इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 22 नवंबर 2014

पहले दिल में

डां. कृष्‍णकुमार सिंह ' मयंक '
 
पहले दिल में आग लगाई
फिर नैनों में जल भर लाई
$खुद औरों से माँग रहे हैं,
अब इस युग के हातिमताई
तू तो सुख का आदी है,
तू क्या जाने पीर पराई
हार मेरी पहले से तय थी
सच्चाई ने मुँह की खाई
अब तो घर ही में दुश्मन है,
कैसा भाई, किसका भाई।
हाँ, पहले होती थी, लेकिन,
आज कहाँ है पन्ना दाई।
क्या मयंक सरहद पर जाकर,
किसी नेता ने जान गंवाई।

गज़ल - 5/597, विकास खण्ड
गोमती नगर, लखनऊ - 226010
मो. 09415418569

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