इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 22 नवंबर 2014

कुबत और औकात का अदभुत सौन्‍दर्य

'' धान के कटोरा '' में निम्न विशेषताएँ हैं -
1. श्रमचित्रण -
        1 श्रमजोर
        2 श्रमचोर
2. सामाजिक चित्रण -
        1 चातरराज, 
        2 जनजातीय समाज-क्षेत्र
3. सांस्कृतिक चित्रण -
        1 पर्व एवं तीज त्यौहार,
        2 परंपरागत प्राकृतिक चित्रण
4. अधिकार वर्णन -
        1 मूलनिवसी अधिकार
        2 परलोकधर्मी वर्चस्व अधिकार
5. आजादी वर्णन -
        1 वास्तविक स्वतंत्रता
        2 स्वतंत्रता की गुलामी
स्वतंत्रता से आगे तीस वर्षों तक लोक संस्कृति मूलत: कायम रही। पश्चात् वर्षों में नंदाती चली गई। वर्तमान में विलुप्तता की कगार पर है। धान कटोरा महिमाउन्नत, फौलाद जैसा तन, पारम्परिक तीज त्यौहार, गीत करमा-सुआ-ददरिया, दीपावली-पोला आदि होने पर भी छत्तीसगढ़ियों में बदलाव नहीं आया है। संक्रान्ति न कर सके। सच्चे होते हुए भी कछोरा बांध के भिड़ना दुश्वार हुआ?
भेलई के लोहा कस दिखथे रे छत्तीसगढ़िया तन हा।
छत्तिसगढ़िया, जुग बदलिस, फेर छाड़िन नहीं कछोरा।।(पृ. 25)
परबुधियाओं से सादा-सच्चा छत्तीसगढ़वासी की चारी (निन्दा) करने लगा रहा। परलोक से घुसपैठ कर दलाली से अपना काम साधा। अपनों ने ही अपनों पर डाका डाला। डॉ. यदु ऐसे लोगों के लिए परलोखिया-ननजतिया शब्द प्रयोग करते हैं। श्रमिकता के मेहनती चरमोत्कर्ष पर भी छत्तीसगढ़ वासी वैसे ही भूँजाते रहे, जैसे चनाबूट का होरा भूनते हैं। पश्चात् चबाकर उदरस्थ करते हैं। इसका प्रमाण श्रमसाधक के हाथों में फोड़ा पड़ना है। दिगर प्रंात - महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के लोगानुसार छत्तीसगढ़ वासी बड़े '' मयारू '' होते हैं। इसे दुखारू किसने बनाया?
सबके मुख म चारा डारेन, हम लांघन संगवारी।
तभो ले, संगी! हमला भूँजिन भुर्री बार के होरा।। (पृ. 26)
पूरे गीत में छत्तीसगढ-श्रम की श्रम, ताकत, शान-शौकत-शौर्य के साथ दुर्दशा का अटल वर्णन है।
आजादी पश्चात् मोहभंग हुआ। क्षेत्रीयता-शोषण '' राष्ट्रराज्य '' नाम से हुआ। अनेक क्षेत्र स्वतंत्रत प्रांत माँगने लगे। उसमें छत्तीसगढ़ भी प्रमुखता से उभर कर आया। इसने 1990 से तूल पकड़ा। 2000 में पृथक राज्य निर्माण हुआ। लोक गाँव के पास आया सिफर। भूत-वर्तमान-भविष्य दृष्टि, कवि की अद्भुत है। '' लोकवृत '' से विद्रोही संवाद करते हैं।
बिना लड़े नइ मिलय राज हा
लेबे छाती चढ़के।
अपन मूँड़ म पागा बाँधव-
बेटा छत्तीसगढ़ के।
सीधे-सीधे दो-दो हाथ कर लड़ें; विद्रोह है। बी. एस. पी. शुरू हुई तो कहा गया - अब प्रत्येक छत्तीसगढ़वासी को खपरा-छानी में जीवन व्यतीत नहीं करना पड़ेगा; लोहे के घर मिलेंगे। उल्टा हुआ; बँटवारे में लोहा-फौलाद के स्थान पर केवल टिन मिलता है। उच्च स्तरीय चीजें कहाँ गायब हो जाती हैं? मिथकीयता से गीत सजाते हैं - मटिया-मसान सभी प्रकार के धन को गायब कर देते हैं और गौटिया कंगाल बनता जाता है। वैसे ही छत्तीसगढ़ के धन को '' परलोक '' ले गये। यह छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद चौगुने तरीके से लगातार हो रहा है। (छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आसानी से हो गया तो आश्चर्य हुआ, अब लगता है, यह इसी के लिए किया गया है।) तो राज किसका? छत्तीसगढ़ियों का? वर्तमान में पुन: वास्तविक हकों हेतु किसानों-श्रमिकों को एक आन्दोलन की जरूरत है। इसका अहसास डॉ. यदु करते हैं -
मिलय न हक मांगे मा, संगी! लेना परही लड़के।
बने नहीं चुप रहय मे, संगी! बोलव बिजली फड़के।
हमर पेड़ के हमर हो छँइहा, हमर फूल अउ फर के।
करो ये सपना पूरा संगी! छत्तीस-मंतर पढ़ के।
अपन मूड़ मा पागा बाँधव, बेटा छत्तीसगढ़ के। (पृष्ठ 27, 28)
क्या कारण है कि झीरमघाटी में 25 मई 2013 को अनेक नेता मारे गये? यह पक्ष-विपक्ष सत्ता का भ्रान्तिक मायाजाल है, जहाँ लोक-गण को कोई अधिकार ही न मिले। कल-आज-कल का उपरोक्त गीत सूर्य-ऊँचाई रखता है। छत्तीसगढ़वासी इसे कब समझेंगे? प्रान्त के कोने-कोने के इर्द-गिर्द बिखरे हुए लोगों के लिए ये सार्थक विद्रोही सृजन कहा जायेगा। उक्त गीत की की तुलना '' बीमार शहर का सूत्रधार '' (किरनचन्द्र शर्मा) इन पँक्तियों से करें -
कागा नाचै, कागा कूदै, उड़ि-उड़ि कागा गावै।
हंस बेचारा चुप-चुप जागे, चुप-चुप नीर बहावै।
ये कैसा व्यापार रे भइया, जो खरीददार लावै।
लोग उसी को चोर बताते, चोर खड़ा गुर्रावै।
ऐसा ही ललकार उक्त छत्तीसगढ़ी गीत में है। क्या श्रमजोरक, हाथफोड़परत श्रमवीर हंस नीर बहाता ही है? चोर बन जाता है? छत्तीसगढ़िये कब समझेंगे। छत्तीसगढ़िया महानदी-अरपा-पैरी-शिवनाथ सरिता से अपना सरग बना नहीं सका। '' तब सरग ल सँउहे पाबों '' यदुजी की सार्थक कल्पना है। पण्डित-मुल्लों की कोरी कल्पना नहीं।
लक्ष्मण मस्तुरिहा के गीत -  '''' कहाँ जाहू बड़ दूर हे गंगा, पापी इहें तरव रे! के पापी कौन? फिर पापी का नाश करें या उसको तारने लगें? पर सीधा कटाक्ष है। आज का समय पापियों का नेस्तनाबूद करने का काल है। हमारे पास पहाड़, पड़की-मैना सब कुछ है। आवाज उठाने की देर है। देरी क्यों? कवि उदु 1975 से आगाह करते आ रहे हैं, और इधर छत्तीसगढ़ प्रान्त के जन नासमझ का बाना पहने हुए हैं -
कोयली के कुहकी के ये सहिनाव हे,
दुख-विपदा ले जीतंय, अइसे दाँव हे,
जेमा दुखवा जीतंय, उही नियाव हे। (पृष्ठ 31, 32)
यहाँ भावपूर्ण यथार्थ की खुशबू है। (देखिए, डॉ. गोर लाल चन्देल, पूर्वपाठ पृ. 9) यदुजी का भाव है, बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख। वे आगे जोड़़ रहे हैं - छत्तीसगढ़िया किसान-श्रमिक, अपने श्रम का मूल्यांकन करना सीख। हाय हलो-बाय हलो, में दुनिया डूब चुकी है, जिसका फायदा अलोकधर्मी उठाते हैं। पंख काटकर (विभिन्न परेशानियाँ और समस्या खड़ी कर) दो दाने देकर (ताकि मरने से बचे रहें) मया उजागर करते हैं। महिला है तो डोरे डालते हैं। एक ओर पेट डोलता है और दूसरी ओर अस्मत डोलती है। भूखे पेट के सामने सत्-गुण गुम हो जाते हैं। हवा खाना, हवा निकाल देना बना क्यों है?
पाँखी काट के सुआ के,
कहिथस! मया म नइ उड़ाय।
सतवंता के सत, गुणवंता के गुण उहाँ नँदाथे,
जिहाँ पेट के भीतर अँइठे तीन हाथ के पोटा।
यदुजी लोकवृन्द को खरे-खोटे की पहचान करा रहे है। ढोगी साधु-सधवा से परहेज करा रहे हैं। जनगण! सावधान हो। ठोक-पीट के घड़ा बना रहे हैं, लचक-पचक नहीं। समे (समय) मनोविकारों से ग्रस्त नहीं होता। अँधों-बहरों को नहीं देखता;  चोरहा-अपंगहा किसी को नहीं।
खटिया संग म सियान,
का बदे हस मितान?
देख! समय ह सुटुर-सुटुर रेंगत हे जी। (पृ. 39)
समय शीघ्रताशीघ्र निकलता है। दिन-बादर देख। होशियार हो जा। वर्तमान दशा-दिशा बताये हैं - मुँह मारने वाले चोरों का गिरोह ओने-कोने में छिपे बैठे हैं। नजर चूकी, माल गायब पूरा करते हैं। सो मील के पत्थर की तरह जाग। कविता की बानगी देखिये -
अब झन कोनों हरहा-हरही, तोर मुँहू ल मारे।
नोनी-बाबू के जिनगी हा, तोर आसरा माड़े।
येकरे कारण तंय जागे रह, नारी! खूँटा गाड़े। (पृ.38)
गाँव पहाड़ की तराई में बसा है। पहाड़ी के दोनों ओर गाँव है। प्राकृतिक देन, पहाड़ी पर वनस्पत्ति, फल-फूल, काँटे-बाटे सब कुछ है। सहयोग सामाजिकता में गाँव निवासियों की आवाजाही है। फूल-काँटों भरा जीवन तब खुशहाल होता है जब मनुष्य रास्ते के काँटों को हटा देता है और अमरइया प्राप्त होती है। अर्थात् हराभरा जीवन होता है। अमरइया की भूमि पेंउस दोना से कम नहीं है। शारीरिक श्रमरक्त से बंजर भूमि को दही सरीखा मथकर घी प्राप्त होता है, अर्थात् उपजाऊ भूमि पाते हैं। ये सब किसान मौसमी बसंत-अबसंत को झेलकर उपलब्धता प्राप्त करता है। भूमि-जीवन किसी परि से इक्कीस रहता है। मरकर (श्रम) स्वर्ग-आनंद पाता है। समे (समय) की पहचान के साथ मनुष्य को अनुकूलित होना चाहिए। कविताएँ मनन-चिंतन के लिए बाध्य करती है और प्रेरणा भी देती हैं -
व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती;
रोगाश्च् शत्रव इव प्रहरन्ति देहम्।
आयु: परिस्त्रवति भिन्न घटनादिवाभ्य:,
लोकस्ताप्यहितमाचरतीति चित्रम्।। (श्री विराज)
अर्थात् - बाघिन की तरह वृद्धावस्था धमकाती, गर्राती हुई सामने खड़ी है और बीमारियाँ शत्रुओं के समान शरीर पर प्रहार कर रही है। फूटे, तरेर खाये घड़े से जैसे पानी बहता है, वैसे आयु बरबस निकली जा रही है। फिर भी लोग अनिष्टकारी बुरे काम किये जाते हैं, यह कितनी विचित्र बात है। यदुजी कहते हैं - '' जूड़ बैरी खोजत हे रउनिया ला।'' अर्थात्, श्रमिकों! अपना वास्तविक प्रकाश पहचान लो। तर्क लगाओ। (पृ. 49) '' रोंठ-रोंठ मन रोंठिया गे।'' इनसे छुटकारा पाना है तो यदु की काव्यार्थ व्यंजना लाजवाब है -  '' आसो अइसन बरस रे बादर!'' ने संघर्ष के लिए ताकत प्रदान किया है। दुकाल, व्यक्ति खुद बुलाता है। तभी तो यदुजी अर्थव्यंजना करते हैं - ''मुड़ के बोझ उतरे कुछ तो, गर के फाँदा टूटे रे।'' (पृ. 40) बादर प्रतीकता हिन्दी काव्य में शायद ही होगी। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में मैं इसे इस प्रकार कहूँगा -
चलत मुसाफिर मोह लियो रे, चाँउर वाले बाबा।
छत्तीसगढ़ बस्ती रस रोह लियो रे, चाँउर वाले बाबा।
श्रम-जोरिता बोर दियो रे, चाँउर वाले बाबा।
मतलब, यदुजी की कविता समकालीनता प्रकाश में आगे-आगे मशाल स्वरूप है। सर्वोच्चता पर कि हिमालय शिखर छोटा पड़े। राक्षसी पहाड़ सामने खड़े जोंक बन खून चूस रहे हैं। ये कोकड़े धोखा देते हैं। वज्र छाती तो है ही, तो तोड़ दे जिसे भूतवाला खंडहर कहते हैं।
पाँचों अँगरी ला साँट के चल,
खोचका-डबरा ला पाट के चल। (पृ. 51)
तुम्हारे शोषणकार्ताओं को अपनी ऊँगलियों से गिन सकते हो। '' पथरा सही काया मा आगी सही मन माँगत हे जुग मोर।'' दो पत्थरों की रगड़ से आग पैदा होती है। हम सब-सब हमारे का मन प्रकाशित है तो डर काहे का? ऐसी कविताओं को पढ़ते हुए विचार आया कि यह कविता पाठ्यक्रम से बाहर क्यों है? व्यवस्था बेंवारस हो चुकी माना जाय? व्यवस्था के बीजहा धान की तपास जरूरी है। अत्याचारी बंदरों की उछलकूद से गरीबों के घरों के खपरा-छानी चूहने लगी है। खेतिहर भूमि में पसीना भिंगोकर भी छत्तीसगढ़ का किसान प्यासा है। प्यासा रखने वालों के कत्ल के लिए उनकी तलाश जरूरी है। कवि कहते हैं -
अब के रखवार हवँय चोरहा,
बखरी मा छाला सही रात रे।
काला तंय छाँटबे-निमारबे?
सरहा बँगला सही रात रे। (पृ. 58)

चोरों के पहरेदारों में रखवाले कैसे होंगे? -
ठग्गू मन महल-अटारी,
खीर खाय बर सोनहा थारी,
देखव इनकर टेस ला,
का हो गे मितान मोर देश ला? (पृ. 60)
इसे पृष्ठ 61 पर और स्पष्ट करते हैं -
कहूँ भूल-चूक करय तंयहा जिनगी के खेल मा।
जेन जघा छुरी, कइसे उही जघा चारा हे,
इहाँ तो चिरइया के चिरइया खाय मांस रे,
मान अउ परान बाचे, अइसे धर नेत रे,
झन तंय छुरी ले नरी अपनेच् रेत रे। (पृ. 61, 62)
मनखे-मनखे का घमासान देख बादर बइहा ताना मार रहा है। तो चलते हैं मया-पिरीत की खुशहाली खातिर भिड़ पड़ते हैं। प्रेम सजन बनाता है। प्रेमहीनता मनुष्य की निशानी नहीं। स्वारथ से झगड़ा-दंगा होता है। फिर भी कहा जायेगा- पैसे को मान, पगड़ी को सलाम। '' हावय कोदई हावय सगा, नइ हे कोदई नइ हे सगा।'' कदचित! नहीं। निश्चित है -
कोठी भर मानगउन वोला कब मिलही,
कोठी धान भरे, ठंउका मा। (पृ. 68)
'' नहाय नंगरा, निचोय काला '' को कोई काजल भी नहीं आंजेगा। बदी-नेकी उसके साथ नहीं रहती। इस हेतु तो मया बिझौना जुड़ना परम आवश्यक है। तभी चावल-दाल-आटे का सपना सार्थकता साधता है।
एक पेट ले कतको पेट ह जुड़े तो होही,
तेकर बर बेंदरा नाचे खोर म देवार के। (पृ. 70)
नहीं तो हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या? फल कुछ हाथ नहीं, चिल्लाया गया - हाथी बाय मारेगा......... हाथी ने बाय छोड़ी तो फुस्स् ...... से। सब कुछ सिरा जाता है। शून्य हो जाता है। लइका बुध से सियान, मुसुआ से कोठी का धान, लबरा से खिली पान, बैरियों से मितान और कारखाने से किसान लुप्त हो गये। ऐसा इसीलिए हुआ कि गोरिया मछिन्दर के स्थान को करिया मछिन्दर ने ले लिया। उजाले का गीत गाने वाला, प्रकाश देने वाला '' हीरा '' (बेहतरीन कर्म) गुम कैसे हो गया? सारी परेशानियाँ आकर खड़ी कैसे हो गयी? एक कारण तो वैश्विकयुद्ध की नियति है -
'' लाखन डोली बिन बियासे लुवा गे ''
धरती के फोटू कोनहा चिरा गें
इसीलिए यदुजी कहते हैं  -
तोर गोड़ के चिनहा, रद्दा बनही कल रे। (पृ. 80)
बद ले भंडार संग तंय हा गंगाजल रे। (पृ. 81)
दीये का तेल-बाती वाला जीवन कुदरत से जुड़ा है, परीक्षा तो होनी ही है।
आलोचक पाठक भी होता है। यदु का लेखन, उनका निरीक्षण-परीक्षण भी है। लेखन बिंबों सहित करता है तो वह अपना, कुदरत का सीमांत नहीं परिष्कृत समालोचना दर्शन बन जाता है। यदुजी समालोचना दर्शन को कविता में समास शैली से पिरो देते हैं और अपनी काव्य प्रतिभा को सुदृढ़ बनाते हैं। यदुजी अद्भुत समास शैली के कृतिकार हैं। इस शैली को सरल जनभाषा में गुथा है, वह माला जपने की नहीं, कर्म करने की दिशा देता है, जो अपने आप में आँखिन देखी है।
आलोचना ट्राइबल हॉस्टलों के छात्रों का पिनकोड  आलूचनादार   नहीं है। यदुजी की अपनी आलोचना है। परखदार कवि हैं। बावजूद आलोचक उनकी रचनाओं का नीर-क्षीर करता है और जब बात नहीं बनती तो तार-तार चीरफाड़ करता है। ऐसा आलोचक रोठ-ठोस नहीं पलपलहा होता है। लोकधर्मिता से परे हो होते जाता है। मेरी आलोचनात्मक राय पाठक तय करेंगे! पृष्ठ 82 से कविताओं का पहलू और रुख दोनों में परिवर्तन दिखाई पड़ता है। छत्तीसगढ़ ही नहीं समग्र भारत पर हो रहे प्रभाव को यदुजी प्रतिबिंबित कर रहे हैं।
अन्न हुआ नहीं। धान खेतों में जलकर गुम हुआ। हुआ तो करपा-खरही में धान का जरई फूट आया। दाना कहाँ मिलेगा? पैरावट भींग कर सड़ गया, पैरा के लाले पड़ गए; मवेशियों का क्या होगा? अन्न या तो पक नहीं पाया, पका तो प्रकृति ने सब नाश कर डाला। मुँह का निवाला छिन गया। पोषक प्रकृति ही सबसे बड़ा शोषक बन गया। इसकी रिपोर्ट किस थाने में दर्ज करें? बसंत तो फिर आयेगा, पर तब तक मानव की कुशलता और खुशी का सुध कौन लेगा? किसानी जुआ बराबर है। खाटी पेट बसंत में नगारा, टिमकी, तासा बजाकर दुख को कितना बहलायें? कितनी और कैसी खुशी मनाएँ? बेमौसम बरसात से कोयल की कुहकी, भंवरों का गुँजन, फुलवारी के फूल न होकर मात्र सूखे पत्ते रह गये। ये ताना मार रहे हैं। प्रकृति से छेड़छाड़ करोगे तो परेशानी में पड़ोगे। ऋतुराज बसंत राग, नहीं विराग के तान छेड़ेगा। ऐसे मौसम में आम चुनाव नीम चढ़ा करेला साबित हुआ। कैसा बसंत है? दोनों आमने-सामने होकर अबसंत मनाने लगे। मनुष्य के हृदयभाव आश्वासन भाव में परिवर्तित हो गये। राजनीति के फूटे नंगरों ने मति को गारे के समान मताकर रख दिये। सब इधर से उधर। भाठा में देश बिलोने लगे। सब गड्ड-मड्ड। तो बसंत कहाँ गया?
इसके ठीक बाद चौमास का सुन्दर वर्णन दोहों में है। चित्रात्मक भाषा में अकती, हरेली, गेंड़ी, भोजली, पोरा, तीजा, जँवारा, गंगाजल, फूलफुलवारी, पितर, दसेला-देवारी, गोवर्धन खूँदना, कांछन निकलना, छेरछेरा, सुवा, डंडानाच, कर्मा-ददरिया, पंडवानी, फाग, मड़ई-मेला, नाचा-पेखा, ओली-ओली खजानी, सबके अलग-अलग रंग और अलग-अलग राग हैं, पर हैं सब थोक के भाव। नाचा का जोक्कड़ गीत, परीगान का वर्णन थोक-थोक कथन करता है - 
छत्तीसगढ़ के महिमा अड़बड़, रंग हे आनीबानी।
कहे कवि मन चिल्हर-चिल्हर, येकर थोक कहानी।
परीगान, जोक्कड़ गीत पर बचपन के नाचा की पँक्तियाँ  सहज ही स्मरण में आकर ताजी हो जाती हैं -
भड़भड़-भड़भड़ भड़मी भागे, पेटभरी हा तनियाय।
वो आघू-आघू भगाय अउ पाछू पोंकत जाय।
(दौंड़ती मोटर सायकल में बैठा आदमी)
का साग राँधे टूरी लोहा के कड़ाही मा।
तोर-मोर भेंट होही, दुरूग के भेलाई मा।
(प्रेम और श्रृँगार-सौन्दर्य के साथ परिवार बसाने की युवा मन की आकांक्षा)
महतारी का बेटा परिश्रम से चौमासा में काम करता है तो लगता है धरती की शादी हो रही है। पृष्ठ 88 से 98 तक की कविताएँ बिंबों से ऐसी भरी हैं जैसे बिना डेकोरशन के भी बिजलियों की चमक से आँखें चुँधियाँ रही हैं। डायनमों फेल हो चुका है। डी. जे. बगैर संगीत की मधुरता चारों ओर फैल चुकी है। परमाणु और हाइड्रोजन बम सिथा गये हैं। उक्त पृष्ठों के एक-एक पदबंध पर बीसों पृष्ठ भरे जा सकते हैं। यह कवि की सामर्थ्य का अद्भुत कमाल है कि विस्तृत आँखन देखी को संष्लिष्ट शैली में समायोजित कर डाला है। जिससे दूर-दूर तक टेढ़ी-मेढ़ी व्यवस्था को बिना टेलिस्कोप के भी देखा और परखा जा सकता है। प्रकृति से छेड़छाड़ पर प्रकृति विशाल रूप बदल देती है। वह विकराल रूप धारण कर प्रतिशोध लेती है। ये विपत्ति वैसे ही है जैसे खरगोश, शेर और गधे के सींग खोजना। आज अजीबोगरीब चक्कर है। कंपनियाँ अपने मॉल, सेल में किसानों को लुभाकर, उसके जल, जंगल, जोरू और जमीन से खिलवाड़ कर उसे भिखारी बना रही है। जबकि अपेक्षित प्रकृति सुन्दरता, रम्यता, रमणीयता और सम्पन्नता प्रदान करती है।  अषाड़ से माघ तक को यदु ने अपने काव्य में समेट लिया है। यह कविश्रम अद्भुत और अविस्मरणीय कर्म है।
भुँइया के लगिन, सरग संग धरा गे,
मड़वा सही बखरी-बारी हो गे रे।
ननपन मा नान्हें रिहिस मया हा,
कउखन वो हा मोटियारी हो गे रे। (पृ. 97, 98)
आज नक्सलियों-सत्ताजवानों के बीच आदिवासियों का जीवन अत्यन्त जटिल बन गया है। वे अपना दर्द न उगल पा रहे हैं और निगल पा रहे हैं। इधर छुछुन्दर के सिर पर चमेली का तेल लगाया जा रहा है। और मरने वालों की संख्या आदिवासी ही है? हमारा दावा है आम आदमी या आम आदिवासी नक्सलाइट नहीं हो सकता। गेहूँ संग कीड़े पीसे जा रहे हैं।
इही चिन्हारी हे हमर,
आज इही पहिचान।
जस जाँता भितरी गहूँ,
जस बस हमला जान।
कवि की गीत रचना गजब की है। (पृ. 100)
एहा कहिथय, तंय वोकर अस, वो ह कहिथय एकर।
हम  अपने हन, हमला काबर, कहिथंय जेकर-तेतर।
ये हा मारय, वो हा काँटय, काकरतिर गोहरावन?
अपन गाँव, घर अपन छोड़ के, बता कहाँ हम जावन?
नक्सलवाद को खतम करने से पहले जनजातीय क्षेत्र से अजनजातीय को हटा दो, फिर देखो कि असली नक्सलवादी कौन हैं? क्योंकि ऐसे हिंसक भी हैं जो छोटे फाँदा से बुचकते नहीं और बड़े फाँदा में फाँसते नहीं हैं। मार्मिमकता-संवेदनशीलता को '' बता, कहाँ हम जावन '' गीत को पूरा पढ़कर बखूबी समझा जा सकता है।
जाँगर की महिमा को अन्यायी राज ने खतम कर दिया। इसके लिए मनुष्य को, '' सोचिस बइरी ला मारे बर, बनना परही घुघुवा जात '' की उपमात्कम तुलना सटीक है, क्योंकि शोषणकर्ता नाग है -
नागनाथ हा पर के बिल मा, निंगे हे कब के बरपेली।
अपन भिंभोरा मान के पर के जमा-जिनिस ला बउरत हे।(पृ. 115)
ऐसे नागनाथ सरकार में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार में बदल दिये हैं जिसे संपूर्ण जनता भी देख रही है-समझ रही है। पर संयोग क्यों नहीं हो रहा कि विद्रोह हो? रामराज मात्र सपना है, जनता को भ्रमित करने का। जब प्रेमचंद की धारणा अवधारणा में बदल रही थी तब अब अलगू और जुम्मन शेख गाँव की चौपाल में समाहित होते नहीं देखा जा रहा है? मूल कारण अमरिकी परेतिन है पसीना वालों पर सवार हो गई है (करवा दी गई है) - और टोनहा ने दो रूपया चावल में पसीना वालों को पांग दिया है।
नइ बेंचाय '' शेयर बाजार '' मा पछीना,
तभ्भो ले घुघुवा हा विहिंचे झपागे। (पृ. 120)
तब कुछ-कुछ नहीं, उधम मचाना होगा। मनुष्य को अब बंदर जाति में समाहित नहीं होना चाहिए।
गिरहा मन तोप डारिन सुरूज ला,
दिन लगथे रात सही भइया रे।
कोन जनी मनखे मन कब लगहीं,
मनखे के जात सही भइया रे। (पृ. 123)
इसके मूल में है - संसद में आल्हा-फाग गाया जाना। गरीबों की छानी को सँवारने का जिनको ठेका मिला, वे स्वयं के कुरिया को सजाने और बंगलों में तब्दील करने में लगे हुए हैं। यह स्थिति आजादी के पश्चात् असीमित मात्रा में पसरी है। अब आजादी की उम्र मात्र छटठी का दूध बनकर रह गया है। नीचे से ऊपर तक, सब कर्णधार सट्टापट्टी और मार्केट के शेयर में जमकर रह गये हैं -
गंगाजल ला खोजत-खोजत देश खुसरगे भटठी मा।
हमना-तुमला जघा मिले हे, चल भइया मरघट्टी मा।(पृ.125)
किसानों-श्रमिकों के मोती झरते बोल से भगवान को तरस नहीं आता। वह तो पेड़-पहाड़ का अंतर नहीं समझता। एक कलाकार ने इसे जाना, समझा, भोगा और टकराया है। कृतिकार लोकवृत्त की भलाई अपनाता है। हालीवुड और बालीवुड अपना पेट भरने और और जिस्मबाजी से दूसरों को उपभोग करने में माहिर है। ये कृति कलाकारी नहीं, विनाशकारी है। ये जीवन क्रिकेट के छक्कों में शामिल है और चौंकों से लूट मचाने का घंघा कायम किये हुए है।
काव्य संग्रह मात्र धान का ही कटोरा नहीं है, समाज, संस्कृति, और आजादी का भी यह कटोरा है। धान के कटोरा की प्रकृति को प्रारंभ के दस बिन्दुओं में समायोजित किया गया है  और डॉ. यदु की रचना पांपरिक भजन-गीत में सागर को गागर में ऐसे समाया है, महकाया है, जिसमें फिरदौस आदि के सुगंध निकलते हैं जो कम होते ही नहीं। गीत की पँक्तियाँ हैं -
एक्के को कहते वही एक है, जिसके हाथों जिनगानी।
दुक्की को समझो चांद-सूरज, करते जगत में उजियारी।
तिक्की को समझो तीनों घट की खास प्यारे ऐ ज्ञानी।
चक्की को समझो चार वेद हैं, पंजी पाँचों पद पहचान।
छक्की को समझो छ: शास्त्र, सत्ता सातों द्वीप जहान।
अ को समझो आठ खण्ड हैं, कालचक्र को पहचान।
नहले को समझो नौ गिरहे हैं, होते सुख-दुख के मेहमान।
दहले को समझो दसों इन्द्रियाँ, खास प्यारे ऐ ज्ञानी।
मैं कहता समझाय करो, विश्वास प्यारे ऐ ज्ञानी।
शून्य से नौ तक दस अंकों से अनंत संख्या बनती है। उसी तरह धान के कटोरा के बीज से उत्पन्न अनंत उत्पादन होते हैं। अनंत उपयोग भी होते हैं। इसके सभी संभावित बिंबों का दर्शन धान के कटोर में है। इसे बौद्ध मंत्र (नेपाल का) '' ओम मणी पद्मे हूँ '' से समझा जा सकता है। यदु जी के गीतों की भाषा सरल, सुरम्य तथा गेय है। गीतों को संगीतबद्ध कर गाया जा सकता है। क्योंकि गायक के गायन का सूत्र वाक्य है - साधना।
पाकिस्तानी गायिका रेशमा कहती हैं - '' सुर और लय ऐसी चीज है जो किसी भाषा या बाहरी आवाज की मोहताज नहीं है। उसे हर कोई समझ सकता है, बशर्ते। गायक या गायिका की लौ अल्ला से लगी हो। उसकी दुआएँ मालिक ने कबूल कर ली हों। सच्चे मन से गायी प्रार्थनाएँ सबसे बड़ी नेमत होती हैं। (रेशमा तनहाई का - प्रताप सिंह, इन्द्रप्रस्थ भारती, अप्रेल-जून 2014, पृ. 11) बशर्ते साधने वालों में अपनी औकात में आने की कूबत हो। यह जान-शान-आन-बान छत्तीसगढ़ में है ?

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