाहर जाकर हिन्दी में भाषण देतेे हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं की सरकार भारतीय भाषाओं में मूल प्रश्र पत्र बनाने की माँग को लेकर चल रहे सीसैट आन्दोलन का दमन करती है। जी हाँ,साथियों। इंग्लिश मीडियम सिर्फ स्कूल ही नहीं होते, इंग्लिश मीडियम अदालतें भी होती है। इंग्लिश मीडियम संसद के कानून भी होते हैं, पी.एम.ओ. समेत सम्पूर्ण नौकरशाही का ढाँचा इंग्लिश मीडियम ही है। और इन सबको पोसने एवं बचाए रखने का काम इंग्लिश मीडियम विश्वविद्यालय,एम्स, आई. आई.एस.,यु.पी.एस.पी.,डी.एस.एस.एस.बी. आदि संस्थान करते हैं। यही अल्पतांत्रिक इंग्लिश मीडियम सिस्टम भ्रष्टाचार, शोषण, गैरबराबरी की व्यवस्था पर साँस्कृतिक ठप्पा लगाता है। स्कूल, ओह। स्कूल तो बेचारे इसलिए इंग्लिश मीडियम खुलते है क्योंकि ये सभी संस्थाएं इंग्लिश मीडियम कल्चर को पैदा करती है। स्कूल व्यवस्था राजसत्ता की उपव्यवस्था है। स्कूली व्यवस्था की प्रकृति वैसी ही होगी, जैसी राजसत्ता की होगी। चूंकि राजसत्ता गैर बराबरी को बनाए रखने वाली इंग्लिश मीडियम वर्ग द्वारा पोषित है अत: स्कूली व्यवस्था भी बहुस्तरीय इंग्लिश मीडियम केन्द्रित है। जब तक राजव्यवस्था गैरबराबरी की इंग्लिश मीडियम प्रकृति की रहेगी तब तक स्कूली व्यवस्था भी  गैरबराबरी की इंग्लिश मीडियम प्रकृति रहेगी। जब तक राजसत्ता इंग्लिश मिडियम वर्ग के हाथ में रहेगी तब तक इंग्लिश मीडियम सिस्टम का शोषण, दमन और भ्रष्टाचार भी कायम रहेगा। इंग्लिश मीडियम शिक्षा व्यवस्था सामाजिक मीडियम स्तर का निर्धारण करने वाले के हथियार के रुप में इंग्लिश मीडियम राजव्यवस्था के प्रति वफादार लोगों को ही इंग्लिश मीडियम सिस्टम में स्थान देती है। इंग्लिश मीडियम राजव्यवस्था, इंग्लिश मीडियम शिक्षा के माध्यम से ही अपने आप को सुरक्षित रखने का घेरा तैयार करती है। इंग्लिश मीडियम एजुकेशन व्यवस्था के दास के रुप में देश की ग्रामीण, कस्बाई, निम्र एवं निम्न मध्यमवर्गीय आबादी को मुख्यधारा से दूर रख सत्ता के शीर्ष को उच्चवर्गीय एलीट क्लास के लिए आरक्षित रखता है। आईआईटी, एम्स,आईआईएम और तमाम अति विशिष्ट माने जाने वाले विश्वविद्यालय ये सभी के सभी संस्थान अंग्रेजीयत के सामाजिक वर्चस्व का सांस्कृतिक बोध पैदा करने का ही काम करते हैं। इन सभी संस्थाओं में पढ़ा व्यक्ति इस देश का कर्णधार बनेगा और मेरठ, गोरखपुर, सारण जैसे देहाती इलाकों के विश्वविद्यालय का विद्यार्थी चाय बेचेगा। आज अंग्रेजीदां बनने की चाह ने इस देश को अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ रखा है कि समाज का हर तबका अपना सब कुछ दांव पर लगा कर अपनी भाषा का शुद्धिकरण की चाह रखता है। हरियाणवी, भोजपुरी, मैथिली, बांगड़ी, बोलने वाले बैकवर्ड कहलाएंगे और दो लाइन अंग्रेजी में गिट - पिटाए नहीं की मॉडर्न हो जाएंगे। अंग्रेजीदां बनकर हर कोई गिट - पिटाना चाहता है। पर भाषा परिवेश से हासिल होती है, न कि स्कूल कालेजों की पढ़ाई से। अत: अंग्रेजी के चक्कर में लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दाखिला करा तो देते हैं, पर वे ज्ञान के नाम पर अंग्रेजीयत के गुलाम बनकर रह जाते हैं। अंग्रेजी के चक्कर में न तो अंग्रेजी ही आती है न कोई अन्य विषय ही। इस अंग्रेजी के चक्कर में हमारे बच्चे रट्टू तोते बन कर के रह गये हैं। पर वह अंग्रेजी ही है जो इस देश की 95 प्रतिशत ग्रामीण, कस्बाई, निम्न एवं निम्नमध्यमवर्गीय मेहनतकश तबके को व्यवस्था से दूर रखने का काम करती है। और साथ यह ज्ञान, पूंजी, नौकरशाही, राजनीति के शीर्ष को 3 प्रतिशत ऊपरी तबके तक  के लिए सुरक्षित भी रखती है। बस यहीं से भ्रष्टाचार, शोषण, गैरबराबरी, गड़बड़झाला शुरु होता है। अंग्रेजीयत ही भ्रष्टाचार, शोषण गैरबराबरी के सांस्कृतिकरण करने का काम करती है। अंग्रेजी को सिर्फ भाषा समझना उसकी ताकत को कम कर आंकना है। अंग्रेजी सिर्फ भाषा नहीं भारतीय समाज में वर्चस्व का बोध भी है। भारत में अंग्रेजी सिर्फ भाषा नहीं, वर्गीयविभाजन को बनाए रखने का व्यवस्था - जनित साँस्कृतिक हथियार भी है।
विदेशी एवं परिवेश के बाहर की भाषा में डिग्री ही पैदा की जा सकती है, ज्ञान नहीं। जनभाषाओं में ही जन शिक्षा संभव है। औपचारिक शिक्षा (स्कूल कॉलेज से मिलने वाली) और अनौपचारिक शिक्षा (सामाजिक विचार विमर्श से पैदा होने वाला ज्ञान ) ही जन मानस को जागृत कर सकती है। अत: जनभाषाओं में ही ज्ञान पैदा होगा और वह जन ज्ञान ही जन जागृति लाएगा। जन जागृति के बिना कोई बदलाव नहीं लाया जा सकता। जन जागृति ही क्रांति का आगाज़ है। जैसा कि भगत सिंह ने भी कहा था कि क्रांति की तलवार विचारों की शान पर ही तेज होती है और मौलिक ज्ञान और विचार तो स्व - भाषा में ही पैदा हो सकता है। एक विदेशी या परिवेश के बाहर की भाषा में हम रट तो सकते हैं, मौलिक एवं वैचारिक ज्ञान हासिल नहीं कर सकते। अत: त्वरित प्रभाव से :-
1 युपीएससी, एसएससी, डीएसएसएसबी, आईआईटी, आईआईएस समेत समस्त बेहतर माने जाने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों / विश्वविद्यालयों की परीक्षा एवं शिक्षण का माध्यम भारतीय जन - बोली भाषाएं ही हो तथा इन संस्थाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता पूर्णत: समाप्त हो।
2 सी - सैट का प्रश्र पत्र ही नहीं अपितु सभी परीक्षाओं के प्रश्र पत्र मूल रु प से भारतीय भाषाओं में ही छपे, उनका कृत्रिम अनुवाद होना बंद हो।
3 सभी स्तर की अदालतों में, न्याय जनता की बोली - भाषा में ही हो। निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की कार्यवाही, फैसले एवं आदेश देश की अनिवार्य रुप से जनता की बोली - भाषाओं में ही हो।
4 संसद एवं विधानसभाओं में कानून मूल रुप में भारतीय भाषाओं में ही बने, भारतीय भाषाओं में महज उनका कृत्रिम अनुवाद भर न हो
mo - 09990210469 

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