इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 22 नवंबर 2014

कुहरा छाया है

राजेन्‍द्र चौहान 

कुहरा छाया है
बूढ़े बरगद पर
छाया है
पूरी बस्ती पर छाया है
कुहरा छाया है।

झुनिया ने था
रखा थान पर
जो छोटा दियरा
चिरता कितना
उससे तम का
पाथर - सा हियरा
टूटे छप्पर पर छाया है
सूने आँगन में छाया है
कुहरा छाया है।

राजपथों पर तो
दीपों की
मालाएँ होंगी
अंधकार से अनजानी
मधुशालाएं होंगी
धूसर पगडंडी पर लेकिन
गिद्धों के पंखों - सा काला
कुहरा छाया है।

शीश - महल में
देख रहे जो
महफिल का मुजरा
नहीं पूछते
इस रधिया से
दिन कैसे गुजरा
भारी पलकों पर छाया है
धँसती आँखों पर छाया है
कुहरा छाया है।


पता - 
बी 226 राजनगर,
पालम , नई दिल्ली 110077

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