इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 22 नवंबर 2014

बेंगवा के टरर टरर

विटठल राम साहू ' निश्‍छल ' 

एक समे के बात ये, पानी नी गिरीस। अंकाल पर गे। सब कोती हाहाकार मचगे। सब ले जादा पानी म रहवइया जीव - जंतु मन के करलई होगे। एक ठन बेंगवा ल अपन भाई - बंधु के याहा तरहा दुख ल देख के रेहे नी गीस। ओ मन ल ये केवा ले उबारे बर इंद्र देवता मेर पानी मांगे बर जाये के बिचार करीस। एक कनिक दुरिहा गेय राहय त ओला एक ठन बिच्छी भेंट पारिस अउ पूछथे - बेंगवा भईया तैं लकर -लकर कांहा जावत हस गा?
बेंगवा अपन मन के बात बतईस। बिच्छी ह सुन के बड़ खुस होइस। किथे - भईया तैं तो बड़ा पुन्न के काम के बीड़ा उठाय हस। महू ल तोर संग ले चल, सायद मैं तो तोर काम आ सकव। बेंगवा ल भला का इतराज होतिस। बिच्छी घलो ओकर संग चलिस। आगू जा के उही होइस जउन अइसन मामला म होवत आवत हे। कोनो लोकहित के काम बर सहयोगी के कमी नइ राहय। जइसे आज - काल अन्ना हजारे ह देस ले भ्रस्टाचार ल मेंटाय बर अनसन करत हे। ओकर संग रामदेव बाबा जइसन लाखों लोगन मन खुद ले प्रेरित हो के ये आन्दोलन म सामिल होगे तइसे। बेंगवा अउ बिच्छी संग मंजूर, मधुमक्खी, भेड़िया, सेर, भालू, चीता सबो ये पुनीत काम म सामिल होगें।
जंगल, झाड़ी, नदी, पहाड़, घाटी छेरी - बेरी इंकर रस्ता रोके रहाय। फेर ये मन हांसत - हांसत सबे दुख ल तापत रात - दिन यात्रा चालू रहय। भूख - पियास थकान और मुसकील ल झेलत आगे बढ़ते गिन। काबर कि ये मन पर उपकार बर कमर कस ले रहीन। आखिर एक दिन इन्द्र देवता के महल के आगू म पहुंचगें। अपन जम्मों संगवारी मन ल येती - ओती लुकाय बर कहि दिस अउ बेंगवा ह महल के दुवारी म लगे घंटा ल टन - टन - बजा दिस।
- देख तो कोन आय हे ? इन्द्र ह एक झन हट्टा कट्टा अउ भीम करिया सेवक ल कहिथे। सेवक ह कपाट ल खोल के बाहिर अइस, त बेंगवा ह बड़ा आत्मविश्वास ले हुकुम दिस - जा के अपन मालिक ल बता दे, मंय धरती ले पानी के बाबत चरचा करे बर आय हाववं।
- अच्छा सरकार। दीन - हीन के भाव देखावत सेवक ह ओकर हंसी उड़इस। फेर अपन हांसी ल रोकत भीतरी कोती चल दिस।
ओकर गोठ ल सुनके इन्द्र घलो खलखला के हांस डारिस। इन्द्र देवता ह अपन बगइचा ले कालिया नाग ल बलईस अउ किथें - जस महल के दुआरी म तोर सुवादिस्ट भोजन बइठे हे।
कालिया शान म अंटियावत बेंगवा ल लीले बर अइस। ओतके बेरा झुंझकुर म लुकाय मंजूर हा कालिया ऊपर झपट्टा मार के ओकर कहानी खतम कर दिस। इन्द्र देवता घुस्सा म लाल - बाल होगे। मंजूर ल मारे बर जंगली कुकुर मन ल भेजिस। बिचारा कुकुर मन ल भालू, बेंदरा, कोलिहा मन मार डारथें। इन्द्र देवता ह अपन सेवक ल बड़ जबर तलवार धरा के भेजथे ओला बिच्छी ह डंक मार के घायल कर देथे। अपन गोड़ ल धर के उही मेरन चिचियावत गिर परथे। मधुमक्खी ह ओकर देंह भर ल चाब -चाब के ओकर बारा बजा देथे। ओकर हात ले तलवार फेंका जथे उही बेरा म सेर, भालू, चीता, कोलिहा मन ओकर ऊपर माछी सहीक झूम जथें। देखते - देखत उही मेर ओकर सरी अंग ल तिड़ी - बिड़ी कर देथे। इन्द्र देवता ह खतरनाक स्थिति ल देखके गुरु बृहस्पति मेर सुलाव मांगथे।
बृहस्पति महाराज समझाथे - कोनो महान उद्देस बर जाति, धरम अउ वर्ग के भेदभाव ल भुलाके जब कोई संगठन आगू आथे त ओकर पुकार ल दबाय नइ जा सकय मोर सुलाह हे के तैं समझौता कर ले।
इन्द्र देवता सलाह ल मान जथे। बेंगवा ल भीतरी म बलाथे चरचा के बाद इन्द्र देवता पानी बरसाय बर तियार हो जथे। बेंगवा खुसी म तुरते किथे - महाराज! मंय तो नानकीन जीव आंव। ये उपकार के बदला नी चुका सकंव, फेर जब भी तैं पानी बरसाबे मंय हर आभार माने बर नी भुलावंव।
ये किस्से तो जुग - जुग जुन्ना हे फेर आज घलो पानी गिरथे त बेंगवा टरर - टरर के भासा म इन्द्र देवता ल धन्यवाद देय बर नी भुलाय।
मौवाहारी,महासमुन्द [छ.ग.] 
www.gurturgoth.com से साभार

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें