इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 22 नवंबर 2014

दिल्‍ली काे पूर्ण राज्‍य का दर्जा मिले : मनीष सिसोदिया

आम आदमी पार्टी के महत्‍वपूर्ण नेता मनीष सिसोदिया से डॉ. संजीत कुमार की बातचीत 

 
मनीष सिसोदिया के साथ विचार वीथी के कार्यकारी संपादक डॉ. संजीत कुमार
डॉ. संजीत: सबसे पहले बात कर लेते हैं कि दिल्ली में चुनाव आने वाले हैं। सभी पार्टियां चुनाव में जा रही हैं। आम आदमी का प्रदर्शन कैसा रहने की संभावना है?
मनीष सिसोदिया : पिछली बार न्यू पार्टी सिंड्रोम बहुत काम कर रहा था। मीडिया बार - बार प्रोजेक्ट कर रहा था कि नई पार्टी है। चार - पॉच सीटे मिल जाए तो बहुत है। इससे पार्टी का काफी नुकसान हुआ। मीडिया के लोग एक लाईन पकड़कर कहने लगे, नई पार्टी है, वोट ही काटेगी इससे नुकसान हुआ। वह इस बार नहीं होगा। 49 दिन की सरकार में हमने दिखाया कि किस तरह से मंहगाई कम हो सकती है, रिश्वतखोरी कम हो सकती है, बिजली सस्ती हो सकती है, प्राईवेट स्कूल भी कंट्रोल हो सकते हैं। ये सब बातें हमारे पक्ष में जाएगीं।
डॉ.संजीत : पिछली बार आप की सीधी लड़ाई कांग्रेस से थी और इस बार बीजेपी से है। क्या इस कारण आपकी रणनीति भी बदलेगी?
मनीष सिसोदिया: ऐसा नहीं हैं। हम कांग्रेस को ही टारगेट कर रहें थे , आपने देखा होगा, हम शीला दीक्षित को टारगेट कर रहे थे तो विजय गोयल को भी। कुल मिलाकर हमारा दुश्मन न तो कांग्रेस है न भाजपा। हमारा दुश्मन तो भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार के कारण हो रही समस्याएं है। भ्रष्टाचार कांग्रेस में भी था तो भाजपा की एम.सी.डी. और केन्द्र की सरकार में भी है । जे.पी. नड्डा जैसे लोगो को हेल्थ मिनिस्टर बनाया गया है। संजीव चुतर्वेदी जैसे ईमानदार अधिकारियों को हषवर्धन जैसे मंत्री हटा रहे है। शीला दीक्षित 5 हजार की इस्ट्रीट लाईट को 27 हजार में खरीद रही थी। भाजपा नगर निगम में 32 हजार में खरीद रही है। ये सारी चीजे हम जनता के सामने रखेगें।
डॉ. संजीत: इसका अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार आपका मुख्य ऐजेण्डा है?
मनीष सिसोदिया: भ्रष्टाचार और मंहगाई लोगों के जीवन को इन दोनों ने बहुत प्रभावित किया है।
डॉ. संजीत : मैनें कहीं आपका साक्षात्कार देखा था, जब आप शिक्षा मंत्री बने थे। आपने कहा था कि लोगों की जिन्दगी आसान करेगें। क्या फार्मुला है आपके पास लोगों की जिन्दगी आसान करने का? 
मनीष सिसोदिया: आम आदमी ज्यादा कुछ नहीं चाहता।  आज स्कूल के एडमिशन में रिश्वत देनी पड़ती है। अस्पताल में बेड के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। नौकरी, व्यापार यहां तक कि दुकान खोलने तक के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। ये चीजे ठीक हो जाए तो लोगों की जिन्दगी थोड़ी आसान हो सकती हंै। ऐसा नहीं है कि लोग मेहनती नहीं हैं। वे मेहनत करने को तैयार हैं। सरकार लोगों की स्थितियां बेहतर कर के दे तो लोगों के जीवन में सुधार आ जाएगा।
डॉ. संजीत: आपने 49 दिन की सरकार में बिजली के बिल 50 प्रतिशत तक कम किए थे। पानी माफ  किया था। तो क्या इस बार भी ये सब करेगें?
मनीष सिसोदिया: फिर से वही करेगें और इस बीच तो ऑडिट रिर्पोट भी आ जाएगी। शायद फिर ऑडिट के हिसाब से होगा। ऑडिट में बहुत सा भ्रष्टाचार सामने आ रहा है।
डॉ. संजीत: अगर बिजली कंपनियां दागी निकलती है तो सरकार क्या कारवाई करेगी?
मनीष सिसोदिया: इनके खिलाफ  कार्रवाई करेगी और बिजली अपने आप सस्ती हो जाएगी।
डॉ. संजीत: क्या इनके लाइसेंस कैंसल हो सकते हैं?
मनीष सिसोदिया: हाँ, इनके लाइसेंस कैंसल हो सकते है, और ऐसा नहीं है कि सभी प्राईवेट कंपनियां भ्रष्ट हैं। देश में ईमानदार कंपनियां भी हंै। वो तो नेता इनसे रिश्वत लेते हैं। अगर नेता इनसे रिश्वत लेना बंद कर दें तो ये कंपनियां भी ईमानदारी से काम करने को बाध्य हो सकती हैं।
डॉ. संजीत: आम आदमी पार्टी की 49 दिन की सरकार की मुख्य उपलाब्धियां क्या बताना चाहेंगे?
मनीष सिसोदिया: सबसे बड़ा काम था पूरी दिल्ली के सरकारी विभागों में रिश्वतखोरी बंद हो गई थी। दिल्ली पुलिस और दिल्ली नगर निगम जैसे विभागों में भी रिश्वत बंद हो गई थी। लोग कहते थे कि भ्रष्टाचार लोगों की नसों में समा गया है इसे रोका नहीं जा सकता। हमारी पार्टी ने ये करके दिखाया। लोग कहते हंै कि मंहगाई एक बार बढ़ गई तो कम नहीं हो सकती। हमने कम करके दिखाया। हमने बिजली पानी के बिल कम करके दिखाए, प्राईवेट स्कूलों को कंट्रोल किया, सरकारी विद्यालयों का स्तर सुधारा, प्राईवेट स्केलों में डोनेशन प्रथा बंद करा दी। लोग मिलते हैं तो बताते हैं कि हमारे बच्चे का एडमिशन बिना डोनेशन और सिफारिश के हो गया। रोजगार के क्षेत्र में हमने एक और बड़ा काम किया कि 36,000 कान्ट्रेक्ट कर्मचारियों के स्थायी होने का रास्ता साफ  किया। इसमें अध्यापक शामिल नहीं है। अगर शिक्षकों को स्थायी किया जाए तो 50,000 शिक्षक और स्थायी हो सकते हैं।
डॉ. संजीत: दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले कई सालों से हजारों शिक्षक एडहोक्जिम का शिकार हैं। ये किसी भी संस्था के लिए शर्म की बात हैं। इस विषय पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? 
मनीष सिसोदिया: जो दिल्ली विश्वविद्यालय के अपने कॉलेज है उनमें सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। लेकिन जो कॉलेज हमारी फण्डिग से चलते हैं। वहां हम चाहेंगे कि सभी एडहोक शिक्षक परमानेंट हों क्योंकि जो आदमी चार साल से आपके पास काम कर रहा है। उसे आप अचानक से गेटलास्ट कैसे कह सकते हो। वह बेचारा कहां जाएगा।
डॉ. संजीत: दिल्ली का जो भूगोल है वह बड़ा अजीब है। एक तरफ  आप राजधानी में है। आपकी विधानसभा भी है। कुछ संस्थाएं आपके पास है। कुछ आपके पास नहीं हैं जो अपने आप में एक समस्या है इस पर आप क्या कहना चाहेगें?
मनीष सिसोदिया: दिल्ली एक तरह से मल्टीप्लिसिटी आफॅ गर्वनेंस की शिकार है। यहां खंभो की जातियां है, नालियों की जातियां है, ये पी.डब्लू की जाति का खंभा है। ये डी.डी.ए. की जाति की नाली है, ये नगर निगम की सड़क है अब आदमी तो नहीं पहचानता कि किस संस्था के पास जाए व्यक्ति एक पास जाता है तो वह कहता है कि दूसरे के पास जाए दूसरे के पास जाने पर दूसरा तीसरे के पास भेज देता है। ये सारी मल्टीप्लिसिटी खत्म होनी चाहिए। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। दिल्ली पुलिस और डी.डी.ए. भी दिल्ली सरकार के कंट्रोल में आना चाहिए। पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा तो ये मल्टीप्लिसिटी भी खत्म होगी।
डॉ. संजीत: पूर्ण राज्य के दर्जे की बात तो कांग्रेस और बीजेपी भी अपने मेनिफेस्टों में करते रहे है पर किया कभी नहीं। आम आदमी पार्टी भी इसे ठंडे बस्ते में तो नहीं डाल देगी?
मनीष सिसोदिया: दोनों सरकारों ने दिल्ली के अधिकारों को कमजोर किया। गृह मंत्रालय का आर्डर आता है कि दिल्ली विधानसभा केन्द्र से पूछे बिना कोई कानून नहीं बना सकती। पहले दिल्ली पुलिस का फाइनेंसियल पावर दिल्ली सरकार के पास रहती थी इन्होनें एक और आर्डर पास किया कि दिल्ली पुलिस की फाईनेंसियल पॉवर दिल्ली सरकार के पास नहीं रहेगी। ऐन्टी करप्शन ब्यूरो को कमजोर किया ये पार्टियां भाषणों में कुछ भी कहती रहे पर इनके कर्म दिल्ली को लूटने वाले है।
डॉ. संजीत: पूर्ण राज्य के दर्जे के बगैर दिल्ली में काम करना बड़ा कठिन कार्य है। ये तो सभी को समझ में आता है अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनती है तो क्या पार्टी पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग केन्द्र सरकार से करेगी।
मनीष सिसोदिया: हालांकि लोगों को इससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि दिल्ली पूर्ण राज्य हो या न हो। वे चाहते हैं कि उनके काम हो। वे थाने जाए तो उनकी एफ .आई . आर. लिखी जाए। एम.एल.ए. से शिकायत करे तो उसकी सुनवाई हो। डी.डी.ए. से कोई काम हो तो उसकी सुनी जाए और पूर्ण राज्य का दर्जा मिलता है तो इस तरह की सभी समस्याओं पर काम करना आसान हो जाता है।
डॉ. संजीत: अर्थात आप यह कहना चाहते हैं कि पूर्ण राज्य का दर्जा एक आदर्श स्थिति होगी तो अगर आम आदमी पार्टी सत्ता में आती है तो इस स्थिति को पाने के लिए पार्टी की क्या स्ट्रेटजी होगी?
मनीष सिसोदिया: अब तक तो हम बहुमत में नहीं थे लेकिन जैसे ही हम बहुमत में आएगें हम केन्द्र से पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग करेगें और अगर वे नहीं करते तो इसके लिए हम आंदोलन खड़ा करेगें।
डॉ. संजीत: पहले आप एक्टिविस्ट थे, पत्रकार थे, अब जबसे पार्टी बनी है आपकी व्यस्तताएं बढ़ गई है। किस तरह के बदलाव आप महसूस करते है अपने जीवन में?
मनीष सिसोदिया: वैसे तो हर वक्त काम करता रहा हूं लेकिन अब निश्चित रूप से चीजे बदली तो है। पहले पढ़ने लिखने का टाईम मिलता था अब नहीं मिल पाता । पहले मैं अखबारों के लिए ब्लाग आदि भी लिख लिया करता था अब समय नहीं मिल पाता। अभी बस ट्विटर पर ही लिखता हूं वह भी राजनीतिक ही होता है।
डॉ. संजीत: अभी हाल ही दिल्ली चुनाव से ठीक पहले दिल्ली में दंगे हुए। आम आदमी पार्टी की क्या प्रतिक्रिया है?
मनीष सिसोदिया: दंगे समाज के कोढ़ है। दुनियाँ कहां से कहां निकल गई है। हम अभी भी हिंदू - मुस्लमान में लगे हुए है। चुनाव के लिए जो भी ये सब हरकते कर रहे हैं ये सब शर्मनाक है। हमें बहुत दुख: है कि त्रिलोकपुरी दंगो की आग में जली लेकिन अंत में इंसानियत की जीत होगी।
डॉ. संजीत: लोग कह रहे हैं कि आप की झाड़ू मोदी ने छीन ली। इस पर आप क्या कहना चाहते हैं?
मनीष सिसोदिया: अच्छी बात होगी, मोदी जी थोड़ा राजनीति में भी झाड़ू लगाएँ। मोदी जी नेताओं को समझाए कि वे सफाई करें लेकिन फोटो खिचांऊ सफाई न करे।
डॉ. संजीत: आरक्षण पर पार्टी के नजरिए को लेकर लोगों में एक संदेह की स्थिति है। इस पर आप क्या कहना चाहेगें?
मनीष सिसोदिया: आरक्षण समाज की जरूरत थी। इससे कुछ हद तक दलितों की स्थिति में भी सुधार हुआ। लेकिन जितना आरक्षण देते वक्त सोचा था उतना उत्थान दलितों का हो नहीं पाया। कई जगह द्वेष भी पैदा हुआ। गैर दलितो फर्जीवाड़ा की सहायता से आरक्षण का लाभ उठाया। बीजेपी के एक विधायक ने फर्जीवाड़े से आरक्षण का लाभ उठाया। आज भी आरक्षण समाज की जरूरत है। सदियों से जिन जातियों का उत्पीड़न किया इसके लिए धर्म, पंरपरा, साहित्य हम सभी दोषी हैं। इनके उत्थान के लिए आरक्षण ही काफी नहीं और साथ ही साथ जो परिवार रोजी रोटी को मोहताज हैं लेकिन स्वर्ण होने के नाम पर उपेक्षित हैं ऐसे जरूरतमंदों की भी मदद की आवश्यकता है। एक तरफ  आरक्षण का फायदा उठाकर एक दलित आई.ए.एस.बना फिर उसके बच्चे भी आरक्षण का फायदा उठा रहे हैं। तीन चार पीढ़ियाँ इसका फायदा उठा रही हैं। वहीं एक गरीब दलित रिक्शा चलाता है और उसका बेटा भी रिक्शा चलाने के लिए अभिशप्त है। इस पर खुली रूप से बहस होनी चाहिए।
डॉ. संजीत: कांग्रेस और बीजेपी की इॅकनामिक पॉलिसी एक तरह की है। आम आदमी सरकार अगर बहुमत में आती है तो इस देश की इॅकनामिक पॉलिसी क्या रहने वाली है?
मनीष सिसोदिया: एक तो पहलू ये है कि टेक्स से जो पैसा आता है उसको आप कहां खर्च करेगें। सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। सरकार को सारे व्यापारों से अपने को अलग कर लेना चाहिए। ये व्यापारी के कार्य हैं। किसी व्यापारी को भ्रष्टाचार का सामना नहीं करना पड़े ये जिम्मेदारी सरकार की है। ऐसी स्थितियां पैदा करनी पड़ेगी कि व्यापार में उन्नति हो, उत्पादन बढ़े लेकिन साथ - साथ यह भी करना पड़ेगा कि जब रेवेन्यू आएं तो कहां खर्च किया जाए। यह भी इॅकनामिक पॉलिसी का हिस्सा हो। एक बढ़ी चीज हमारे यहां पिट रही गई है और कानसेप्ट में ही नहीं आती और लगता है इस देश के चिन्तन में ही नहीं है, वह है - शिक्षा । क्या हमारे देश की इॅकनामिक पॉलिसी में शिक्षा पर बात नहीं होनी चाहिए? क्या इॅकनामिक पॉलिसी के सवाल शिक्षा नीति से जुड़े नहीं होने चाहिए? जब मैं एजुकेशन मिनिस्टर बना तो मैनें अधिकारियों को बुलाया और शिक्षा से जुड़े डेटा की मांग की। उनके पास रेडिमेड डेटा भी नहीं था। दिल्ली में हर साल लगभग 5 लाख बच्चे नर्सरी में एडमिशन लेते हैं और एनुअल आउटपुट 2.5 लाख है । 2.5 लाख बच्चे शिक्षा के रेडार से गायब हो जाते हैं। आप बजट में स्कूल को प्राथमिकता नहीं देते हो। आप घरों को मेट्रो को पुलों को प्रायोरिटी देते हो। मेट्रो बनाने में पुल बनाने में कम्पीटिशन है, स्कूल बनाने में कोई कम्पीटिशन नहीं है। ये कोई नहीं कहता कि हमने स्कूल की बिल्डिंग जल्दी बना दी। मेट्रो फेस दो - दो महीनें में तैयार हो जाता है स्कूल जहां पीढ़ियों का निर्माण होता है, उस पर कोई ध्यान नहीं देता। इस देश की इॅकनामिक पॉलिसी में एजुकेशन को सबसे ज्यादा तरजीह दी जानी चाहिए क्योंकि ये ही नेक्स्ट जेनरेशन के ब्रिज है। दिल्ली में मात्र 90,000 बच्चो के लिए उच्च शिक्षा की व्यवस्था है। बाकी1,60,000 बच्चे कहां जाएगें इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। ये व्यवस्था जब तक नहीं होगी तब तक समाज में चेन स्नेचर, गुंडे मवाली पैदा होंगे।
डॉ. संजीत: लाखों बच्चे 12 वीं पास करके आते हैं। एक या दो परसेंट से वो सरकारी स्कूलों में एडमिशन लेने से रह जाते हैं। जहां सरकारी कॉलेज कम पैसे में अच्छी शिक्षा दे देते हैं वहीं प्राईवेट कॉलेज मंहगी फीस वसूलते हैं इस पर क्या करेगें ?
मनीष सिसोदिया: मैं यही बात कह रहा था जैसे मैनें कहा कि व्यापार का काम सरकार का नहीं है लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, पीने का पानी पिलाने का काम सरकार का है। शिक्षा शुद्ध रूप सरकार का काम होना चाहिए ताकि अगली पीढ़ी को पढ़ा लिखा कर तैयार करे। लेकिन दुर्भाग्य से शिक्षा को बाजार के हवाले छोड़ दिया है। इसे बाजार के हवाले नहीं छोड़ना चाहिए।
डॉ. संजीत: भारत में स्कूलों की जिस तरह से संरचना है वे अपने आप में एक वर्ग भेद की तरफ  इशारा करते हैं। हालांकि ये एक यूटोपिया हो सकता है। पर क्या ऐसा कभी भारत में संभव हो पाएगा कि सभी स्कूलों के स्टेण्डर्ड एक जैसा हो?
मनीष सिसोदिया: इसकी जरूरत है लेकिन इसके लिए ईमानदार राजनीति, एक कमिटिड राजनीति की जरूरत है। ये सब भाषण से नहीं होगा। मैं जब शिक्षा मंत्री बना तो मैंने शिक्षा के कानून को बदलने की पहल की। मैंने देखा कि दिल्ली में एक बोर्ड है जो 1973 के कानून के अन्दर आता है। उसमें 15 लोग होते हैं जिनमें एक मिनिस्टर और दो डायरेक्टर और बाकि 12 प्राईवेट स्कूल के मालिक हैं। उसमें कोई एजुकेशनिस्ट, रिफारमर, थिंकर,पत्रकार, साहित्यकार नहीं है। इस तरह के लोग इसमें जुड़ेगें तब ही शिक्षा का भला होगा। 12 प्राईवेट स्कूलों के मालिकों को बोर्ड में शामिल कर आप सोचते हैं कि शिक्षा मंत्री शिक्षा पॉलिसी बनाएगा। वो तो प्राफिट मेकिंग करेगें। मैं तो ऐसे समय की कल्पना कर रहां हूं कि हमारे देश का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पुलिस कमिश्नर को बुलाकर पूछे कि इतना क्राईम बढ़ रहा है आप क्या कर रहे हो और साथ ही साथ एजुकेशन डायरेक्टर से पूछे कि हमारी अगली जेनरेशन में क्रिमनल पैदा न हो इसके लिए तुम लोग क्या करोगे। ये हमारा सपना है। अब आप इसे इॅकनामिक पॉलिसी में ले जाओ, एजुकेशन पॉलिसी में लो, नेशनल पॉलिसी में ले जाओ, कहीं ले जाओ, जब तक हम इस तरफ  नहीं बढ़ेगे तब तक कुछ नहीं होने वाला और हम ऐसी स्थिति लाना चाहते हैं। यहीं हमारा सपना है। 

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