इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 नवंबर 2014

कब होबो सजोर

सुशील भाेले 
सुन संगी मोर, कब होबो सजोर
आंखी ले झांकत हे, आंसू के लोर ...

काला अच्छे दिन कहिथें, मन मोर गुनथे
तिड़ी - बिड़ी जिनगी ल, मोती कस चुनथे
किस्मत गरियार होगे, ते लेगे कोनो चोर ...

सरकार तो देथे, आनी - बानी के काम
बीच म कर देथे फेर, कोन हमला बेकाम
मुंह के कौंरा नंगाथे, देथे कनिहा ल टोर ...

रंग - रंग के गोठ होथे, रंग - रंग के बोल
आगे सुराज कहिके, पीटत रहिथें ढोल
फेर बरही दीया सुख के, कब होही अंजोर ...
पता : -
म.नं. 54 -191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर , टिकरापारा रायपुर [छ.ग.]
मोबा. नं. 08085305931, 9826992811

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