इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 22 नवंबर 2014

कैसे कैसे चोर

सपना मांगलिक 

मदनलाल बड़बड़ा रहे थे कि आज सब्जीवाले ने लूट लिया। अठ्ठावन रुपये की सब्जी लेने के बाद बचे दो रुपये ना देकर चार पत्ते धनिये के जबरदस्ती डाल दिए, और मना किया तो खींसे निपोरकर बोला - बाबूजी छुट्टे पैसे नहीं हैं। पूरे साठ ही दे दीजिये। अरे यह भी कोई बात हुई साले सब के सब सब्जी बाले इन दिनों लूटमार करने लगे हैं । उंह एक नंबर के पैसा चोर। कालोनी के गेट तक आते - आते मदनलाल जी यूँ ही बड़बड़ाते रहे मगर अचानक ही कुछ झुके। उन्हें जमीन पर पांच रूपये का एक सिक्का चमकता दिखाई दिया। मदनलाल जी ने इधर - उधर देखा और किसी को आस - पास ना पाकर चुपचाप वो सिक्का अपनी जेब के हवाले कर लिया और पुन: सब्जी वाले पर खुन्नस निकालते आगे बढ़ गए।
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