इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 नवंबर 2014

दलित प्रश्‍न और रेणु

( हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श अब हाशिये से निकलकर केन्द्र में आ चुका है। डॉ. पूनम रानी ने आंचलिक साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध उपन्यास '' मैला आँचल '' तथा '' परती परिकथा '' तथा उनकी कुछ चर्चित कहानियों - यथा '' रसप्रिया '' , '' मिरदंगिया पंचकौड़ी '' आदि में; इस रहस्योद्याटन के साथ कि फणीश्वरनाथ रेणु स्वयं दलित वर्ग से ही आते थे; दलित विमर्श की पड़ताल किया है। - संपादक)

डां. पूनम रानी 

दलितों के शोषण, संघर्ष और चेतना को साहित्य में उकेरने का जितना काम दलित साहित्यकारों ने किया उतना काम रेणु ने भी अपने साहित्य में किया है। उनके साहित्य का अनुशीलन किया जाए तो समझ में आता है कि उन्होंने बड़ी महीनता से दलितों के शोषण उनके संघर्ष उनकी उभरती चेतना को अपने साहित्य में रेखांकित किया है। रेणु इतनी बखूबी से दलितों की स्थिति को इसलिए दर्शा पाए क्योंकि रेणु जाति से खुद दलित ही थे इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं या जानते भी हैं तो बहुत कम रेखांकित करते हैं। रेणु उत्तर भारत की अति पिछड़ी और दलित जाति धानक जाति से थे जो आज भी बड़ी दयनीय स्थिति में हैं, ज्यादातर आबादी अशिक्षित हैं, औरतें और मर्द खेतीहर मजदूर हैं या ईंट के भट्टो पर काम कर रहे हैं। शायद यही वजह थी कि उनके पात्र आदर्श वादी कम यर्थाथवादी ज्यादा नजर आते हैं अपनी अच्छाई बुराइयों समेत नजर आते हैं सफेद काले नहीं बल्कि ग्रे नजर आते हैं। जिस तरह कहा जाता है कि अगर भारत को समझना है तो प्रेमचन्द के साहित्य को पढ़ना चाहिए।  उसी तरह मेरा मानना है कि अगर बिहार के जातिवादी समाज को समझना है तो रेणु के कथा साहित्य को पढ़ना चाहिए ऐसी कोई भी चीज नहीं जो रेणु की नज़रों से बची हो । रेणु ने मैला आंचल की भूमिका में ही स्पष्ट कर दिया था कि 'इसमें फूल भी हैं शूल भी , धूमिल भी है , गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी - मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया।''1 रेणु के कथा साहित्य में भी दलित जीवन को लेकर अनेक प्रसंग मिलते है जिनसे स्वतन्त्रा पूर्व और पश्चात की बिहार राज्य के दलितों की स्थिति के बारे में पता चलता है। रेणु ने पूर्णिया क्षेत्र की रोजमर्रा की जिंदगी को अपने कथा साहित्य में उभारा है। बिहार में जाति - व्यवस्था कितनी मजबूत थी यह प्राय: रेणु अपने सभी उपन्यासों में चित्रित करते हैं। 'मैला आंचल ' उपन्यास का मेरीगंज गाँव जाति के अनुसार विभिन्न दलों में विभक्त है। गाँव की इस दलबन्दी का परिचय देते हुए लेखक कहता है - 'अब गाँव में तीन प्रमुख दल हैं - कायस्थ, राजपूत और यादव। ब्राह्मण लोग अभी भी तृतीय शक्ति हैं। गांव के अन्य जाति के लोग भी सुविधानुसार इन्हीं तीनों दलों में बंटें हुए हैं। 2 इसी प्रकार 'परती परिकथा ' उपन्यास में भी गाँव की आत्मा जातीयता के आधार पर विभक्त है। सोलकन्ह टोली, भूमिहार टोली, नट्टिन टोली। रेणु बिना जाति का नाम लिए किसी पात्र का परिचय नहीं दे पाते जैसे जाति ही उसका नाम है। जब वे विभिन्न टोलों के बारे में उल्लेख करते हैं तो समझ में आ जाता है कि उपन्यास में जातियाँ एक प्रमुख भूमिका निभाएंगी और ऐसा होता भी है। तभी तो डॉ प्रशांत को जाति जैसे प्रश्न से रू-ब-रू होना पड़ता है। गाँव वाले पहला प्रश्न ही जाति से संबंधित करते हैं - जात ?... नाम पूछने के बाद ही लोग यहाँ उसकी जाति के बारे में पूछते हैं। लेकिन यहां तो हर आदमी जाति पूछता है। प्रशांत हंसकर कभी कहता है - जाति ? डॉक्टर ! बंगाली है या बिहारी? हिन्दुस्तानी, डाक्टर जवाब देता है। जाति बहुत बड़ी चीज है। जात-पांत नहीं मानने वालों की भी जाति होती है। सिर्फ  हिंदू कहने से पिंड नहीं छूट सकता। ब्राह्मण है ? ...कौन ब्राह्मण। गौत्र क्या है! मूल कौन है ?.. शहर में कोई किसी से जात नहीं पूछता। शहर के लोगों की जाति का क्या ठिकाना। लेकिन गांव में तो बिना जाति के आपका पानी नहीं चल सकता। 3 रेणु की दलित दृष्टि को लेकर आज ढेरों प्रश्न उठाए जाते है, कई बड़े नामी लेखक उनके सांमती स्वभाव को लेकर टीका टिप्पणी भी करते है, लेकिन खुलकर नहीं, दबी जबान में। यह सही है कि जिस तरह वर्गीय संघर्ष को मार्क्सवादी उपन्यासकारों ने अपने उपन्यास में उठाया है उस तरह रेणु अपने उपन्यास या कहानियों में इसे लादते नहीं है और यह बात जरूरी नहीं कि अगर फलां लेखक या कोई दल एक तरह से चीजों को देख-लिख रहा है तो सारी दुनियॉं भी उसे उसी नजर या एंगल से देखे। हर लेखक का अपना स्टाइल और स्टेटमेंट होता है रेणु का भी था। दलित प्रश्न को वे अलग तरीके से अपने कथा साहित्य में उकेर रहे थे, रेणु के दौर में दलित साहित्य इस रूप में नहीं था जिस रूप में आज नजर आता है । रेणु के कथा साहित्य को देखें तो उन्होंने जहां तक संभव हुआ है दलितों की स्थिति को दिखाया है। उनके साहित्य में दलित शोषण की सभी परतें देखीं जा सकती हैं। मैला आंचल जो उनका सर्वश्रेष्ठ उपन्यास कहलाता है, में ही देखें तो सवर्ण जमींदार दलितों पर किस तरह अत्याचार करते थे इसे स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है ''तहसीलदारी रोब का क्या पूछना! तहसीलदार के खेत में मजदूरी करने वालो को कभी मजदूरी नहीं मिलती थी.... बूड़े तहसीलदार साहब अपने सलीमशाही जूतों के तल्ले में ही कांटियां पुरैनियॉं से ठुकवाकर मंगाते थे और तीन महीने में ही कांटियां झड़ जाती थी। सुनते है, वे बोलते बहुत कम थे कान से कुछ कम सुनते थे, और जब बोलते थे तो ''मारो साले को दस जूता। '' कमला नदी के बगल में जो गड्ढा है, उसी में जोंक पालकर रखा था। जिसने तहरीर, तलबाना या नजराना देने में देर की उसे गड्ढे में चार घंटे तक खड़ा करवा दिया। पांव के अंगूठे से लेकर जांघ तक मोटे-मोटे जौंक घुंघरू की तरह लटक जाते थे ।'' 4 यह पढ़ने के बाद कोई गुंजाइश नहीं बचती और अगर कोई कसर रहती है तो वे इसे 'परती परिकथा ' तक आगे ले जाते है। एक प्रसंग में वे बताते है कि किस तरह बेरहमी से खवास जाति के लुत्तों के पिता नरनारायण खवास को जमींदार शिवेन्द्र मिश्र द्वारा दगनी से दगवाकर मरवा दिया जाता है। यहां यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि दगनी का इस्तेमाल जानवरों पर विभिन्न प्रकार के निसान बनाने के लिए किया जाता है उसी दगनी का इस्तेमाल इंसानो पर किया जा रहा था अर्थात दलित और जानवरों में कोई खास फर्क नहीं समझा जाता था। दलितो का दमन जितना दैहिक था उतना मानसिक भी था सवर्ण हर तरह से दलितों को दमित करके रखते थे ' परती परिकथा ' के सवर्ण मुंशी जलधरीलाल द्वारा लुत्तो को उसके पेशे को लेकर मजाक उड़ाना इसी प्रकार का मानसिक दलन है जो बहुत ही आम हुआ करता था या है भी ''खवास 4 का माने हुआ जो जूठा बर्तन माँजता हो, उगलदान उठाता हो, चिलम सुलगाता हो .... तेलमालिश से लेकर कपड़ा - धुलाई और भंग-पिसाई'' समाजिक यथार्थ को उजागर करता है कि दलितों की सवर्णों या समाज में क्या स्थिति है आज भी सवर्ण कहीं खुलकर और कहीं दबे छुपे रूप में दलितों का उपहास उड़ाते है और साथ ही साथ रेणु ने दलितों में इस व्यवहार से उपजी कुंठा को भी बड़ी सजगता से दिखाया है- ''लुत्तों को मरमचोट लगी है मर्मस्थल में चोट लगती है उसके, जब कोई उसे खवास कह बैठता हैं अपने पुरखे-पीढ़ी के पुराने लोगों पर गुस्सा होता है। दुनिया में इतने नाम रहते जाति का नाम खवास रखने की क्या जरूरत थी।'' इसी वजह से लुत्तों को खवासी जमीन नहीं चाहिए, वह कह उठता है-''खवासी जमीन? नहीं चाहिए लुत्तों को ऐसी जमीन जिससे जाति की इज्जत मिट्टी में मिल जाए।' 'मैला आंचल' उपन्यास में अनपढ़ दलित कालीचरण के माघ्यम से दलितों की यथास्थिति को दिखाया है कि बदलते राजनीतिक समीकरणों ने एक ओर दलितों में चेतना तो जागृत की है परन्तु शोषक चालाक उच्च वर्ग उनका शोषण करने में या इन दलितों के माघ्यम से अपना उल्लू सीधा करने में पीछे नहीं हटते। जमींदार विश्वनाथप्रसाद संथालों को बेजमीन करने तथा उन्हें गांव से बाहर निकालने में कालीचरण,बालदेव समेत गांव वालों को भी भड़का देता है-''यदि गांव के बाहर का कोई बाहरी हम पर हमला करे तो इसका मुकाबला सभी को करना होगा। हॉं, यदि बाहरवाले इस गॉंव के जमीनवालों पर हमला करें तो सबों को सहायता करनी होगी। गॉंव की जमीन गॉंव में रहेगी। बाहरवाले क्यों लेंगे समझें?'' हॉें, तहसीलदार साहेब ठीक कहते हैं।'' कालीचरण भी कहता है। बालदेव जी भी कहते हैं।'' इतना ही नहीं तहसीलदार विश्वनाथ कालीचरण को आगे चलकर चोरी के इल्जाम में भी फंसा देता है जिसके चलते वह गॉंव से भागा-भागा फिरता है। इस प्रकार रेणु ने बड़े यथार्थपूर्ण ढंग से दलितों में उठी चेतना को तथा उनकी अपरिपक्वता को शोषक वर्ग की चालाकी के तहत मात खाते बखूबी प्रस्तुत किया है। मैं यहॉं एक बात और कहना चाहती हूं कि जिस तरह नागार्जुन अपने उपन्यासों में वर्गीय संघर्ष को एक मोड़ / परिणिती देते दिखाते हैं वहीं रेणु किसी भी संघर्ष के निष्कर्ष पर नहीं पहुंचते। उपन्यास के प्रारंभ में तो दलितों में बड़ा जोश उमड़ता दिखाते है पर जल्द ही परिस्थितियों के समक्ष झुकते या हारते या समझौता करते दिखाते है। दलितों के अन्दर अपने शोषण के खिलाफ  पुरजोर तरीके से विरोध करते वे नहीं दिखा पाते। इसका कारण ये लगता है कि वो अपने पात्रों को आम आदमी के रूप में दिखाना चाहते थे न कि खास। वह अपने साहित्य में ऐसी कोई भी स्थिति नहीं दर्शाना चाहते थे जिसके बारे में कोई शक सुबहा हो। इसी कारण उनके पात्र ज्यादा रियल लगते है आर्दशीकृत नहीं लगते। यही वजह है कि परती परिकथा उपन्यास के दलित पात्र लुत्तों का संघर्ष सामाजिक न होकर व्यक्तिगत ज्यादा नजर आता है। लुत्तो का संघर्ष चाहे व्यक्तिगत लगे लेकिन इतना तो रेणु साफ  तौर पर बता जाते हैं कि दलितों का दलन सामाजिक तौर पर हो रहा था। लुत्तो का संघर्ष जितना व्यक्तिगत है उतना ही सामाजिक भी है या यूं कहें कि सामाजिक ज्यादा है। क्योंकि अगर लुत्तो प्रतिकार कर रहा है तो उसे व्यक्तिगत क्यों समझा जाए, आखिर उस प्रतिकार की पूरी की पूरी सामाजिक पृष्ठभूमि है, क्योंकि लुत्तो की लड़ाई जमींदार जित्तन से नहीं बल्कि उस व्यवस्था से है जो सैंकड़ों सालों से है। जिस व्यवस्था ने लुत्तो के बाप को दगनी से दगवाकर मरवा दिया। जो व्यवस्था गरीब दलितों का खून जिंदा जोंकों से चुसवा देती,जो व्यवस्था दलितों के लिए खास कीलों वाली जुतियां गठवाती है, क्या इस दलन को आप व्यक्तिगत स्तर पर देख सकते हैं और इसका प्रतिकार भी आप व्यक्तिगत मानेंगे। अगर मानते हो तो ये आपकी समझ हैं। दरअसल आप दलित वैचारिकी को ठीक प्रकार से नहीं समझते हैं। रेणु की दलित स्त्री पात्रों की बात करें तो उनके यहां दलित स्त्रीयॉं दोहरे शोषण का सामना कर रही हैं एक ओर तो वे अपने घरवालों द्वारा शोषित होती हैं वहीं दूसरी तरफ  समाज भी अपने तई कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। 'परती परिकथा ' उपन्यास की मोची कन्या मलारी बचपन से ही अपने पिता की ऑंखों में खटकती थी जिसके चलते उसे शिक्षा ग्रहण करने में काफी कठिनाई आई और रही सही कसर समाज के उच्च वर्ग, सहपाठियों और सवर्ण शिक्षकों ने पूरी कर दी-' दि हरिजन ग्लोरी ' मलारी ने गॉव के स्कूल से मिडिल पास किया है। हाई - इंगलिश स्कूल में नाम लिखवाकर तीन महीना क्लास में भी गई। इसके बाद, कुछ शिक्षकों और सहपाठियों की कृपा से उसकी पढ़ाई रुक गई।' 5 स्पष्ट है कि उस समय के सो काल्ड सवर्णो की वजह से हरिजन कन्या मेघावी होने के बाद भी उच्चशिक्षा से वंचित कर दी जाती है। शिक्षा के क्षेत्र के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी स्त्री शोषण की कई परतें रेणु ने खोली हैं। 'गोदान' में जिस तरह होरी की जवान होती बेटियों पर सभी की ललचायी नजरें रहती हैं वहीं 'मैला आंचल' में दलित महंगूदास की बेटी फुलिया महाजन सहदेव मिसिर की हवस का शिकार बनती है सहदेव मिसिर के पास महंगूदास के अंगूठे की टीप है - सादा कागज पर। महंगू की टीप सहदेव के हाथ में है। सहदेव जो चाहे कर सकता है। दोनों गायें और चारों बाछे कल ही खूंटे से खोल कर ले जाएगा। इसके अलावा साल - भर का खरचा भी तो सहदेव ने ही चला दिया है। एक आदमी की मजदूरी से तो एक आदमी का भी पेट नहीं भरता है। ...लेकिन अब फुलिया के हाथ में ही सहदेव मिसिर की इज्जत और अपने बाप की दुनिया है। 6 बेटी के अनैतिक संबंध के बारे में पता होना माता - पिता के लिए एक त्रासदी से कम नहीं। महंगूदास किस कदर कर्ज के जाल में फंसा हुआ होगा इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह सब कुछ जानते हुए भी मौन है। वहीं फुलिया भी अपने घर को बचाने 'बाबा सहदेव मिसिर का करजा धरते हैं।' 7 कि सच्चाई जानते हुए अपनी बलि देती रहती है। इस संदर्भ में डॉ सूरज पालीवाल कहते हैं - फुलिया का मैला आंचल में कोई स्थान है तो वह है यौन शोषण के प्रतीक के रूप में कि किस प्रकार के लोग एक स्त्री का शोषण करते हैं। 8 इसी प्रकार जमींदार किरपाल सिंघ भी दलित रमजूदास की स्त्री को अपनी रखैल बनाकर रखता है। गॉंव की स्त्री उसकी पोल खोलते हुए कहती है--''रे सिंघवा की रखैली। सिंघवा के बगान का बंबै आम का स्वाद भूल गई। तरबन्ना में रात - भर लुकाचोरी में ही खेलती थी रे ? कुअरवॉं बच्चा जब हुआ था तो कुअरवॉं सिंघवा से मुॅंह - दिखौनी में बाछी मिली थी, सो कौन नहीं जानता ?''। 'परती परिकथा ' का प्रगतिशील जमींदार जितेन्द्र भी नट्रिटन जाति की ताजमनी से प्रेम संबंध तो रखता है उसे आजीवन अपनी रखैल बनाकर रखता है पर विवाह नहीं करता। इसी प्रकार मंदिर का पुजारी जहॉं मंदिरो में दलितों के प्रवेश को वर्जित मानता है वहीं मोची कन्या मलारी को मंदिर में प्रवेश की आज्ञा दे देता है और साथ ही उससे शारीरिक छेड़छाड़ भी करता है। इतना तो तय है कि छूत-अछूत या वर्गीय भेद का संबंध पुरूषों तक सीमित रहता है। स्त्रियॉं सभी के लिए सछूता हैं। अछूतों की बहु-बेटियों से संबंध रखने पर सवर्ण जाति या उच्च वर्ग के पुरूषों को किसी प्रकार का संकोच नहीं था। वे इस स्तर पर वर्गीय भेद को नगण्य कर देते हैं। जिन प्रेमचंद के साहित्य को भारत का आइना कहा गया उन्हीं की रचना 'गोदान' के पण्डित दातादीन का बेटा सिलिया जाति चमार को तो रखता ही है झुनिया जाति कुर्मी पर भी लार टपकाता है। पण्डित नोखेराम, भोलाराम अहीर की घरवाली को अपने घर में डाल लेता है। 'मैला आंचल ' में होली के अवसर पर गाये गए गीत में स्वर्णो के इस दोमुंहेपन पर तंज किया गया है--
''अरे हो बुढ़बक बभना, अरे हो बुढ़बक बभना
चुम्मा लेने में जात नहीं रे जाए
सुपति-मउनिया लाए डोमनिया, मांगे पियास से पनियाँ।
कुआँ के पानी न पाए बेचारी, दौड़ल कमला के किनरियॉ
सोही डोमनियॉं जब बनली नटिनियॉ, ऑंखी के मारे विपनियॉं
तेकरे खातिर दौड़ले बौड़हवा, छोड़के घर में बभनिया।।
भकुआ बभना, चुम्मा लेने में जात नहीं रे जाए।9
अत: यह ग्रामीण भारत की विडम्बना ही कही जाएगी जहां उच्च वर्ग में सवर्णों को निम्न जाति में कोई चीज अच्छी लगती है तो वह है, उनकी औरतें। ' परती परिकथा ' में एक जगह तो रेणु बहुत ही सीधे-सीधे कह देते है कि ''गांव में दलित वर्ग को हर तरह से मर्दित करके रखा गया था, अब तक! नाटक - मण्डली के लिए प्रत्येक वर्ष खलिहान पर ही चन्दे का धन काट लेते थे बाबू लोग। लेकिन कभी भी द्वारपाल , सैनिक अथवा दूत का पार्ट,माने हीरो का पार्ट ,नहीं दिया सवर्ण टोली के लोगों ने।'' 10 इसी के आगे रेणु यह भी लिखते है कि गांव में सरकार की तरफ  से आई सरकारी योजनाओं जैसे सरकारी रेडियो और पुस्तकालय आदि पर भी सवर्ण जातियों का ही कब्जा था,  ''पचीस साल से चन्दा लिया जा रहा है, मगर कभी हीरो का पार्ट नहीं मिला। छित्तन बाबू पुस्तकालय को हथिया लिया। बिकु बाबू सरकारी रेडियो बजाते हैं, अपनी कोठरी में।'' 11 इस तरह से बिलकुल आसानी से इस बात को समझा जा सकता है कि जब रेडियो या पुस्तकालय जैसी योजनाओं पर सवर्ण जातियां अपना अधिकार समझती थी तो बड़ी योजनाओं में दलितों को क्या लेने दिया जाता होगा।
उपन्यासों के साथ - साथ रेणु की कहानियां भी दलित प्रश्न से दो - चार होती है। 'रसप्रिया' कहानी में दलित 'मिरदंगिया पंचकौड़ी' द्वारा किसी ब्राह्मण लड़के को बेटा कहकर संबोधित करना और लड़कों का क्रोधित होकर यह कहना कि - बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा ? मारो साले बुड्डे को घेरकर। ...मृदंग फोड़ दो। 12 अर्थात मान - सम्मान मात्र स्वर्णो के हिस्से की चीज है गैर सवर्ण कभी भी मान - सम्मान के पात्र नहीं थे । निम्न जाति का होने के कारण दलित मिरदंगिया पर्वतीया से अन्तर्जातीय विवाह भी नहीं कर पाता जो गाँव में जातिवाद की गहरी जड़ों की शिनाख्त कराने के लिए पर्याप्त है। इसी प्रकार 'ठेस' कहानी का सिरचन भी जातिवाद का शिकार है। 'पटुआ कला' में (हस्त होते हुए भी सिर्फ  निम्न जाति का होने के कारण उसकी कला वह स्थान नहीं पाती जिसका वह अधिकारी है और हवेली के लोगों से कई बार उसे अपमानित एवं कटु बातें भी सुननी पड़ती हैं - छोटी जाति के आदमी का मुंह भी छोटा होता है। मुँह लगाने से सिर पर चढ़ेगा ही। ...सिरचन तुम काम करने आए हो, अपना काम करो। 13 ऐसा प्रतीत होता है कि यदि 'सिरचन' उच्च जाति का होता तो उसकी कला के साथ - साथ उसे भी सम्मान की नजर से देखा जाता। इस तरह मुझे लगता है कि रेणु मात्र आंचलिक उपन्यासकार ही नहीं है उनके साहित्य में दलित अस्मिता से जुड़े अनेकों प्रश्न आपको कुरेदते जरूर हैं। ऐसा जरूर लग सकता है कि ये प्रश्न गंभीर तरीके से नहीं पूछे गए हैं लेकिन इससे इन प्रश्नों की गंभीरता कम नहीं हो जाती है। कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं जिनका जवाब समय को देना हैं।
: संदर्भ ग्रंथ :
रेणु-मैला आंचल, भूमिका से
सं0 भारत यायावर  - रेणु रत्नावली, भाग-2,मैला आंचल, पृ 29
सं0 भारत यायावर - रेणु रत्नावली, भाग-2, मैला आंचल, पृ 60
संपा0 : भरत यायावर, रेणु रचनावली-भाग- , मैला आंचल, पृ0स. 142-143
उपन्यास  रेणु-परती परिकथा, पृ. 66-67 6 सं0 भारत यायावर - रेणु रचनावली-2, मैला आंचल, पृ 118
वही, पृ 120
डॉ सूरज पालीवाल - मैला आंचल: एक विमर्श, पृ 93
सं0 भारत यायावर - रेणु रचनावली-2, मैला आंचल, पृ 134-135
सं0 भारत यायावर - रेणु रचनावली-2, परती परिकथा, पृ 509
सं0 भारत यायावर - रेणु रचनावली-2, परती परिकथा, पृ 509
सं भारत यायावर - रेणु रचनावली- रसप्रिया, पृ 126
सं0 भारत यायावर, रेणु रचनावली भाग1, ठेस, पृ 178

पता
5/ 345, त्रिलोकपुरी दिल्ली - 110091

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