इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 22 नवंबर 2014

ठोली बोली

किसान दीवान 

एक ठन गांव म नाऊ राहय। बड़ चतुरा अऊ चड़बांक। तइहा पइंत के कंथली आय। जाने ले तुंहरेच नी जाने ले तुंहरेच, गांव भर के हक - हुन्नर, मगनी, बरनी, छटठी, बरही अऊ कोनो घला चरझनियां बुता बर छड़ीदार राहय। घरो - घर नेवता जोहारे अऊ ओट्टिंट आघात  ले झारे - झार जेवन सपेटे। अक तहा घला झोंकावय। घर लेगय। ओकरो घर एक झन टूरा पिला होइस। त कोनो - कोनो ओलियांय। कइसे मर्दनिया तैं सबके घर नेवता खाथस, तोर टूरा के जस बर कब मांदी बलावत हस?
त नाऊ मेंछरा के ही - ही करय। नीते एती ओती बहका के बेंझा देवय। बहू कतेक दिन पूरही ओखी - खोखी सब बसनागे। ठोली - बोलीस से धे धरलिस। मने मन गुसियावय अऊ तरमरावत कुछु उदीम भंजावय। बियाकुल मन हा तौंरत राहय। ठोली बोली कइसे रोके जाय ? कभू बगिया के कुछू ठोसरा देवय त ओमन जरे म नून डारे कस काहंय - अरे ठाकुर अइसने ठट़ठा करत रेहेंव ? बिधुन होके उदीम करे के सेती, रद्दा पागीस।
दूसर दिन ले जौनों हर छटठी  भात बर ठोलियावय, नाऊ काहय - भईगे ये दे ओदे नेवता खवाहूं एक दिन नेवता खवाय के दिन घला जोंग दीस। ओ दिन हर तीन दिन बांचे राहय। तसने गांव के घरोघर ले रांधे पसाय के कराही, घघरा, हंउला, बटकी, भाड़ा थारी लोटा मांगिस। तुंही मन खाहू दऊ हो। दई मई हो। ताहन लान देहूं। नाऊ घर नेवता खाय के लालच म जौन मांगिस, घरोघर दीन।
रात होईस ताहन सबे बर्तन भांड़ा ला बोरा म भरके, छकड़ागाड़ी म लाद के सहर गीस। सब ला बेंचिस अऊ आनी बानी के साग - दार तेल, घी, सक्कर, गुर, बिसा के लानिस। छकड़ा भर खार पीये के जिनिस देख के सबे गांव वाला मन पनछाय धर लिन कब चूरय त कब सपेटन। दिन - रात जेहू - तेहू भिड़ गिन रांधे बर अइरसा, सुंहारी, करी लाड़ू, तसमई, जलेबी, जुर मिल रांधिन। दूसर दिन नेवता झारेझार रिहिस।
नाऊ घर के नेवता माहरे माहर होगे। सबे मगन राहंय। अपन थारी लोटा के चेत भुलागे। जुर मिलके पोरसिन अऊ मेंछरा - मेंछरा के मांदी पंगत खईन। दोना - पतरी अऊ ठेंकवा चुकिया म जेवन पानल देवत रांहय। नाऊ हर पंखा धर के ओरी - ओर बइठे पंगत मन ला हावा धूंकत राहय। खवइया मन नाऊ के जस - गुन गावत राहंय। जेन काहय वाह भई मर्दर्निया, तगड़ा नेवता खवाय जी तेहा नाऊ काहय - तुंहरे अन्न, तुंहरे पुन्न, मोर तो हावा च हावा।
सुनइया मन ओकरो मजा लेंवय नेवता हिकारी निपट गीस। दूसर दिन सब झिन अपन थारी लोटा ला मांगिन त नाऊ कथे। तुंहला तो बता देय हो जी, उही मेर तुंहरे अन्न, तुंहरे पुन्न, मोर तो हावाच हावा। सुन्नेच सुन्न। कहिके सबे झन मूंड ठठाईन उही दिन ले हाना बनगिस - तुंहरे अन्न, तुंहरे पुन्न। मोर तो सुन्ने - सुन्न।
पता :- 
नर्रा  बागबाहरा,महासमुन्द [छ.ग.]
www.gurturgoth.com से साभार 

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