इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 22 नवंबर 2014

कैसे कैसे चोर

सपना मांगलिक 

मदनलाल बड़बड़ा रहे थे कि आज सब्जीवाले ने लूट लिया। अठ्ठावन रुपये की सब्जी लेने के बाद बचे दो रुपये ना देकर चार पत्ते धनिये के जबरदस्ती डाल दिए, और मना किया तो खींसे निपोरकर बोला - बाबूजी छुट्टे पैसे नहीं हैं। पूरे साठ ही दे दीजिये। अरे यह भी कोई बात हुई साले सब के सब सब्जी बाले इन दिनों लूटमार करने लगे हैं । उंह एक नंबर के पैसा चोर। कालोनी के गेट तक आते - आते मदनलाल जी यूँ ही बड़बड़ाते रहे मगर अचानक ही कुछ झुके। उन्हें जमीन पर पांच रूपये का एक सिक्का चमकता दिखाई दिया। मदनलाल जी ने इधर - उधर देखा और किसी को आस - पास ना पाकर चुपचाप वो सिक्का अपनी जेब के हवाले कर लिया और पुन: सब्जी वाले पर खुन्नस निकालते आगे बढ़ गए।
659 आगरा उत्तर प्रदेश 282 - 005
                मो. 9548509508

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें