इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 29 नवंबर 2014

मुकेश वै़द्य की कविताएं

सरकारी खम्बा
जब
बन न सके बेटे,
बुढ़ापे की लाठी
तब
सड़क के किनारे
मजदूरी करते
बूढ़े बाप की पीठ
का सहारा
बन गया बिजली का
सरकारी खम्बा
2
मैं सपनों के संग...!

अतीत के क्षणों में
ढूंढता हॅूं बीते पल
तुमने किया था वादा
जीवनभर साथ निभाने का
और
दिखाए थे सपने
उस पार जाने का
जहां
मैं आज भी
तुम्हारे बिना जा नही सकता,
लगता है-
मील के पत्थर-सा
यहीं जमा रह जाऊंगा
और
तुम निकल जाओगे
मुझसे दूरी नापते हुए
किन्हीं अपनों के संग
मैं पगधूली में खो जाऊंगा
सपनों के संग...!
3
पाषाण
हो गया वध, सभी
रह गए स्तब्ध
देखते
भावनाओं की रक्तरंजित देह
पाषाण हृदय में ले
हो गई आरम्भ एक नई सभ्यता
जहां जारी है
पत्थरों से पत्थरों का
कुटिल संवाद
4
तारीखों का सिलसिला
न्यायालय की सीढ़ियां
रीखों का सिलसिला
कभी भी रूका नही
निर्णय सुनने के लिए
आदमी बचा नही

पता :- 
16/306, त्रिलोकपुरी,
दिल्ली - 110091
मो. 09212908406

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