इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 नवंबर 2014

मुकेश वै़द्य की कविताएं

सरकारी खम्बा
जब
बन न सके बेटे,
बुढ़ापे की लाठी
तब
सड़क के किनारे
मजदूरी करते
बूढ़े बाप की पीठ
का सहारा
बन गया बिजली का
सरकारी खम्बा
2
मैं सपनों के संग...!

अतीत के क्षणों में
ढूंढता हॅूं बीते पल
तुमने किया था वादा
जीवनभर साथ निभाने का
और
दिखाए थे सपने
उस पार जाने का
जहां
मैं आज भी
तुम्हारे बिना जा नही सकता,
लगता है-
मील के पत्थर-सा
यहीं जमा रह जाऊंगा
और
तुम निकल जाओगे
मुझसे दूरी नापते हुए
किन्हीं अपनों के संग
मैं पगधूली में खो जाऊंगा
सपनों के संग...!
3
पाषाण
हो गया वध, सभी
रह गए स्तब्ध
देखते
भावनाओं की रक्तरंजित देह
पाषाण हृदय में ले
हो गई आरम्भ एक नई सभ्यता
जहां जारी है
पत्थरों से पत्थरों का
कुटिल संवाद
4
तारीखों का सिलसिला
न्यायालय की सीढ़ियां
रीखों का सिलसिला
कभी भी रूका नही
निर्णय सुनने के लिए
आदमी बचा नही

पता :- 
16/306, त्रिलोकपुरी,
दिल्ली - 110091
मो. 09212908406

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें