इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 22 नवंबर 2014

भारतीय सिनेमा और दलित: जादुई संसार का कटु यथार्थ

डॉ. मुकेश कुमार मिरोठा

आज सिनेमा मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम है। शिक्षित शहरी वर्ग से लेकर ग्रामीण वर्ग, कामगार से लेकर मालिक तक सभी लोग इसे कमोबेश पंसद करते है। सिनेमा दृश्य-श्रव्य माध्यम होने के कारण प्रभावी भूमिका निभा पाने में सक्षम है। कल्पना और यथार्थ के क्षीण पर्दे को अपने मध्य पाकर लोग मुग्ध होते है, और वास्तविकता से मनोरंजन की तरफ धावित होते हैं। सिनेमा का मूल चरित्र भी यही है। सिनेमा भी कथा कहने का एक माध्यम है। भारत में कथा कहने और सुनने की एक सनातन परम्परा रही है। आधुनिक युगीन परिदृश्य में कथा आज भी जिन्दा है और लोगों की मानसिकता को प्रभावित कर रही है। प्राचीन कथा रुपकों को तकनीक के साथ मिलाकर सिनेमा अस्तित्व में आया है। हालांकि वर्तमान सिनेमा का क्षेत्र व्यापक एवं विस्तृत नजर आता है, मगर कथा के क्षेत्र में अभी भी वह आदिकालीन युग में जीता हुआ दिखता है। सिनेमा के आविष्कार के समय तक भारत लगभग प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था, किंतु सिनेमा के क्षेत्र में आज वही भारत सर्वोपरि भूमिका में है। भारत को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान देने के वैश्विक परिदृश्य में सिनेमा के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। नेता, अभिनेता और क्रिकेटर को सर्वाधिक पसंद करने वाले वर्ग में भी अभिनेता ही सर्वोच्च पायदान पर दिखता है। सिनेमा की लोकप्रियता का एक कारण उसकी जगमगाती, चमकती दुनिया भी है। लेकिन इस जगमग के पीछे की काली, रहस्यपूर्ण, मायावी संसार की हकीकत को बहुत कम लोग जान पाते है। भारत जैसे सांस्कृतिक विविधताओं वाले देश में तो यह कार्य और भी मुश्किल दिखता है। एक कहावत है कि बूंद - बूंद से घड़ा भरता है। ऐसी ही कई बूंदों से मिलकर भारतीय सिनेमा ने अपने को वर्तमान रूप में ढाला है। आज इसका स्वयं का एक तंत्र है, विकसित उद्योग है, संस्थान है और वह कला एवं  संस्कृति के अनेक सवालों के घेरे से घिरा होकर भी निरंतर प्रगति पथ पर चालित है। आज सिनेमा अनेक विरोधाभासों में रहकर भी अपनी मायथोलॉजी गढ़ने में कामयाब हो गया है। मशहूर सिनेमा-आलोचक जय प्रकाश चौकसे इस संदर्भ में लिखते है - ''भारतीय सामूहिक अवचेतन में सिनेमा मायथोलॉजी की तरह जम गया है और इसने अपनी मायथोलॉजी और मिथ भी गढ़ी है। भारत की तमाम विसंगतियां और विरोधाभास भारतीय सिनेमा में भी अभिव्यक्त हुए है ''।1 इस कथन के आलोक में हम कह सकते हैं कि भारतीय सिनेमा ने समाज को गहराई तक प्रभावित किया है। फिर भी कुछ अन्तर्विरोध उसके साथ जुड़े हुए है, जो उसकी सम्यक् पक्षधरता पर सवाल खड़े करते है। समाज हित, समाज को सार्थक संदेश देने वाली एवं उचित मार्गदर्शन करने वाली फिल्में लगभग अदृश्य है और विशुद्ध मनोरंजन और व्यावसायिकता का जिन्न सिनेमा पर हावी है। अब सिनेमा का मुख्य ध्येय पैसा कमाना रह गया है, अत: सामायिक मुद्दे वहाँ गौण है। दलित, किसान-मजदूर, स्त्री, अल्पसंख्यक, आदिवासी एवं अन्य हाशिए का समाज उसके कैमरे की जद में नहीं आ पाया है। यहाँ सिनेमाई कला इनसे दूर भागती नजर आती है। उक्त वर्ग का तथ्यपरक एवं यथार्थपरक चित्रांकन न कर पाना भारतीय सिनेमा की कमजोरी कहा जा सकता है। सैद्धान्तिक स्तर पर इसे सिनेमा के लिए चुनौती भी मानी जा सकती है। आज सामाजिक मूल्यों की स्थापना के स्थान पर बाजार-संचालित मूल्य सिनेमा के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए है। साहित्य,संगीत एवं कला से दूर रखा गया उक्त वर्ग आज भी इन क्षेत्रों में उपेक्षित है। इसलिए भारतीय समाज का आईना कहलाए जाने का हक सिनेमा को नहीं दिया जा सकता है। एक दलित के लिए सिनेमा की दुनिया आज भी दिवास्वप्न ही है।
स्वतंत्रता पश्चात् भारत में बदलाव की आंधी दिखती है, जो आम से लेकर खास तक लगभग सबको बदलती चली जाती है। भारतीय समाज में सदियों से उपेक्षित, अपमानित, तिरस्कृत दलित समाज भी बदलाव की बयार में स्वयं को सम्मान देने की भावना के साथ उठ खड़ा होता है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर की चेतना दृष्टि का आधार लेकर दलित वर्ग प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने लगे। भारतीय समाज में एक तरह की क्रांति होने लगी और दलित अपने हक के लिए आवाज उठाने लगा। उनकी इस क्रांति में साहित्य ने भी बखूबी साथ दिया। यहाँ पर दलित साहित्य ने अपनी उपयोगिता और सार्थकता का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया। आंदोलन की तीव्रता के साथ-साथ दलित चेतना भी निरंतर विकसित होती चली गई। राजनीति एवं साहित्य पर उसका सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। सत्ता प्राप्ति एवं नीति नियामक तत्व होने के कारण राजनीति पर नियंत्रण एवं हिस्सेदारी की आवश्यकता महसूस करके दलितों ने राजनीतिक क्षेत्र में अपना परचम लहरा दिया। डॉ. अम्बेडकर से प्रारंभ हुई चेतना तमाम वर्चस्ववादी ताकतों के साथ मुकाबला करती हुई वर्तमान मजबूत स्तम्भ का आकार ले पाने में सक्षम हो गई है। 25 सितम्बर 1920 को दिए गए अपने एक भाषण में डॉ. अम्बेडकर नए रास्ते बनाने की बात भी करते है- ''गन्दे रीति-रिवाज़, अंधविश्वास छोड़कर शिक्षा-दीक्षा के मार्ग में आने वाले संकटों को हटाकर नए रास्ते बनाओ। हम सब मिल-जुलकर अपने लक्ष्य के शिखर तक पहुँचे। यही हमारी विनती है। इस नए रास्ते के निर्माण में डॉ. अम्बेडकर शिक्षा-दीक्षा एवं एकता को दलितों के लिए आवश्यक अंग के रूप में उद्धृत करते हैं। वस्तुत: इन दोनों की सम्मिलित ताकत ही समानता के पथ को प्राप्त करने में सहायक हो सकती है। राजनीति में दलितों की बढ़ती पैठ उनकी चेतना का प्रत्यक्ष एवं ज्वलंत प्रमाण है।
महाराष्ट्र में दलित आंदोलन की सफलता ने पूरे भारत में जनव्यापी आंदोलन को नींव प्रदान की। महाराष्ट्र की पावन धरा से निकलकर यह पूरे भारतीय परिदृश्य में विस्तारित होने लगा। वर्षों से तिरस्कार की पीड़ा भोग रहा दलित समाज अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के माध्यम तलाश करने लगा। राजनीति के बाद उसकी पीड़ा की सर्वाधिक अभिव्यक्ति साहित्य के माध्यम से हुई। स्वतंत्रता के बाद की राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं ने अनेक विमर्शों को जन्म दिया। इनमें सर्वाधिक संघर्षमयी एवं तीक्ष्ण आवाज के साथ दलित विमर्श चर्चा में रहा है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डे दलित विमर्श की स्वीकृति के संबंध में लिखते है- ''हिन्दी साहित्य में इसी समय तीन विमर्श प्रमुखता से चर्चा के केन्द्र में आए। उत्तर आधुनिकतावादी विमर्श, नारीवादी विमर्श और दलित विमर्श। सर्वाधिक संघर्ष दलित अस्मिता को स्वीकृति प्राप्त करने के लिए करना पड़ा। '' 3 वस्तुत: सवर्णवादी मानसिकता की षड्यंत्रकारी नीतियों के कारण दलित साहित्य को अनेक कृत्रिम प्रतिमानों एवं तथाकथित मानकीकरणों से जूझना पड़ा। प्रतिगामी शक्तियों के बावजूद अपनी प्रखर वाणी, समानता के पक्षधर, उग्र विचारों की शंृखला, पीड़ा की यथार्थ अभिव्यक्ति, विद्वेष की अनुभूति, आक्रोश भरा स्वर एवं तमाम तरह के सौंदर्यशास्त्री प्रतिमानों की धज्जियाँ उड़ाने की ताकत के कारण दलित साहित्य अपना प्रचार-प्रसार एवं विकास करने में सफल रहा। निरंतर बढ़ती दलित चेतना ने भी इसे सहयोग दिया है। विद्रोही भावों की अभिव्यक्ति पर तमाम तरह की प्रतिक्रियाओं के बावजूद दलित साहित्य ने दलित आंदोलन को स्थिर, मजबूत एवं दीर्घगामी बनाने का रास्ता प्रशस्त किया है। सामान्य वर्गों को अपनी पीड़ा का अहसास दिलाना एवं उनसे सामाजिक प्रतिबद्धता को स्वीकार कराना दलित साहित्य का उद्देश्य है। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह निरंतर गतिशील, सृजनशील एवं संघर्षरत है। इस संघर्ष में अनेक नवीन क्षेत्रों की तरफ  भी उसका ध्यान है। संगीत, कला एवं सिनेमा ऐसे ही क्षेत्र है।
सिनेमा इस युग का अविस्मरणीय एवं आश्चर्यचकित कर देने वाला आविष्कार माना जा सकता है। सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन की त्रयी युक्त मीडिया के एक सशक्त अंग के रूप में आज सिनेमा जाना जाता है। वस्तुत: साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है तो सिनेमा को हम उसकी प्रतिच्छाया मान सकते हैं। सिनेमा का इतिहास जितना गौरवशाली एवं सांस्कृतिक विविधता युक्त माना जाता है, उतना ही समाज के उपेक्षित तबकों से दूर रहने की उसकी एक पहचान है। अधिकांशत: सिनेमा ने अपनी 'आर्ट' (कला- फिल्म) शैली का प्रयोग करते हुए इस कमी को दूर करने की कोशिश की है। आज भारतीय सिनेमा देश में ही नहीं विश्व में भी अपनी अलग भाव-भूमि एवं रचनात्मकता के कारण पहचाना जाने लगा है। लगभग सभी तरह के पुरातन-आधुनिक विषय उसकी अर्न्तदृष्टि में निहित रहते हैं। व्यक्ति, परिवार, समाज एवं देश-विदेश के मुद्दों के अलावा ब्रह्माण्ड, विज्ञान फंतासी एवं कल्पना लोक के सम्मिश्रण से सिनेमा बहुआयामी नजर आता है। आज सिनेमा एक उद्योग के रूप में भी आर्थिक, व्यावसायिक पहचान एवं उपयोगिता सिद्ध कर रहा है।
वस्तुत: प्रारंभ से ही सिनेमा के बारे में दो तरह की धारणाएँ मिलती है। विनोद दास इस बारे में अपनी राय रखते हुए लिखते है- ''सिनेमा के बारे में दो तरह की धारणाएँ मौजूद हैं। सिनेमा को जो केवल मनोरंजन का साधन समझते हैं, उनकी दृष्टि में फिल्म देखने का मुख प्रयोजन पर्दे पर दिखाए गए दृश्यों का आनन्द उठाते हुए कुछ समय के लिए जीवन की आपाधापी और तकलीफों - तनावों से मुक्त भर होना है। इसके बरक्स एक ऐसी भी धारणा है जो सिनेमा को मनोरंजन के साथ सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की भी पक्षधर है।'' 4 हम देखते भी हैं कि सिनेमा ने मनोरंजन को महत्वपूर्ण मानकर सामाजिक मुद्दों में भी मनोरंजनात्मक तत्वों को ज्यादा जगह दे दी है। सिनेमा के ऐसे प्रयास उसे अगंभीर, यथार्थ से दूर एवं हास्यास्पद बना देते है। इसे विडम्बना ही कह सकते है कि सम-सामयिक सवालों, मुद्दों को अपने तरीके से पेश करने वाले भारतीय सिनेमा ने अपने चित्रफलक पर दलितों को केन्द्रित रखने में सावधानी बरती है। दलितों एवं दलित मुद्दों को विशुद्ध पूँजी पर चलने वाले सिनेमा उद्योग ने भी अस्पृश्य मानकर मुख्य धारा के सिनेमा से दूर ही रखा है। आज तथाकथित मुख्य धारा का सिनेमा भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि अस्पृश्य मानने की उसकी नीति एवं दलित समाज का व्यापक एवं यथार्थ चित्रण करने में की गई कंजूसी उसकी 'भारतीयता' को कटघरे में खड़ा करती है। केवल दलित ही नहीं, समाज का अन्य उपेक्षित वर्ग भी उसके 'फ्रेम' में नहीं दिखते है। सिनेमा की इस चमक-दमक एवं घोर व्यावसायिक ताकत के कारणस्वरूप हम अपने समाज के स्वरूप को उचित रूप से नहीं दर्शा पा रहे है। वस्तुत: भारतीय समाज का उत्पीड़ित, अपमानित, शोषित, हाशिए का समाज, अल्पसंख्यक, महिला, आदिवासी, दलित वर्ग अभी भी उसकी 'रेंज' से बाहर नजर आता है। उसकी 'रील' में 'रियल' लाइफ  अपनी 'स्पेस' खोती जा रही है। भारतीय समाज का इतना बड़ा वर्ग आज भी उसके केन्द्र में नहीं है। अगर कहीं छिटपुट दृश्यों में मिलता भी है तो उसका उद्देश्य केवल लाभ कमाना ही होता है। अत: जब तक यह तबका सिनेमा में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं कर लेगा, भारतीय सिनेमा का स्वरूप अधुरी ही माना जाएगा।
दलितों ने लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ऊर्जा का सकारात्मक एवं सफल प्रयोग किया है। सिनेमा भी आज उसकी प्राथमिकताओं में से एक है। अधिकतर कलाओं का आविष्कार संस्कृति की जीवन्तता को बनाए रखने एवं मनुष्य की रचनात्मक प्रतिभा का प्रस्फुटन होने की वजह से हुआ है। कलाओं के केन्द्र में भी मनुष्य ही प्राथमिकता पाता है, मगर यहाँ प्रश्न यह है कि वह मनुष्य कौन है? उच्च, सम्पन्न या निम्न, दमित मनुष्य उसके केन्द्र में हो, इसके जवाब में कलाएँ भी मौन हो जाती है। कला और थियेटर के संबंध में मशहूर लेखक बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ने लिखा है- ''कला यथार्थ के समक्ष रखा जाने वाला कोई आईना नहीं है, बल्कि एक हथौड़ा है जिससे कि यथार्थ को रूप दिया जाए।' 5 संवेदना प्रधान प्रारंभ के बावजूद कालांतर में कलाएँ अपने मकसद से दूर कर दी गई। दलितों के प्रति यह सुनियोजित षडयंत्र माना जा सकता है, क्योंकि आज कई कलाओं में दलितों का कोई सानी नहीं है। जैसे घरेलू उद्योग धन्धों की जगह बड़े-बड़े कारखानों के निर्माण द्वारा दलितों की रोजी-रोटी पर खतरा उत्पन्न कर दिया गया। वैसे ही तथाकथित 'नृत्य', 'संगीत' एवं अन्य उच्च वर्ण आधारित कलाओं को तवज्जो देकर दलितों की हस्त एवं पारम्परिक कलाओं को उपेक्षित बना दिया गया है। अब दलित चेतना की क्रांति के कारण दलितो ने इनके प्रति भी रक्षात्मक रवैया अपना लिया है। रक्षात्मक का तात्पर्य यहाँ कलाओं के सरंक्षण मात्र से है। इसके साथ ही वे इन कलाओं में अपनी बौद्धिक ताकत के द्वारा और अधिक 'स्पेस' का निर्माण करते जा रहे है। वस्तुत: आज कलाओं का कोई भी क्षेत्र दलित चेतना से ज्यादा दूर नहीं है। भारतीय सिनेमा के उदाहरण द्वारा हम इस बात को समझ सकते हैं। भारतीय सिनेमा का एक पक्ष विशुद्ध मनोरंजन एवं कल्पना की भाव सृष्टि पर आधृत होता है। अब तक का अधिकतर सिनेमा इस रूप में खरा भी उतरा है। यथार्थ से विलग उसके नायक-नायिकाएँ किसी स्वप्नलोक के रहस्यमयी पात्र लगते हैं। कुछ फिल्मकार तो इतने भव्य दृश्य फिल्माते है कि अचरज की अनुभूति होती है कि हम विकासशील औपनिवेशिक, मानव सूचकांक में निम्न भारत देश की फिल्म देख रहे हैं। इन फिल्मकारों की दृष्टि सच्चाई से इतनी दूर है कि उन्हें बारिश में भीगती युवती, हिंसा का अतिरेक, फूहड़ दृश्य, भाषिक अत्याचार आदि का फिल्मांकन करने में विशेष आनंद मिलता है। जमीनी हकीकत से बचने के लिए इसे वे नए तरह की प्रयोगशीलता के छद्म आवरण से ढँकने का असफल प्रयास भी करते हैं। भारतीय सिनेमा इस तरह के 'विचारशून्य,संवेदनहीन 'शोमेनों' से भरा पड़ा है। साम्राज्यवादी, पूंजीवादी नीति के पोषक इन लोगों को अपनी नाक के नीचे स्पॉट ब्यॉएज, तकनीकी कलाकारों, चरित्र कलाकारों एवं अन्य सहायकों  का शोषण एवं दर्द नहीं दिखता है। कई तरह के एवं लम्बे-लम्बे शेड्यूल होने के कारण इनकी जिंदगी बद से बदतर होती चली जाती है। दुर्घटनाएं, बीमारियां एवं आर्थिक मजदूरी इनकी जिंदगी की फिल्म के स्थायी दृश्य बन जाते हैं। दैनिक वेतनभोगी होने एवं कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण वे काम भी नहीं छोड़ पाते हैं। इसका एक  उदाहरण हम उनकी असामयिक मृत्यु या दुर्घटना से ले सकते हैं। अनेक स्टंट  मैन (बॉडी डबल) डायरेक्टर एवं अन्य साथी कलाकार 'सेट' पर भी दुर्घटना के शिकार हो जाते है। इनके लिए किसी तरह की सहायता या भविष्य निधि जैसी बुनियादी बातें दुर्लभ है। अत: सपनों के सौदागरों के साथ-साथ वास्तविक जीवन के कामगारों की तुलना बेमानी है। जहाँ एक तरफ ऐसे व्यक्ति करोड़ो,अरबों कमाते है, वहीं दूसरी तरफ उसी फिल्म का एक सहायक (जूनियर आर्टिस्ट) दो जून की रोटी के लिए भी संघर्ष करता है। ऐसे सहायकों में भीअगर कोई दलित हो तो यह उसके लिए दोहरे अभिशाप से कम नहीं है। सिनेमाई चमक एवं सुंदरता की चकाचौंध के मध्य उसकी जिंदगी मात्र शून्य बनकर रह जाती है।
भारतीय सिनेमा में जब तक भारत के बहुसंख्यक दलित समुदाय का उचित प्रतिनिधित्व एवं यथार्थ आधारित फिल्मांकन नहीं होगा, तब तक भारतीय सिनेमा सच्चे अर्थों में भारतीय नहीं कहा जाना चाहिए। यहाँ अधिकतर एकसवाल उठाया जाता है कि सिनेमा नितांत व्यक्तिगत एवं निजी प्रापर्टी है, अत: निर्माता अपनी मर्जी से, स्वतंत्रता से विषय का चुनाव कर सकता है। किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रिलीज होने के बाद से फिल्म दर्शकों की सार्वजनिक जिंदगी का हिस्सा हो जाती है। एक बड़ा वर्ग फिल्मों से प्रभावित होता है और उसका अनुसरण भी करता है। अत: लाभ की इच्छा रखने वाले निर्माता को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ-साथ नैतिक जिम्मेदारी का पालन भी करना चाहिए। हकीकत आधारित कार्य करने से सिनेमा भारतीयों को एक नयी दिशा दे सकता है। ऐसी कई फिल्मों ने सफलता के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय सिनेमा को नई पहचान दी है। अछूत कन्या, सत्यकाम, लगान, आरक्षण, स्लमडॉग मिलेनियर, एकलव्य, शूद्र-द राइजिंग, सद्गति, कागज के फूल, उपकार, औरत, अंकुर, पार, सुजाता, गंगा जमुना, दीक्षा, बूट पॉलिश, समर, दामुल, रुदाली, रामचंद पाकिस्तानी आदि कई फिल्में प्रत्यक्ष प्रमाण है कि दलित मुद्दों पर आधारित फिल्में भी चेतना के साथ-साथ व्यावसायिक रूप से भी सफल हो सकती है। किन्तु जहाँ पैसा कमाना ही मुख्य एवं एकमात्र ध्येय हो, वहाँ दलित मुद्दे भी आर्थिक नजर से ही देखे जाऐंगे। निर्माताओं की ऐसी सोच का हमें प्रतिकार करना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ  इनसे इतर आनंद पटवर्धन जैसे फिल्मकार नयी चेतना के नवीन फिल्मकार के रूप में एक अलग परम्परा विकसित कर रहे हैं। इस नयी चेतना के केन्द्र में 'दलित' है।
सिनेमा आज हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग बनता जा रहा है। मेट्रोपॉलिटन, कॉस्मोपोलिटन शहरों से निकलकर अब यह भारत के सुदूर ग्रामीण अंचलों तक अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा है। देश-विदेश में उसकी पहचान निरंतर बढ़ती जा रही है। मगर ऐसा लगता है कि आधुनिक विस्तारवादी सिनेमा अपनी वास्तविकता से दूर होता जा रहा है। वैसे भी सिनेमा में जब तक आप अपनी स्थानीयता को जगह नहीं देंगे, आपकी वैश्विक पहचान अधूरी एवं अपूर्ण ही मानी जाएगी। समाज एवं मनुष्य के व्यवहारों में हो रहा बदलाव सिनेमा के विभिन्न दृश्यों में दिखता है किन्तु यह मनुष्य और समाज किस वर्ग से आता है? यह प्रश्न अपनी जगह आज भी विद्यमान है। पूंजी आधारित सोच, व्यापारिक विस्तारवाद एवं मनुष्य की संवेदना को क्षीण करने की वजह से सिनेमा गंभीरता का पर्याय नहीं माना जाता है। आज भी वह अनेक रूढ़ियों से ग्रस्त है। रूढ़िपरक फिल्मकारों के संदर्भ में विधि विग्रह लिखती है- ''जैसे काव्य-रूढ़ियाँ होती है, वैसे ही फिल्म रूढ़ियां भी है, जिनसे बड़े-बड़े फिल्मकार मुक्त नहीं हो पाते।' 6 विधि यहाँ पर भारतीय सिनेमा की परम्परागत सेाच एवं रूढ़िग्रस्त मानसिकता का खुलासा करती है। भारतीय सिनेमा की इन कमियों की तरफ कोई संकेत भी नहीं करना चाहता क्योंकि पूंजी का खेल सबको नाचने पर मजबूर कर देता है। हाल में ही सेंसर बोर्ड के डायरेक्टर की गिरफ्तारी से यह बात पुख्ता भी हो जाती है। उन्हें चुप करने एवं फिल्म को पास कराने के लिए दिए गए अनेक प्रलोभन सिनेमा के स्तर को प्रभावित करता है। सवाल यही है कि क्या सिनेमा में इस तरह का खेल चलता रहेगा, क्या यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि हम उसे हकीकत से रूबरू कराएं। अगर राजनीति एवं साहित्य के स्तर पर दलित समाज का हस्तक्षेप सफल हो सकता है तो सिनेमा में भी दलित चेतना कारगर सिद्ध हो सकती है। जरूरत बस एक ताजा हवा के झोंके के साथ चिंगारी की है।
हम कह सकते हैं कि भारतीय सिनेमा आज जितना लोकप्रिय है, उतना ही सामाजिकता से दूर। सिनेमा के प्रत्येक अंश से दलित गायब है। अगर वह कहीं-कहीं है भी तो नौकर, माली, ड्राइवर, मोची या विकलांग रूप में। लगान फिल्म के दलित पात्र की तरह वह केवल 'कचरा' मात्र हैं। फिल्मों में वह रिक्त स्थानों की तरह खंडित-खंडित मिलता है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व या समुचित विकास नहीं मिलता है। इसके बावजूद अगर हम भारतीय सिनेमा को 'भारतीय' कहते हैं तो उसकी समग्रता में अपूर्णता का बोध होना चाहिए। वस्तुत: भारतीय सिनेमा में दलितों का स्थान सीमित है और उनके मुद्दों का अब तक केवल सतही अंकन हुआ है। भारतीय सिनेमा को अपने इस मिथक का सामना करके उसे तोड़ना होगा। भारतीय सिनेमा एक ऐसा समवाय बने जो दलित चेतना और उसके समग्र विकास को मुख्यधारा में स्थान दिलाएँं। अब जरूरत मनोरंजनात्मकता के साथ-साथ समाजशास्त्रीय दृष्टि पर भी गंभीरता से विचार करने की भी है। अंत में मैं सिनेमा एवं दलितों के मध्य नए रिश्तों की बात करता हुआ कहना चाहता हूँ  -
''शिकवा रहे, कोई गिला रहे हमसे,
आरजु एक सिलसिला रहे हमसे।
फासले हो, दूरियाँ हो, खता हो कोई
दुआ है बस नजदीकियाँ रहे हमसे।।''

:- संदर्भ  :- 
1. सिनेमा और सिनेमा वाले, जयप्रकाश चौकसे, बोधि प्रकाशन, संस्करण 2013, जयपुर, पृ.सं.04.
2. दलित क्रांति का साहित्य ;सं. श्योराज सिंह बैचेन, संगीता प्रकाशन दिल्ली, संस्करण 2002, पृ. सं. 89
3. इन्द्रप्रस्थ भारती ;पत्रिका डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डे का लेख, हिन्दी अकादमी, नई दिल्ली, जुलाई-दिसम्बर अंक 2008, पृ. सं. 57
4. नया पथ ;पत्रिका विनोद दास का लेख, जनवरी-जून 2012 अंक, नई दिल्ली, पृ. सं. 206
5. नांदीपाठ ;पत्रिका (सं.) कात्यायनी/सत्यम, अंक- लखनऊ, अप्रैल-जून 2013, पृ. सं. 68
6. समय माजरा ;पत्रिका ;सं हेतु भारद्वाज, विधि विग्रह का लेख, जयपुर अंक- सितम्बर-अक्टूबर, 2006, पृ. सं. 104
 
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