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शनिवार, 29 नवंबर 2014

क्‍वांर की हुई अवाई

प्रभुदयाल श्रीवास्‍तव 
मेघ छटे नभ
नीला नीला हुआ
क्वाँर की हुई अवाई,
राम - राम कर
कीचड़, पानी और
छतरी से छुट्टी पाई
ज्वांर लगे खेतों में
दद्दा लगे घूमने,
देख - देख कर धान
पिताजी खुश हो जाते।
तोड़ तोड़ कर लाते भुट्टे
रोज भूनते,
पुरा पड़ोसी वालों को
भरपेट खिलाते।
अम्मा कहतीं सुनो सुनो जी
बिना देर के,
देव उठनी के बाद
शिशि की करो सगाई।
दिखती सोयाबीन
चमकती सोने जैसी,
कैसी कैसी बात
महकती रहती मन में।
भौजी कहतीं मैं लूंगी
चाँदी की पायल,
भैया सपने लेकर
उड़ते नील गगन में।
दद्दा बोले - हँसिया लेकर
चलो खेत में,
मिल जुलकर सब करें
धान की शुरू कटाई।
मझले कक्का जाते
हरदिन सुबह बगीचे,
काकी लिये कलेवा
पीछे पीछे जातीं।
छोटे कक्का अब तक
बिन ब्याहे बैठे हैं,
मझली काकी हँसते हँसते
उन्हें चिड़ातीं।
दद्दा के माथे पर
चिंता की रेखायें,
नहीं कहीं से बात
अभी रिश्ते की आई।

12, शिवम सुन्दरम नगर,
छिंदवाड़ा ( म.प्र.)

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