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शनिवार, 29 नवंबर 2014

खुदमुख्‍तार, दलित स्त्रियॉं

राजेश कुमार चौहान 

कौसल्या बैसंती की आत्मकथा ' दोहरा अभिशाप ' की जितनी चर्चा हुई उससे कहीं अधिक इसके शीर्षक को दोहराया गया। इसका शीर्षक दलित स्त्रियों की जीवन स्थितियों की अभिव्यक्त करने वाला सर्वाधिक प्रभावी प्रतीक बन गया था कि दलित स्त्रियों का दोहरा शोषण होता है। एक तरफ तो सवर्ण समाज उनका उत्पीड़न करता है, दूसरी तरफ घर के भीतर अपने ही पुरुष उन्हें प्रताड़ित करते हैं। दलित महिला लेखन अथवा दलित महिलाओं की सामाजिक स्थिति के संदर्भ में जितनी भी आलोचना और अध्ययन सामने आए हैं, सभी में ' दोहरा अभिशाप ' शीर्षक को मुहावरे की तरह इस्तेमाल करके सारे लेखन को निपटाने की कोशिश रहती है और दलित पुरुष को मुख्य खलनायक की तरह पेश किया जाता है। शायद इससे सवर्ण समाज का अपराधबोध कुछ कम हो जाता हो। पर सवर्ण समाज को अपराधबोध कब हुआ है ? तो ऐसा करने से शायद जातिवाद का कलंक कुछ कम हो जाता हो। पितृसत्ता की कालिमा को थोड़ा और गहरा करके जातिवाद के कलंक को हल्का करने का यह खेल दिलचस्प है, इससे भी ज्यादा दिलचस्प यह है कि पितृसत्ता की यह कालिमा भी दलित पुरुष के चेहरे पर पुत जाती है,  इससे सवर्ण पुरुष का चेहरा थोड़ा खिला - खिला और उजला नजर आने लगता है। दलित विमर्श के पैरोकार स्त्री जाति के गुनहगार ( खलनायक) बन जाते हैं, कहते हैं जब तक दलित महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं मिल जाता तब तक आपको दलित विमर्श करने का अधिकार नहीं है। यह माँग होनी ही चाहिए लेकिन क्या सवर्णों और पैरोकारों की कोई नैतिकता नहीं होती।
वास्तविकता यह है कि सवर्ण लेखकों - आलोचकों ने दलित विमर्श को खारिज करने के लिए दलित महिला लेखन को हथियार की तरह इस्तेमाल किया और दूसरी तरफ दोहरा अभिशाप के मुहावरे में संपूर्ण दलित महिला लेखक को इस तरह निपटाया कि दोहरा अभिशाप प्रतीक से मुहावरा बना और मुहावरे से रुढ़ि बनकर रह गया है। अंतत: दलित महिला लेखन को भी पूरी तरह खारिज कर दिया जाना है। इसकी एक बानगी दलित महिला लेखन के चर्चित पैरोका बजरंग बिहारी तिवारी की समीक्षा में देखी जा सकती है। दलित आत्मकथाओं के संदर्भ में तिवारी लिखते हैं- एक विभ्रम की सृष्टि की आशंका भी इस विद्या में मौजूद है। चार - पाँच दशक पहले की वास्तविकता को कुछ इस तरह पेश किया जा सकता है कि वह आज का सच लगने लगता है। इस अवधि में आए परिवर्तन, यथार्थ की संश्लिष्टता विमर्शवादी आक्रामक भाषा में तिरोहित हो जाते हैं। (1)
बजरंग बिहारी तिवारी का तर्क तो स्पष्ट है लेकिन नीयत साफ नहीं है। दलित आत्मकथाओं के संदर्भ में ही उन्हें याद आता है कि आत्मकथा विभ्रम की सृष्टि करती है। सवर्ण लेखक लेखिकाओं की आत्मकथाओं के संदर्भ में उन्हें याद नहीं रहता कि इन आत्मकथाओं में विभ्रम की सृष्टि हो सकती है। तिवारी जी कुछ सवर्ण लेखिकाओं की फर्जी आत्मकथाओं पर मौन हैं। जिन आत्मकथाओं में तथ्य और सत्य को निष्कासित करके सनसनी फैलाने के लिए धमाके किए जाते हैं, उन धमाकों को आत्महंता बेबकी कहकर वीर - भाव पैदा किया जाता है। दलित आत्मकथाओं के मूल्यांकन में सवर्ण आलोचकों का यह दोहरापन हिन्दी साहित्य के लिए दोहरा अभिशाप है कि एक तरफ तो सनसनीखेज और फर्जी लेखन को समाज का दर्पण घोषित कर दिया जाता है दूसरी तरफ दलित लेखन में दर्ज विसंगति और विद्रूपताओं को विभ्रम घोषित करके साहित्य से बहिष्कृत करने की साजिश रची जाती है।
कौसल्या बैसंती के दोहरा अभिशाप की प्रशंसा करने के मामले में सवर्ण समीक्षक - आलोचक और प्रवचनकर्ताओं के बीच होड़ लगी रही जबकि दूसरी तरफ एक दलित आलोचक ने व्यक्तिगत कारणों से दोहरा अभिशाप को खारिज करते हुए इसकी लेखिका के विरुद्ध अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए उसे डायनासोर औरत कह दिया। यह घटनाक्रम सवर्ण साहित्यकारों के लिए बड़ा उर्वरक साबित हुआ। एक दलित आलोचक (डॉ. धर्मवीर) को केन्द्र में लाकर वे यह विभ्रम रचने में सफल रहे कि दलित विमर्श के पैरोकार ही स्त्री जाति के असली गुनहगार हैं। सवर्ण पुरुष तो दलित महिला के सच्चे अधिवक्ता हैं।
यद्यपि दलित महिला लेखन का अध्ययन करने के बाद कहीं यह नहीं लगता कि उन्हें किसी अधिवक्ता की जरुरत है। दोहरा अभिशाप इस बात का प्रमाण है कि कौसल्या बैसंती को किसी अधिवक्ता की जरुरत नहीं, वे अपनी अधिवक्ता खुद हैं। इस आत्मकथा में वे दलित समाज की तीन पीढ़ियों की अधिवक्ता हैं। पहली पीढ़ी में लेखिका की आजी (नानी), दूसरी पीढ़ी में माँ और तीसरी पीढ़ी में स्वयं लेखिका के संघर्ष हैं। तीनों पीढ़ियों कीये तीनों स्त्रियों की स्त्रियाँ खुदमुख्तार हैं।
दलित समाज की तीन पीढ़ियों के संघर्ष और प्रतिरोध को लेखिका ने मात्र एक सौ चौबीस पेज की आत्मकथा में बड़ी कुशलता और प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया है। जबकि कुछ लेखक - लेखिका तीन - चार सौ पृ. से लेकर हजार - हजार सौ पृष्ठों और कई खण्डों में आत्मकथा लिखकर भी न तो स्वयं को पुरी तरह अभिव्यक्त कर पाते हैं और न अपने परिवेश को। दोहरा अभिशाप की एक और बड़ी सफलता यह है कि इसकी सहजता और पठनीयता कहीं बाधित नहीं होती। कुछ अर्थों में कहीं सहजता प्रभावित भी है तो वह है - भूमिका। अच्छी बात यह रही कि भूमिका मात्र दो पृष्ठों तक सीमित है। इसमें भी दो महत्वपूर्ण बातें हैं - एक तो भाषा संबंधी स्पष्टीकरण कि मराठी भाषी होते हुए भी लेखिका ने आत्मकथा लेखन के लिए हिन्दी भाषा क्यों चुनी ? क्योंकि हिन्दी में दलित महिलाओं के आत्मकथा साहित्य का अभाव है, जिसकी शुरुआत में मैं भी हिस्सा होना चाहती हूंं। भूमिका में दूसरी महत्वपूर्ण बात है - लेखिका का पूर्वानुमान, वह अपने पुत्र, भाई और पति की प्रतिक्रियाओं का पूर्वानुमान लगाते हुए लिखती है - पुत्र, भाई, पति सब मुझ पर नाराज हो सकते हैं, परंतु मुझे भी तो स्वतंत्रता चाहिए कि मैं अपनी बात समाज के सामने रख सकूँ। मेरे जैसे अनुभव और भी महिलाओं के होंगे परंतु समाज और परिवार के भय से अपने अनुभव समाज के सामने उजागर करने से डरती और जीवन भर घुटन में जीती है। 3
स्वयं लेखिका को भी भय और घुटन से पूरी तरह मुक्त होने में चालीस वर्ष का समय लग गया। लेखिका के शब्दों में ही दर्ज भी है -अपने भोगे हुए यथार्थ को शब्दों में उतारने के द्वंद्व की पीड़ा में जीवन के अड़सठ वर्ष बीत गये। 4 इन अड़सठ वर्षों में चालीस वर्ष वैवाहिक जीवन के हैं। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्र यह भी है कि क्या अड़सठ वर्ष तक गुलामी के जीवन में संघर्ष करने के बाद लेखिका सचमुच पूरी तरह मुक्त हो गई है ? जीवन भर घुटन से भौतिक रुप से तो निश्चित रुप से मुक्त हो गई है लेकिन भावनात्मक धरातल पर सारे बंधन बचे हुए हैं, इनमें गांठ - गठीले बंधन भी शामिल है। यदि ऐसा न होता तो उसे आत्मकथा लिखते हुए पुत्र, भाई और पति की प्रतिक्रियाओं की कोई परवाह न होती। इसमें भी हैरानी की बात यह है कि जिस पति से पूरी तरह छुटकारा पा लिया है, उसकी प्रतिक्रिया और नाराजगी का जिक्र भी भूमिका में किया है। यह कहना और लिखन बहुत सरल है कि जिस पति से सारे संबंध तोड़ लिए, उसकी प्रतिक्रियाओं की परवाह क्यों की जाए, उसके विषय में सोचा भी क्यों जाए? लेकिन लेखिका के लिए यह कह पाना उतना ही कठिन है। जिस पति से प्रेम सम्मान और अधिकार पाने के लिए वह चालीस वर्ष तक संघर्षरत रही उसे इस तरह छोड़ देने को वह अपनी जीत कैसे मान सकती है ? पति को यूँ छोड़ देना निश्चित रूप से पति के गाल पर सार्वजनिक तमाचा है, इसे पति की हार के रुप में देखा जा सकता है लेकिन उसकी हार भी लेखिका को जीत का एहसास नहीं दे सकती। दूसरी तरफ पति भी इस हार को नहीं स्वीकारेगा, वह इस सार्वजनिक तमाचे को भी दूसरे ढंग से पेश करेगा। वह पुरुषत्व के अहं में यह कभी नहीं स्वीकारेगा कि उसकी पत्नी ने उसे छोड़ दिया, वह तो यही कहेगा कि उसने पत्नी को छोड़ा है। इस आधार पर वह पत्नी का चरित्र हनन भी करेगा।    इस चरित्र हनन में मित्रों का समर्थन भी जुटाएगा। दोहरा अभिशाप पर लिखी डॉ. धर्मवीर की समीक्षा को भी इसी चरित्रहनन के रुप में पढ़ा जा सकता है। ऐसा कुछ भी होने की आशंका शायद लेखिका के मन में रही होगी, जो एक चिंता के रुप में आत्मकथा की भूमिका में प्रकट हो गई कि पुत्र, भाई, पति सब मुझ पर नाराज हो सकते हैं।
पुत्र और भाई की प्रतिक्रिया की परवाह का कारण तो स्पष्ट है कि उसे उनसे संरक्षण ही नहीं चाहिए अपितु अपने द्वारा लिए फैसले पर नैतिक समर्थन चाहिए, लेकिन पति की प्रतिक्रियाओं की परवाह क्यों है इसके कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। हम केवल अनुमान लगा सकते हैं अथवा चालीस वर्षों के संबंधों की राख में किसी भावनात्मक मोती के मिल जाने की आशा है।
आशंकाएँ हो अथवा आशा दोनों ही व्यक्ति को कई बार यथास्थितिवादी और कायर बना देती है, ये उसे साहसिक निर्णय लेने से रोकती है। आत्मकथा की भूमिका में लेखिका आशंकाग्रस्त जरुर है लेकिन इसकी अंतर्वस्तु इस बात का प्रमाण है कि वह अपनी तमान आशंकाओं और आशाओं को जीत चुकी है। अन्यथा वह अपने जैसी दूसरी स्त्रियों की तरह जीवन भर घुटन में जीती रहती। चालीस साल बाद भी पति से अलग होने और उस पर मुकदमा दायर करने का निर्णय न ले पाती।
संघर्ष और प्रतिरोध का यह गुण लेखिका को अपनी नानी और माँ से विरासत में मिला है। कई मामलों में उसकी नानी उससे अधिक जुझारु,  दृढ़निश्चय वाली, स्वाभिमानी और साहसी महिला थी। लेखिका की नानी - माँ और स्वयं अपने जीवन संघर्षों में अंतर इतना है कि उसकी नानी और माँ अशिक्षित और कामकाजी महिलाओं के संघर्ष हैं, जबकि स्वयं उसका अपने संघर्ष शिक्षित मध्यमवर्गीय एवं दलित महिला का संघर्ष है। उसकी नानी और माँ का दलितपन उसके अपने दलितपन से अधिक भयंकर था। इन तीनों के जीवन संघर्ष तीन अलग - अलग पीढ़ियों के संघर्ष हैं। अत: इतने अंतर होगा स्वाभाविक है। तीनों पीढ़ियों के संघर्षों में सबसे बड़ी समानता यह है कि तीनों का सामना जातिवादी व्यवस्था और पितृसत्ता से है।
तीन पीढ़ियों की प्रतिनिधि इन तीनों महिलाओं के संघर्षों में अभिव्यक्ति के स्तर पर सबसे बड़ा अंतर है। इस आत्मकथा में लेखिका के संघर्ष, उसके अपने अनुभवों की प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुए हैं, जबकि उसकी माँ के संघर्ष उसके द्वारा एक प्रत्यक्षदर्शी की तरह दर्ज हुए हैं और नानी के संघर्षों की तो वह प्रत्यक्षदर्शी भी नहीं रही। उसने पहले माँ से नानी के संघर्षों के विषय में सुना फिर अपने पाठकों को सुनाया। लेखिका ने पहल ही स्पष्ट कर दिया है - माँ अक्सर अपनी माँ को याद करके रोती थीं। हम सबने माँ से बहुत आग्रह किया कि वह अपनी माँ के बारे में बताएं। सिर्फ बड़ी बहन ने ही आजी को देखा था। मैं दस महीने की थी तभी आजी का देहांत हो गया था। माँ बताने लगी कि ....। 5
माँ ने नानी के विषय में जो कुछ बताया, लेखिका ने उससे तादातम्य स्थापित किया और अपने जीवन संघर्षों की कड़ी में जोड़ लिया। उसने महसूस किया कि वह अपनी नानी के जीवन - संघर्षों के इतिहास को स्वयं नई स्थितियों में भी जी रही है। अर्थात इन तीनों पीढ़ियों में जातिव्यवस्था और पितृसत्ता का दमनचक्र निरंतर जारी है। इस दमनचक्र का इतिहास इसके वर्तमान से अधिक भयानक है। अर्थात लेखिका की नानी की जीवन स्थितियाँ अधिक विषम और भयानक थीं।
लेखिका की नानी छह भाइयों की इकलौती बहन ने बहुत छोटी उम्र में ही माता - पिता को खो दिया। उस समय अस्पृश्य समाज के किसी भी लड़के या लड़की के पास स्कूल जाने तक का कोई अवसर नहीं था। आठ वर्ष की उम्र में ही वह विधवा भी हो गई जबकि उसे विवाह और विधवा होने का अर्थ तक पता नहीं था पति का शव आँखों के सामने पड़ा है लेकिन वह अबोध बालिका क्या समझती कि यह क्षण उसके अंधेरे जीवन की कालिमा को और गहरा करने वाला क्षण है। दो बच्चों के पिता की तेरह वर्ष की उम्र में दूसरी पत्नी बनीं। जबकि उसकी पहली पत्नी भी जीवित थी। अर्थात तेरह वर्ष की अबोध अवस्था से ही सौतन का संताप भी झेला। दुहाजू पति द्वारा किया जा रहा उत्पीड़न असहनीय था। इस सबके बीच छोटी उम्र में ही वह तीन बच्चो की माँ भी बनी। पति कि उत्पीड़न असहनीय तो पहले ही थे, अब उसने उसके ममत्व पर भी हमला शुरु कर दिया। उसके बेटे का हाथ चलती चक्की में डालने लगा। इस घटना के बाद अगले ही दिन प्रभात - बेला में अपने बच्चों को साथ लेते हुए घर छोड़ दिया। रास्ते में भूख और बीमारी से एक बेटी की मौत हो गई। अपने हाथों से गड्ढा खोदककर बेटी को दफनाया और अपन पीड़ा को अपने हृदय में दबाकर अपने जीवित  बच्चों की खातिर जिंदगी से दो - दो हाथ करती रही। वह न तो अपने ससुराल वापस लौटी न मायके गई और न किसी परिवार रिश्तेदार से आर्थिक अनुदान माँगा। अपने भतीजे से कर्ज लेकर अपने लिए झोपड़ी बनाई और ईंट - सीमेंंट ढोने की मजदूरी करके कर्ज चुकाया। बच्चों का पालन पोषण किया। बेटे का विवाह सोलह वर्ष की उम्र में कराया। टायफाइड से बेटे की मौत हो गईद्ध उसकी पत्नी का पुर्नविवाह कराया। अब उसकी जिंदगी में मात्र उसकी एक बेटी बची थी। अब उसे बेटी के विवाह की चिंता सताने लगी।
इसी बीच उसके पति ने आकर उन दोनों पर अपना हक जताना शुरु किया और बेटी के विवाह के प्रश्न के मामले में दखलांदजी शुरु की एक हद तक उसने यह सब स्वीकार भी किया लेकिन अंतत: लेखिका ने इस दखलंदाजी से पीछा छुड़ाकर बेटी का विवाह भी कर दिया। दामाद अच्छे व्यक्तित्व वाला और संवेदनशील था। अत: यह निर्णय सही साबित हुआ। लेखिका ने अपनी नानी के जीवन के अंतिम क्षणों को आत्मकथा में कुछ इस तरह दर्ज किया है - पंढरपुर की अपनी यात्रा पूरी करके आजी नागपुर आने को निकली थी। रास्ते में तबीयत खराब हो गई ... सड़क पर ही लुढ़क गई और उसकी मृत्यु हो गई। बस अड्डे पर खलासी लाइन बस्ती के हमालों ने आजी को पहचाना। आजी के पास मरते समय एक गठरी और पीतल का लोटा था। गठरी खोलने पर उसमें चार - पाँच गज सफेद कपड़ा एकदम नया और एक छोटे कपड़े की थैली में कुछ रुपये बचे थे, साथ में सिंदूर, अबीर गुलाल और विटोबा के मंदिर का प्रसाद था। आजी हरदम कहा करती थीं कि वह अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगी किसी पर बोझ नहीं बनेंगी। अपने कफन का सामान भी स्वयं जुटाएंगी और उन्होंने अपनी बात पूरी करके दिखाई। 6
आजी (नानी) की जिंदगी खुदमुख्तार स्त्री की प्रतीक बन जाती है। ध्यान रहे यह स्त्री किसी स्त्रीवादी आंदोलन अथवा विमर्श की पैदाईश नहीं है। यह दलित समाज की प्रतिनिधि स्त्री है। इसकी बेटी भागेरथी अर्थात लेखिका की माँ की जिंदगी भी इससे बहुत अलग नहीं है। दोनों की जिंदगी में अंतर बस इतना है कि आजी की बेटी के जीवन संघर्षों में उसका पति साथ हैं। उसके सारे संघर्षआर्थिक अभावों और जातिवादी व्यवस्था के विरुद्ध हैं। यह कतई जरुरी नहीं कि प्रत्येक दलित स्त्री का संघर्ष पति (दलित पुरुष )के विरुद्ध भी हो। सभी दलित पुरुष पुरुषवादी ही हों, यह भी जरुरी नहीं। हाँ इतना जरुर है कि दलित परविारों की संरचना भी पितृसत्तात्मक है क्योंकि उन्होंने बहुत कुछ सवर्ण एवं मध्यवर्गीय परिवारों की नकल करने की कोशिश की है। इसी कोशिश में सवर्ण समाज की कुछ बराईयाँ दलित परिवारों में भी आ जाती हैं, जिसकी कीमत दलित स्त्री को पितृसत्ता का अभिशाप भी झेलना पड़ता है। यही है, दलित स्त्री का दोहरा अभिशाप। यही लेखिका का भी दोहरा अभिशाप है।
लेखिका का आरंभिक जीवन - संघर्ष, जातिवादी व्यवस्था और आर्थिक अभावों के विरुद्ध ही है। अर्थात यह उसकी माँ के जीवन - संघर्षों की ही एक कड़ी है। इनकी पृष्ठभूमि के संदर्भ में लेखिका ने कुछ इस तरह दर्ज किया है - आजी और माँ - बाबा जिस बस्ती में रहते थे ... उसमें अधिकांश अछूत थे, अनपढ़ और मजदूर। सड़क के एक ओर गरीब,अशिक्षित और सड़क के दूसरी ओर अमीर पढ़े - लिखे। सिर्फ एक सड़क उन्हें विभाजित करती थी परन्तु जमीन आसमान का फरक था दोनों में। मेरा जन्म 8 - 9 - 1926 को इसी खलासी लाइन बस्ती में हुआ था। माँ को अब नागपुर की एम्प्रेस मिल में नौकरी मिल गई थी। आजी दिहाड़ी पर काम करती थी। कभी वह,कभी मेरी बड़ी बहन जानाबाई मेरी देखभाल करती थीं। उस वक्त मैं सिर्फ आठ वर्ष की थी। बचपन में बहुत बीमार रहती थी। माँ को मिल से छुट्टी लेने पर पगार में से पैसे कट जाते थे। इसलिए माँ बहुत कम छुट्टी लेती थी।
लेखिका के अलावा सभी दलित बच्चों का बचपन भी इसी तरह का होता था - बस्ती में छोटे बच्चों की मृत्यु ज्यादा होती थी। कभी घर में बच्चों का देखभाल करने वाला कोई न हो तो उस बच्चे को अपने साथ काम पर ले जाते थे। और पास ही किसी पेड़ या किसी बड़े घर की छाया में कपड़ा बिछाकरलिटाते। माँ बीच में आकर उसे देखती और अपना दूध पिलाकर चली जाती। पाँच साल के बच्चे के हवाले माँ बाप छोटे बच्चे को पालने में डालकर चले जाते थे। पाँच साल का बच्चा रस्सी खींचता रहता .... बच्चा टट्टी पेशाब में सारा दिन पड़ा रहता था। शाम को माँ आने पर ही उसको साफ करती थी। छ: - सात साल की लड़कियाँ, माँ - बाप के काम पर जाने पर झाड़ू, बर्तन, साफ - सफाई करती थीं। रेंगने वाला बच्चा हो तो उसके पाँव में लंबी रस्सी बांधकर उसका एक सिरा किसी खाट से बाँध देते थे और आस पास कुछ खाना कटोरी में रख देते थे या जमीन पर मुरमुरे डाल देते थे। बच्चा उन्हें बीन - बीन कर खाता रहता था। रो - रो कर जमीन पर ही सो जाता था, टट्टी पेशाब में। ऐसे में उन्हें बीमारी होना स्वाभाविक था और मृत्यु भी। बच्चा ज्यादा देर सोता रहे इसलिए उसे अफीम खिलाकर भी सुलाते थे। 8
इन दलित बस्तियों में बच्चों की जिंदगी जादू - टोना के हवाले थी। यहाँ गरीबी, जहालत और अंधविश्वास पलते थे और जिंदगियां दम तोड़ देती थी। जिंदगियां बद से बद्तर होकर भी इन बस्तियों की घुटन से बाहर खुली हवा में आकर सांस लेने की हिमाकत नहीं करती थीं क्योंंकि इन बस्तियों के बाहर जातिवाद का राक्षस उन पर हमले को हमेशा तैयार खड़ा रहता था। लेखिका की माँ ने डॉ. अंबेडकर के आंदोलनों के विषय में सुना था और देखा भी था। इससे उनमें जागरुकता आ चुकी थी। वे इस बात के लिए कटिबद्ध थीं कि उनके बच्चे पढ़ - लिखकर इन बस्तियों की घुटन से बाहर निकलें। इसके लिए उन्होंने कभी मिल में नौकरी की, सिलाई का काम किया तो चूड़ियां बेचने का काम भी किया। लेखिका के पिता ने बेकरी में नौकरी की। अठारह वर्ष की इस नौकरी में न कोई छुट्टी, न काम का निर्धारित समय और न ही वेतन बढ़ा तो लेखिका की माँ बेकरी पर पहुँची वहां इस शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई और अंतत: पति से यह नौकरी छुड़वाई। बाद में पति ने कबाड़ी का काम किया। इस तरह पति - पत्नी मिलकर गरीबी के खिलाफ भी लड़ते रहे और अपने बच्चों के स्कूल जाने के रास्ते भी खोले।
स्कूल जाने पर इन बच्चों का सामना सबसे पहले जाति व्यवस्था के राक्षस से हुआ। लेखिका में भी जातीय हीनता की ग्रंथि घर कर गई। जो आगे चलकर बहुत बाद में दूर हो सकी। स्कूल में लेखिका को ऐसे कई अनुभव हुए। अत: लेखिका स्कूल में अलग - थलग रहती थी - इस स्कूल में मेरे सिवा और कोई अस्पृश्य लड़की नहीं थी। सिर्फ दो लड़कियाँ कुनबीं जाति की थीं। बाकी सब लड़कियॉ ब्राम्हाण जाति की थीं। कोई मुझसे मेरी जाति न पूछ बैठे, इसका मुझे सदैव डर रहता था। इसलिए मैं अकेली चुपचाप खाने की छुट्टी में या स्कूल शुरु होने से पहले एक ओर बैठी रहती थी। लड़कियों के साथ खेलने में भी डर लगता था। मैं दूर अलग बैठकर उनका खेल देखती थी। कुनबी लड़कियों में भी थोड़ी हीनता थी वे भी ब्राम्हण लड़कियों में घुलती - मिलती नहीं थीं। 9 शिक्षक भी जातीय आधार पर भेदभाव करते थे। अपनी बस्ती के बाहर निकलते ही लेखिका जातिवाद का शिकार होती थी - बस्ती के बाहर उच्चवर्गीय लोगों के लड़के भी हम पर बहुत जलते थे - ये हरिजन बाई जा रही है। दीमाग तो देखो, इसका बाप तो भिखमंगा है, ये साईकिल पर जाती है। कहकर वे साइकिल गिराने की कोशिश करते। अपने को उच्चवर्गीय समझने वाली औरतें भी मुझे साइकिल पर जाता देखकर बड़े कुत्सित ढंग से हंसती थी। उन्हें ताज्जुब होता था कि हम अछूत और मजदूर के बच्चे इतना कैसे पढ़ पाते हैं। 10
जातिवादी व्यवस्था का अभिशाप झेलते हुए लेखिका अंतत: बस्ती की घुटन से बाहर आने में सफल रही। कॉलेज में उसके अनुभव स्कूल से अच्छे रहे। यहाँ प्रोफेसर भी स्कूली अध्यापकों से अधिक प्रगतिशील मिले। इस सद्भावपूर्ण परिवेश में वह जातीय हीनता की ग्रंथि से मुक्त होकर सवर्ण छात्र - छात्राओं से घुलमिल गई। कुछ अच्छे मित्र भी बने। एक ब्राम्हण लड़के ने उसके प्रति अपने प्रेमभाव का प्रदर्शन भी किया। लेकिन ... इसके बावजूद जातिव्यवस्था के कुछ लेकिन - वेकिन और किन्तु - परन्तु बड़े सौम्य रुप में लेखिका के वजूद की चुनौती देते रहे। दरअसल वाद - विवाद प्रतियोगिता के दौरान एक ब्राम्हण लड़का उसके प्रति आकर्षित हुआ। एक दिन वह उसे अपने घर भी ले गया। अपनी माँ और बहन से मिलाया। इसके बाद एक दिन लेखिका ने भी उसे अपने घर चाय पर आमंत्रित किया। उसके बाद ... मैं उसके साथ बस्ती में घुसी। उसे आश्चर्य हो रहा था कि मैं इस बस्ती में रहती हूं। उसे इसकी जरा भी कल्पना नहीं थी। वह एकदम गंभीर हो गया। मैं उसके साथ अपने घर पहुंची। माँ - बाबा से परिचय कराया। वह सिर्फ पाँच मिनट बैठा और जाने लगा। माँ बाबा ने चाय पीने के लिए बहुत आग्रह किया। परंतु उसने बहाना बनाया। वह उठकर चला गया। अब वह कॉलेज में दिखता तो आँखें चुराता था। मुझे टालता था। पहले वह समाज सुधार की बातें किया करता था। अब बस्ती में घुसते ही उसे मेरी जाति का पता लग गया था।
अब लेखिका में आत्मविश्वास आ चुका था। वह अपनी लड़ाई खुद लड़ सकती थी। अत: उसने अच्छी सहेली के राजनीतिक प्रस्ताव को ठुकराने में भी संकोच नहीं किया। दरअसल लेखिका की सहेली कम्युनिष्ट पार्टी की कार्यकर्ता थी और वह उससे आग्रह कर रही थी कि वह भी पार्टी से जुड़े - एक दिन उसने मुझे मजदूरों की स्थिति के बारे में बताना शुरु किया। मैंने कमल से कहा कि मेरे माँ - बाप दोनों मिल मजदूर हैं, दोनों एम्प्रेस मिल में काम करते हैं। गरीबी से मेरा बहुत नजदीकी रिश्ता है। क्या तुमने कभी गरीबी नजदीक से देखी है। कमल को मैं अपने साथ अपनी बस्ती में ले गई। इसके पहले उसे कल्पना भी नहीं थी कि मैं उस बस्ती में रहती हूं। थोड़ी देर पहले बारिस हुई थी। बस्ती में चारों ओर कीचड़ था। हम घर पहुंचे तो मेरा छोटा भाई और बहन जहॉ - जहॉ घर के खपरैल से पानी टपक रहा था, वहां कटोरी, टिन, पतीली वगैरह रख रहे थे। कुछ घरों में पानी घुस गया था। बस्ती में पाखाने के बाहर बच्चों की टट्टी पानी के ऊपर बह रही थी। बहुत बदबू आ रही थी। कमल ने नाक पर रुमाल रखा। मैंने उसे बस्ती में घुमाया। वह एकदम चुप थी ... उसने फिर कभी मुझसे कम्युनिष्ट पार्टी का सदस्य बनने का आग्रह नहीं किया। 12
यह संदर्भ समाज सुधारकों, राजनीतिकों और विमर्शकारों के लिए कड़ा संदेश है कि दलित स्त्री अपनी लड़ाई खुद लड़़ सकती है, घर के बाहर जाति व्यवस्था से भी और घर के अंदर पितृसत्ता से भी। लेखिका ने अपने दोहरे अभिशाप को स्वयं काटा है। पूरी आत्मकथा में ऐसा कोई प्रसंग नहीं आता जिससे यह सिद्ध हो सके कि लेखिका के किसी भी संघर्ष में कोई समाज - सुधारक, राजनीतिक व्यक्ति अथवा विमर्शकार ने साथ दिया हो। लेखिका ने अपनी माँ और नानी से मिली प्रतिरोध की विरासत, शिक्षा, आत्मविश्वास और डॉ. अम्बेडकर की प्रेरणा से अपनी लड़ाई अकेले ही लड़ी। अलबत्ता उसकी सफलता को भुनाने वालों के बीच होड़ लगी है। इस होड़ में सवर्ण आलोचक सबसे आगे हैं। यदि कोई सवर्ण आलोचक लेखिका की प्रशंसा करता है अथवा दलित स्त्री के प्रति अपने सरोकार दर्शाता है तो यह भी गलत नहीं है, सराहनीय ही है लेकिन इसकी आड़ में दलित लेखन का इस्तेमाल दलित विमर्श के विरुद्ध करता है तो यह निंदनीय है।
किसी भी स्त्री का शारीरिक अथवा मानसिक उत्पीड़न करने वाले दलित पुरुष की भी भर्त्सना होनी ही चाहिए। लेखिका ने भी अपने पति की पुरुषवादी प्रवृत्ति के विवरण आत्मकथा में दर्ज किए हैं। जिनके अनुसार पति ने विवाह के आरंभिक दिनों में ही उसे ताना देना शुरु कर दिया कि उसे कोई दूसरा नहीं मिला इसलिए उससे विवाह किया है (दरअसल लेखिका ने ही उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था) लेखिका ने चालीस साल बाद उसे छोड़कर उसके तानों का करारा जवाब दिया है कि इस उम्र में निश्चित रुप से कोई दूसरा नहीं मिलेगा और इसी उम्र में दोनों को एक - दूसरे की ज्यादा जरुरत है, फिर भी वह उसे बर्दाश्त न करके छोड़ने का फैसला लेती है। यदि शुरुआत में ही छोड़ दिया होता तो लेखिका के पास अपने पति जैसे अफसरों के विकल्पों की कमी न होती। लेकिन उसे विकल्पों की तलाश न थी, वह तो अपने पति से प्रेम और सम्मान चाहती थी, जो कि उसे अंत तक नहीं मिला। इसके विपरीत उसे पति से गाली - गलौज और दुत्कार ही मिली। मार - पिटाई के अवसर आना भी आम बात थी। लेखिका की ननद ने उसे बताया कि वह अपनी पहली पत्नी को भी ऐसे पीटता था। दरअसल लेखिका उसकी दूसरी पत्नी थी और स्थिति हमेशा दोयम दर्जे की रही। लेखिका के अनुसार - देवेन्द्र कुमार को पत्नी सिर्फ खाना बनाने और  शारीरिक भूख मिटाने के लिए चाहिए थी। 13 अत: लेखिका उसके लिए नौकरानी और सेक्स आब्जेक्ट से ज्यादा कुछ नहीं थी।
एक सौ चौबीस पृष्ठ की इस आत्मकथा में पहले तिरानवे पृष्ठोंतक लेखिका के पति देवेन्द्र कुमार का कहीं जिक्र नहीं आता। अंतिम तीन पृष्ठों में से सात - आठ पृष्ठों का इस्तेमाल लेखिका ने अपने पति की कू्ररताओं का खुलासा करने के लिए किया है। लेकिन इस आत्मकथा से संबंधित तमाम चर्चाएँ, आलोचना और समीक्षाएँ इन्हीं सात - पृष्ठों तक सीमित हो गई है। सीमित होने के अलावा एकांगी भी है। सबका एक ही सुर है - दलित मुक्ति की बात करने वाले दलित विमर्श के पैरोकारों देख लो, यह है तुम्हारा असली चेहरा, जरा दोहरा अभिशाप के आइने में खुद को देखो, तुम हम पर ब्राहमणवादी होने का आरोप लगाते हो। अरे, असली ब्राहमणवादी और शोषक तुम हो। तुम किस मुँह से दलित मुक्ति की बात करते हो। बंद करो अपना ये दलित विमर्श, पहले अपनी स्त्रियों को आजाद करो। यदि तुम ऐसा नहीं करते तो हम तुम्हारी स्त्रियों के पक्ष में तुम्हारे खिलाफ आंदोलन करेंगे। तुम्हारी स्त्रियाँ हमारे साथ खड़ी है।
दलित पुरुषों से नैतिकता की माँग करने वाले सवर्ण बुद्धिजीवी प्रशंसनीय भी हो सकते थे यदि उनकी नीयत साफ होती। लेकिन ये विभ्रम फैला रहे हैं कि दलित पुरुष ही पितृसत्ता और ब्राहमणवाद का रचयिता है। ऐसा लगता है कि मनु महाराज कोई ब्राहमण नहीं बल्कि दलित पुरुष थे। जबकि वास्तविकता यह है कि दलित परिवार मध्यवर्गीय और सवर्ण परिवारों और पुरुषवाद सवर्णों की ही देन है।
दलित मुक्ति अथवा स्त्री मुक्ति के संघर्षों में सवर्ण पुरुषों ने भी अपनी भूमिका निभाई है, आगे भी निभा सकते हैं। यदि कोई दलित अथवा स्त्री उनकी भूमिका की परीक्षा करना चाहे तो इसके लिए भी उन्हें सहर्ष तैयार होना चाहिए। आलोच्य आत्मकथा के प्रकाशन में भी एक सवर्ण पुरुष की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्व. समाजवादी मस्तराम कपूर  ने इसकी प्रूफ रीडिंग, संशोधन से ही यह आत्मकथा पाठकों के समक्ष इस रुप में आ सकी। बावजूद इसके उनकी भूमिकार संदिग्ध ही है। सबसे पहला प्रश्र तो यही है कि उन्होंने इस आत्मकथा को बार - बार उपन्यास घोषित किया है, क्यों ? आखिर वे इसे आत्मकथा के रुप में क्यों स्वीकार नहीं कर सके थे ? शायद इसलिए कि आत्मकथा में दर्ज तमाम अनुभव और घटनाओं को काल्पनिक कहकर अनदेखा किया जा सके जबकि वे जानते थे कि उपन्यासों में भी यथार्थ के चित्र मिलते हैं। फिर वे आत्मकथा को उपन्यास घोषित करके कौन सा विभ्रम रचना चाहते थे।
दूसरा प्रश्र यह है कि फ्लैट पढ़कर समझ ही नहीं आता कि वे इस आत्मकथा की प्रशंसा में लिख रहे हैं अथवा दलित विमर्श को ही खारिज कर रहे हैं। कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य है - यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे - मीठे अनुभवों से भरे जीवन के सिंहावलोकन के रुप में लिखा गया है। अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन्न स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है। जो खासतौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाते हैं। अर्थात मस्तराम कपूर दलित साहित्य को आत्मरति और आत्मपीड़न का साहित्य घोषित करके उसके सामाजिक सरोकारों को ही नकार रहे हैं। जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि आत्मरति और आत्मपीड़न की सबसे अधिक संभावनाएं सवर्ण लेखकों की आत्मकथाओं में मिलती हैं। ऐसे भी इसके लिए आत्मकथा नामक विधा अनुकूल है, जबकि वे दलित आत्मकथाओं को स्वीकारते ही नहीं हैं, आत्मकथाओं को उपन्यास घोषित कर देते हैं।
तीसरा प्रश्र यह कि मस्तराम कपूर ने दलित रचनाओं को एकांगी घोषित करने के लिए बड़ा मासूम तर्क दिया है - आत्मकथात्मक उपन्यासों ( और आत्मकथाओं में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने की होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है, वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा। यह प्रवृत्ति उसे जीवन की एकांगी दृष्टि से देखने को विवश करती है और इसके साथ ही इस रचना में एकांगीपन और एकरसता आ जाती है। 15 कपूर जी का यह तर्क स्पष्ट भी है और इसमें कोई कमी नहीं दिखती लेकिन इसकी मासूमियत के पार देखे तो कपूर जी के दलित प्रेम की सच्चाई सामने आ जाती है। पहली बात यह कि कपूर जी जिस अनन्य अनुभव की बात कर रहे हैं, वह सवर्ण लेखकों की आत्मकथाओं में मिलते हैं, क्योंकि उन्हीं की अद्वितीय जीवन मिला है, सवर्ण समाज में ही अद्वितीय महापुरुष जन्म लेते हैं अधिकांश अवतार भी इसी समाज में अवतरित होते हैं। रही बात दलित लेखको के अनन्य अनुभव की तो जिन दलित आत्मकथाओं से ऐसा व्यंजित होता है कि उस लेखक अथवा लेखिका ने जो भोगा औ सहा है, वह किसी और ने भोगा और सहा नहीं होगा। तो इसका अर्थ बस इतना है कि जो कुछ किसी दलित ने सहा और भोगा है, वह किसी वह किसी सवर्ण ने सहा और भोगा नहीं होगा। यही कारण है कि दलितों के इन अनुभवों के बरक्स किसी सवर्ण के अनुभव रखने है तो काफी खोज बीन करके तुलसी बाबा का नाम मिलता है कि देखो तुलसी बाबा भूख से कैसे बिलबिला रहे हैं, भूख जाति नहीं देखती। कितनी मासूम खोज है यह और कितना मासूम तर्क है। दलितों के अनुभवों के बरक्स तुलसी बाबा के अनुभव रखने वाले यह भूल जाते हैं कि दलित समस्या केवल भूख तक सीमित नहीं है। भूख के साम्य के आधार पर यदि सचमुच तुलसीबाबा और दलितों की जीवन स्थितियाँ एक न एक हो जाती तो बहुत सारे दलित तुलसीदास बन जाते। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है।
अंत में मस्तराम कपूर ने दलित साहित्य को खारिज करने के लिए बड़ा विचित्र तर्क दिया है - इसका (दलित साहित्य का)औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जाता है कि दलितों के जीवन में पीड़ा, घुटन, और अपमान के सिवा और है क्या ...? आदमी ही नहीं पशु - पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते हैं ... इस नीड़ का निर्माण वे प्रेम से करते हैं। 16 अर्थात कपूर जी को इस बात पर हैरानी थी कि दलित साहित्य में दलितों का जीवन जैसा चित्रित किया गया है यदि सचमुच दलित जीवन वैसा ही है तो वे जीवित कैसे रह सके। अर्थात दलितों के जीवन में भी जीने के लिए बहुत कुछ है अत: दलित साहित्य में विचित्र दलित - जीवन फर्जी है। दलितों के नीड़ और पशु - पक्षियों के नीड़ की तुलना करते समय वे दलित और कुत्ता - बिल्ली में कोई अंतर नहीं करते क्योंकि उनका अनुमान था कि जैसे कुत्ते - बिल्ली के जीवन में प्रेम होता है, वैसे ही दलितों के जीवन में भी होता होगा। बिल्कुल ठीक अनुमान है, दलितों के जीवन में भी प्रेम होता ही है लेकिन यह प्रेम उन्हें सवर्ण समाज से नहीं मिलता, यह प्रेम भी कुत्तों - बिल्लियों से मिलता है ? किसी दलित की बात सच नहीं लगती तो प्रेमचंद की कहानी दूध का दाम पढ़ लें। इस कहानी में भी अनाथ दलित बच्चे को सारी करुणा और सारा प्रेम कुत्ते से ही मिलता है।
दोहरा अभिशाप पढ़ने के बाद सबसे बड़ी हैरानी तो यह होती है कि इसके साथ यह फ्लैट कैसे छपा ? क्या लेखिका ने मस्तराम कपूर के दलित साहित्य विरोधी तर्क पढ़े नहीं थे ? या उनके प्रति इतनी कृतज्ञ थीं कि अपनी आत्मकथा के फ्लैप को नहीं बदलवा सकीं ? यदि आत्मकथा प्रकाशित होने के उत्साह में फ्लैप पर अंकित तर्कों को नहीं भी पढ़ा होगा तो उन्हें यह तो पता होगा कि उनकी आत्मकथा उपन्यास के रुप में छप रही है। उन्होंने अपनी आत्मकथा को उपन्यास कहलाना क्यों स्वीकार किया ? यदि दोहरा अभिशाप को आत्मकथा के रुप में नहीं छापा जा रहा था तो इसे दलित समाज की जीवनी के रुप में छपना चाहिए था। ऐसे भी इसमें लेखिका की नानी और माँ के जीवन संघर्ष जीवनी की तरह दर्ज हुए हैं। यदि उन दोनों महिलाओं को भी लिखने पढ़ने का अवसर मिला होता। उन्होंने भी अपनी आत्मकथाएं लिखीं होती तो निश्चित रुप से दोहरा अभिशाप से बेहतर आत्मकथाएं हमारे सामने होतीं। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि इन दोनों महिलाओं का व्यक्तित्व लेखिका के व्यक्तित्व से भी अधिक दृढ़ और प्रभावशाली था। यदि हम कम प्रभाववाली और ज्यादा प्रभाववाली के चक्कर में न पड़े तो इस आत्मकथा को तीन खुदमुख्तार दलित स्त्रियों की जीवनी के रुप में भी पढ़ सकते हैं।   

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