इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 22 नवंबर 2014

कैसे कैसे चोर

सपना मांगलिक 

मदनलाल बड़बड़ा रहे थे कि आज सब्जीवाले ने लूट लिया। अठ्ठावन रुपये की सब्जी लेने के बाद बचे दो रुपये ना देकर चार पत्ते धनिये के जबरदस्ती डाल दिए, और मना किया तो खींसे निपोरकर बोला - बाबूजी छुट्टे पैसे नहीं हैं। पूरे साठ ही दे दीजिये। अरे यह भी कोई बात हुई साले सब के सब सब्जी बाले इन दिनों लूटमार करने लगे हैं । उंह एक नंबर के पैसा चोर। कालोनी के गेट तक आते - आते मदनलाल जी यूँ ही बड़बड़ाते रहे मगर अचानक ही कुछ झुके। उन्हें जमीन पर पांच रूपये का एक सिक्का चमकता दिखाई दिया। मदनलाल जी ने इधर - उधर देखा और किसी को आस - पास ना पाकर चुपचाप वो सिक्का अपनी जेब के हवाले कर लिया और पुन: सब्जी वाले पर खुन्नस निकालते आगे बढ़ गए।
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